घरों का घबराया हुआ बाज़ार

फ़ाइल पिक्चर
Image caption मकानों की कीमत में कुछ सुधार के संकेत हैं.

पिछले साल सितंबर महीने में शुरु हुए आवासीय क्षेत्र के संकट को याद करते हुए मनोज प्रसाद कहते हैं, "मैंने जून महीने में तीन लाख डॉलर में मकान ख़रीदा था, दिसंबर 2008 में मुझे नौकरी से हटा दिया गया, मकान की किस्त भरने की हालत में नहीं था लेकिन मकान बेच भी नहीं सकता था क्योंकि कोई ढाई लाख डॉलर भी देने को तैयार नहीं था."

अमरीका के पेन्सिलवेनिया प्रांत के मैकेंजी क़स्बे में रहने वाले एकाउंटेंट मनोज जैसी स्थिति में लाखों-लाख मध्यवर्गीय लोग जा फँसे और वे सिर्फ़ अमरीका तक सीमित नहीं थे.

बैंकों ने कर्ज़ देना बंद कर दिया, ख़रीदारों में घबराहट फैल गई क्योंकि किसी को पता नहीं था कि किसकी नौकरी कब तक सलामत है.

ब्रिटेन में तो मकानों की क़ीमत में औसतन 30 प्रतिशत तक की गिरावट देखी गई.

हज़ारों-हज़ार लोग 'निगेटिव इक्विटी' की चपेट में आ गए यानी उनके मकान की की़मत उस स्तर से भी नीचे चली गई जिस पर उन्होंने उसे ख़रीदा था और लगभग सारे लोगों ने बैंकों से कर्ज़ लेकर ऐसा किया था इसलिएवे बहुत बुरी स्थिति में फँस गए.

ब्रिटेन में इस वर्ष की शुरूआत से लेकर अब तक हज़ारों लोग अपने घरों से बेदख़ल हो चुके हैं क्योंकि वे आवासीय कर्ज़ की किस्त चुकाने की स्थिति में नहीं हैं.

मनोज कहते हैं कि उन्हें सात महीने बेरोज़गार रहने के बाद बहुत मुश्किल से एक पार्ट-टाइम नौकरी मिली है और वे किसी तरह मकान की किस्त चुका रहे हैं, वे उम्मीद कर रहे हैं कि स्थिति में सुधार होगा और उनके मकान की क़ीमत पुराने स्तर पर लौट आएगी.

ब्रिटेन में नेशनल एसोसिएशन ऑफ़ एस्टेट एजेंट्स (एनएईए) के डेरेक जोंस ने इस साल मार्च में बताया, "हमारे पास आने वाले ख़रीदारों की संख्या लगभग आधी रह गई, सिर्फ़ मकानों की कीमत में गिरावट नहीं आई है बल्कि मकानों के सौदे बहुत कम रह गए हैं क्योंकि बैंक लोगों को पहले की तरह आसानी से कर्ज़ नहीं दे रहे हैं."

धीरे-धीरे होता सुधार

बैंकों को मिले अरबों डॉलर के आर्थिक पैकेजों के बाद हालत में कुछ सुधार अब जाकर दिख रहा है. पिछले दो-तीन महीनों से अमरीका और ब्रिटेन के प्रॉपर्टी मार्केट में सुधार के कुछ संकेत हैं, जो बैंक पहले कर्ज़ नहीं दे रहे थे वे अब बहुत जाँच-पड़ताल के बाद दोबारा कर्ज़ देने लगे हैं.

Image caption बहुत सारे मकानों की क़ीमत ख़रीद मूल्य से भी नीचे चली गई

आवासीय बाज़ार पूरी तरह उबरे तो नहीं हैं लेकिन ज़्यादातर जानकार कह रहे हैं कि सबसे कठिन वक़्त अब गुज़र चुका है.

अमरीका में नए मकानों की बिक्री में पिछले दो महीनों में 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी गई है जबकि ब्रिटेन में रॉयल इंस्टीट्यूशन ऑफ़ सर्वेयर्स का कहना है कि स्थिति में काफ़ी सुधार हुआ है और मकानों की क़ीमतों में वैसी गिरावट के आसार नहीं हैं जैसा कि पहले उन्होंने बताया था.

दो प्रमुख ब्रितानी बैंकों--हैलिफ़ैक्स और नेशनवाइड--के सर्वेक्षण बता रहे हैं कि मकानों की क़ीमतें धीरे-धीरे ऊपर जा रही हैं.

लेकिन ब्रिटेन के वित्त मंत्री एलेस्टर डार्लिंग ने जी-20 के नेताओं को आगाह किया है, "ख़तरा अभी टला नहीं है. अगर लोग ढीले पड़ गए तो मंदी दोबारा अपने पंजे फैला सकती है इसलिए ज़रूरी है कि वित्तीय क़दमों को बीच में न रोका जाए बल्कि उन्हें पूरे संकल्प के साथ पूरा किया जाए."

भारत पर असर

ज़ाहिर है, भारत मंदी की चपेट में तो नहीं आया लेकिन अर्थव्यवस्था में जिस तरह का जोश दिख रहा था वह काफ़ूर हो गया.

लगभग नौ प्रतिशत की दर से बढ़ रही अर्थव्यवस्था हिचकोले खाकर छह प्रतिशत के क़रीब पहुँच गई. इसका असर भारत के सकल घरेलू उत्पाद में पाँच प्रतिशत का योगदान देने वाले रियल एस्टेट कारोबार पर साफ़ दिखने लगा.

Image caption सैकड़ों आवासीय परियोजनाएँ या तो रुकी हुई हैं या बहुत धीरे चल रही हैं

वरिष्ठ आर्थिक विश्लेषक आशु सिन्हा कहते हैं, "दिल्ली और आसपास के इलाक़ों में अपार्टमेंट प्रोजेक्ट्स डेढ़-डेढ़ साल से लटके हुए हैं, बिल्डर और डेवलपर अपने वादे से मुकर रहे हैं क्योंकि उन्हें बैंकों और दूसरे वित्तीय संस्थानों से या तो कर्ज़ नहीं मिल रहा या फिर बहुत महँगी दरों पर मिल रहा है."

दिल्ली के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में ग्रेटर नोएडा में दो साल पहले फ़्लैट बुक कराने वाले इंजीनियर गौतम शर्मा का कहना है कि उनका अपार्टमेंट बनकर खड़ा हो गया है लेकिन महीनों से बिल्डर काम आगे नहीं बढ़ा रहा है.

वे कहते हैं, "मेरे 26 लाख रुपए फ़ँसे हुए हैं जिसकी किस्त भर रहा हूँ जबकि मौजूदा मकान का किराया भी देना पड़ रहा है. इंतज़ार करते करते हम परेशान हो चुके हैं."

आशु सिन्हा बताते हैं कि यूनिटेक, पार्श्वनाथ, अंसल और डीएलएफ़ जैसे बड़े बिल्डरों ने अपने कई प्रोजेक्ट रोक दिए हैं क्योंकि उनके पास उन्हें पूरा करने का पैसा नहीं है, ऊपर से उनके शेयरों में आई गिरावट ने उनका दम निकाल दिया है, हालाँकि अब कंस्ट्रक्शन कंपनियों के शेयरों की क़ीमतें कुछ उठती दिख रही हैं.

इस बीच भारत के आवासीय बाज़ार में एक बड़ा बदलाव आया है, कंपनियाँ अब कम क़ीमत वाले मकान बनाने पर अपना ध्यान केंद्रित कर रही हैं क्योंकि ऐसे मकानों की भारी माँग है, इस होड़ में टाटा समूह भी शामिल है.

सिन्हा कहते हैं, "ढाई-ढाई करोड़ के फ्लैट बनाने वाली यूनिटेक जैसी कंपनियाँ अब पचीस लाख वाले रेंज पर ध्यान दे रही हैं, हर कंपनी लो-कॉस्ट हाउसिंग की ओर रुख़ कर रही है, यह एक बड़ा बदलाव बाज़ार में दिख रहा है."

उनका कहना है कि अगर लोगों को कर्ज़ में थोड़ी आसानी हो और ब्याज दर कम हो तो भारत के हाउसिंग सेक्टर की हालत काफ़ी बेहतर हो सकती है.

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