'प्रवासियों पर मंदी का गंभीर असर'

Image caption बीबीसी वर्ल्ड सर्विस और अमरीका स्थिति माइग्रेश पॉलिसी इंस्टीट्यूट के संयुक्त अध्ययन से आर्थिक मंदी के प्रवासियों पर हुए असर का विस्तृत जायज़ा लिया गया है

पश्चिमी देशों से शुरु हुए आर्थिक मंदी के दौर ने पूरी दुनिया को प्रभावित किया है. यदि पिछले 60 साल का इतिहास देखें तो दुनिया भर में लोगों की आवाजाही पर एक साल के आर्थिक संकट का गंभीर असर नज़र आता है. लेकिन इस संकट ने हर क्षेत्र को अलग ढंग से प्रभावित किया है.

बीबीसी वर्ल्ड सर्विस और अमरीका स्थिति माइग्रेशन पॉलिसी इंस्टीट्यूट ने संयुक्त तौर पर अध्ययन कर पिछले एक साल में विश्व भर में प्रवासियों की आवाजाही, विप्रेषित धन और प्रवासियों पर आर्थिक संकट के असर का आकलन किया है.

बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार विश्व के जिन देशों में प्रवासी आर्थिक या रोज़गार के मकसद के लिए जाते थे, वे आर्थिक संकट के बाद कम आकर्षक केंद्र बने हैं.

बीबीसी ने पाया कि आम धारणा के विपरीत अधिकतर प्रवासी लोग अपने देश लौटने की जगह जिस देश में गए हैं, वहीं रहना बेहतर समझ रहे हैं. लेकिन ये बताना ज़रूरी है कि दुनिया के कई हिस्सों से कई प्रवासी अपने-अपने देश भी लौटे हैं.

अध्ययन के अनुसार दुनिया में रिमिंटेंस यानी विप्रेषित धन में ख़ासी कमी आई है लेकिन कुछ देशों को विप्रषित धन बढ़ा है. इससे प्रवासियों की आर्थिक स्थिति के साथ-साथ पैसा भेजने और पैसा पाने वाले देशों पर भी असर पडा है.

आर्थिक मंदी की शुरुआत से पहले वर्ष 2005 में अंतरराष्ट्रीय प्रवासियों की संख्या रिकॉर्ड 19.5 करोड़ पहुँच गई थी जो 1960 के साढ़े सात करोड़ से ढाई गुना थी. ये दुनिया की आबादी का तीन प्रतिशत है. जनजंख्या को देखा जाए तो अधिकतर प्रवासी यूरोप में हैं और फिर एशिया और और उत्तरी अमरीका में हैं. देश की कुल जनसंख्या को देखा जाए तो प्रवासियों की संख्या खाड़ी देशों, ओशनिया (जिसमें ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड शामिल हैं), उत्तरी अमरीका और फिर यूरोप में हैं.

अनेक लोगों को ये जानकर हैरत होगी कि संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार अवैध तरीके से अन्य देशों में जा रहे लोगों की संख्या, प्रवासियों की कुल जनसंख्या का केवल दस से 15 प्रतिशत है.

वर्ष 2008-09 में जिन देशों में रीमिटेंस यानी विप्रेषित धन में ज़बर्दस्त कमी आई, वे क्रमवार इस प्रकार हैं. तुर्की, मोलांडा, पोलैंड, मोरोक्को, मैक्सिको और कीनिया.

उधर मंदी के बावजूद ख़ासा विप्रेषित धन पाकिस्तान और बांगलादेश में और इनके बाद फिलिपिंस और कैप वर्डे में आया. इसका मुख्य कारण यह है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और फिलिपींस के अधिकतर प्रवासी सऊदी अरब में हैं जहाँ आर्थिक मंदी का असर उतना नहीं हुआ जितना अन्य खाड़ी देशों में हुआ है.

आर्थिक मंदी से पैदा हुई बेरोज़गारी की समस्या के कारण जहाँ अमरीका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया और अनेक अन्य देशों ने आप्रवासियों के लिए नियम-क़ानून कड़े कर दिए. उधर कनाडा एक मात्र पश्चिमी देश था जहाँ अस्थायी कर्मचारियों की माँग बढ़ी.

उधर जापान, स्पेन और चेक गणराज्य ने प्रवासियों को देश छोड़ने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन पैकेज के तहत पैसा और एक तरफ़ टिकट देकर वापस भेज की घोषणा की है.

आर्थिक मंदी के कारण प्रवासन पर हुए प्रभाव को किसी एक वैश्विक रुझान में बांधा नहीं जा सकता. ये रुझान हर क्षेत्र के लिए अलग हैं और स्थाई, अल्पकालिक, ग़ैरक़ानूनी और मानवीय प्रवासन के लिए अलग-अलग हैं.

अमरीका और मैक्सिको:

वर्ष 2006 से 2009 के बीच मैक्सिको से अमरीका में होने वाला वार्षिक प्रवासन 10 लाख से घटकर 60 हज़ार पहुँच गया है और इसका मुख्य कारण ग़ैरक़ानूनी प्रवासन में कमी है.

अमरीका में मैक्सिको और मध्य अमरीका के आप्रवासियों के लिए बेरोज़गारी की दर दोगुना हो जाने के बाद भी अधिकतर आप्रवासी अमरीका से मैक्सिको वापस नहीं जा रहे हैं.

ब्रिटेन, आयरलैंड, पूर्वी यूरोपीय देश:

ब्रिटेन और आयरलैंड से बड़ी संख्या में प्रवासियों की वापसी हुई है. वर्ष 2004 से मार्च 2009 तक यूरोपीय संघ में शामिल हुए पूर्वी यूरोपीय देशों के 14 लाख प्रवासी ब्रिटेन में आए.

लेकिन वर्ष 2008 तक इनमें से लगभग आधे अपने-अपने देश लौट चुके थे.

स्पेन, रोमानिया और मोरोक्को:

पिछले एक दशक में स्पेन में आप्रवासियों की संख्या में लगभग सात गुना वृद्धि हुई लेकिन इस समय स्पेन की आप्रवासी आबादी के लौटने के कारण वहाँ मज़दूरी करने वाली जनसंख्या की ख़ासी अदला-बदली हुई है. पूर्वी यूरोप के देशों - रोमानिया और बुलगारिया से स्पेन आने वालों की संख्या में 60 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई है. स्पेन के नेशनल स्टेटिस्टिक्स इंस्टीट्यूट के अनुमान के अनुसार प्रवासियों के स्पेन छोड़ने की संख्या में लगभग दोगुना इज़ाफ़ा हुआ वर्ष 2006 में ये संख्या एक 20 हज़ार से बढ़कार ये वर्ष 2008 में दो लाख 32 हज़ार हो गई.

भारत

वर्ष 2008 में जहाँ लगभग साढ़े आठ लाख ऐसे भारतीय कामगार विदेश गए, वहीं वर्ष 2009 के पहले तीन महीनों में ये संख्या केवल 1.71 लाख थी, जो पिछले वर्ष के मुकाबले में ख़ासी कम हैं.

विश्व बैंक की एक टीम के अनुमान के अनुसार भारत को वर्ष 2008 में लगभग 52 अरब डॉलर विदेशों से भेजे गए. दक्षिण एशिया को भेजे जाने वाले धन का लगभग 75 प्रतिशत भारत को जाता है.

विप्रेषित धन का एक और बड़ा स्रोत आप्रवासी हैं. भारत का उदाहरण लें तो विश्व बैंक के एक विश्लेषण के अनुसार आप्रवासी भारतीयों के खातों में जमा पूँजी वर्ष 2008 में गिरी लेकिन उसके बाद स्थिति बेहतर हो गई. जून 2008 में एनआरआई खातों में 39.6 अरब डॉलर थे जबकि दिसंबर 2008 में ये 36.2 अरब डॉलर थे और जून 2009 में ये बढ़कर 39.3 प्रतिशत हो गए.

खाड़ी देश:

खाड़ी देशों का मामला मिलाजुला है. भारत से खाड़ी के देशों में जाने वालों की संख्या में गिरावट आई है और विदेशों में जाने के लिए वीज़ा आवेदनों में भी कमी आई है. लेकिन जो भारतीय और अन्य देशों के प्रवासी सऊदी अरब में हैं, जहाँ आर्थिक मंदी का उतना असर नहीं है, वे अपने-अपने देश नहीं गए हैं. अन्य खाड़ी देशों से अनेक भारतीय ज़रूर देश लौटे हैं.

आर्थिक मंदी ने बांगलादेश की सरकार को अन्य ऐसे बाज़ारों की खोज करने पर मजबूर किया है जहाँ उसके लोग मज़दूरी करने के लिए जाते हैं. उधर नेपाल के प्रवासियों का संयुक्त अरब अमीरात जाना कम हुआ है, जबकि सउदी अरब में उनका जाना बढ़ा है.

फिलिपींस की सरकार भी अपने देश के कामगारों के लिए नए बाज़ार की तलाश में है, क्योंकि इस देश के कामगारों का एक चौथाई दुनिया के 190 देशों में काम करता है.

चीन में अंदरूनी हलचल

प्रवासन केवल अंतरराष्ट्रीय मामला नहीं है बल्कि चीन जैसे कुछ देशों के लिए एक आंतरिक मामला भी है. चीन में 14 करोड़ कामगार ग्रामीण इलाक़ों से तटीय औद्योगिक इलाक़ों में काम करने के लिए आते हैं और बेरोज़गारी काफ़ी बढ़ी है. अनेक लोगों को कम पैसे या फिर ख़राब स्थितियों में काम करना पड़ रहा है.

वर्ष 2009 में नए चीन साल की शुरुआत में कुल कामगार आबादी का आधा यानी सात करोड़ लोग अपने पैतृक प्रदेश चले गए. ऐसा हर साल होता है लेकिन वित्तीय मंदी के दौर में इस बार ज़्यादा लोग अपने गृह प्रांत वापस गए.

आम तौर पर इनमें से अनेक वापस काम पर आ जाते हैं लेकिन इस बार लगभग डेढ़ करोड़ लोग वापस काम पर नहीं आए. हालाँकि पाँच करोड़ 60 लाख चीनी कामगार औद्योगिक तटीय क्षेत्रों में वापस आए लेकिन इनमें से कई ऐसे भी थे जिनके पास नौकरियाँ नहीं थी.

नियम-क़ानून कड़े हुए

मलेशिया और थाइलैंड से लेकर कज़ाकिस्तान, ताइवान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रलिया और रूस की सरकारों ने आप्रवासन के लिए नियम क़ानून कड़े कर दिए.

ब्रिटेन और अमरीका ने भी ऐसे ही क़दम उठाए. अमरीका ने स्किल्ड वर्कर्स के लिए नियम-क़ानून कड़े कर दिए.

उधर इटली ने तो ग़ैरक़ानूनी प्रवासियों को निशाना बनाते हुए ग़ैरक़ानूनी मौजूदगी को अपराध की श्रेणी में रख दिया.

वर्ष 2009 की शुरुआत में फ़्रांस की सरकार ने छापे मारे ताकि ग़ैरक़ानूनी कामगारों को हटाया जा सके लेकिन इसी के साथ बेरोज़गार कामगारों को नए काम भी दिए गए.

लेकिन कनाडा ने इन सभी देशों के क़दमों के विपरीत जहाँ स्थाई कामगारों को नहीं छुआ, वहीं कनाडा में अस्थाई कामगारों की माँग बढ़ी.

जापान, स्पेन और चेक गणराज्य ने प्रवासियों को देश छोड़ने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन पैकेज जैस कुछ पैसे या एक तरफ़ का टिकट देकर वापस भेज रहे हैं.

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