'अभी भी नौकरी की तलाश है'

आवेदनकर्ता
Image caption आर्थिक संकट के कारण भारत में भी नौकरियों पर असर पड़ा.

वैश्विक आर्थिक संकट जब चरम पर था तब उसका असर भारत पर भी पड़ा. ये सच है कि भारतीय अर्थव्यवस्था मंदी में नहीं गई लेकिन कंपनियों के मुनाफ़े पर असर पड़ा.

नतीजा ख़र्च घटाने की प्रक्रिया शुरु हुई और निशाना बने 'अतिरिक्त' कर्मचारी. तो भारत में भी छँटनी शुरू हुई.

इसी वर्ष जनवरी - फ़रवरी में हमने ऐसे कुछ युवाओं से बात की थी जो आर्थिक संकट के शिकार बने थे और उन्हें नौकरी से हटा दिया गया था.

हमने उनमें से दो युवाओं से फिर बात की और जानना चाहा कि पिछले आठ- नौ महीनों में क्या उन्हें कोई नई नौकरी मिली? उनसे ये भी पता करने की कोशिश की कि आर्थिक सुस्ती ने उनके निजी जीवन पर क्या असर डाला है.

ऐसे ही एक युवा विकास शंकर की कहानी हमने आप तक पहुँचाई थी. वो उस समय एक विदेशी बैंक के नोएडा कार्यालय में बतौर मैनेजर काम करते थे.

करियर सेंसेक्स का ग्राफ़ बन गया

उनका काम था इक्विटी (शेयर) विभाग देखना लेकिन भारतीय शेयर बाज़ारों की हालत ख़राब होती जा रही थी और सेंसेक्स के ग्राफ़ की तरह विकास का करियर डँवाडोल हो रहा था. एक दिन उन्हें इस्तीफ़े के लिए मज़बूर कर दिया गया.

दूसरे युवा हैं, फ़राज़ ख़ान जो आर्किटेक्ट के तौर पर रियल एस्टेट कंपनी से जुड़े हुए थे. वो ऐसे क्षेत्र से जुड़े थे जिस पर मंदी की मार दुनिया भर में सबसे ज़्यादा पड़ी. उन्हें भी कंपनी प्रबंधन का बाहर का रास्ता दिखा दिया था.

इन दोनों युवाओं की कहानी उन्हीं की ज़ुबानी....

मंदी ने ज़िंदगी का ढर्रा बदल दिया...विकास शंकर

(बैंक मैनेजर, जालंधर)

Image caption विकास शंकर को जनवरी में इस्तीफ़ा देने के लिए मज़बूर किया गया था.

जब आपसे जनवरी में बात हुई तब मैं निराश था. ये स्वाभाविक भी था क्योंकि नौकरी जा चुकी थी. मूल रूप से बिहार के पटना का रहने वाला हूं लेकिन घर लौट नहीं सकता था.

तब पिता जी से बात की जो रिटायर्ड आईपीएस हैं. उनसे पैसे माँगे और दिल्ली में ही फ़ाइनेंसियल मॉड्यूल का नया कोर्स करने लगा.

पहली बार लगा कि अच्छा ख़ासा करियर जब चौपट हो जाए तो घर से सिर्फ़ पैसे की ज़रूरत नहीं होती बल्कि भावनात्मक सहयोग ज़रूरी होता है. पिताजी ने पूरी मदद का भरोसा दिलाया. दोस्तों से भी मदद मिली. मुझे अपने आप पर तो यकीन था ही.

मैं ख़ुद ही समझ रहा था कि भारत में मंदी का असर कम हौव्वा ज़्यादा है. इंटरव्यू देने का सिलसिला शुरू किया.

सफलता भी मिल गई. एक बीमा कंपनी में मुझे बतौर मैनेजर की नौकरी मिली. हालांकि ये बात मार्च की है. दस मार्च को मैंने ज्वाइन किया.

मुझे जालंधर जाने का आदेश मिला. फिलहाल वहीं नौकरी कर रहा हूं. लेकिन जीने का तरीक़ा बदल चुका है. मन में डर भी बन रहता है.

'अब एक ही फंडा - पैसे बचाओ'

पहली नौकरी तो 2007 में ही मिल गई थी. एमबीए था तो 15 हज़ार रूपए वेतन तय हुआ था. तब से लेकर पिछले साल तक अगर आप मुझसे पूछें कि बचत कितनी थी, तो मैं कहूंगा कुछ भी नहीं.

मुझे पूरी तरह याद है कि जिस दिन मेरी नौकरी गई उस दिन मेरी जेब में 500 रूपए थे. ये बात और थी कंपनी ने नौकरी जाने के एवज़ में तीन महीने की सैलरी दी थी.

इसलिए मंदी से सबसे बड़ी सबक मैंने ली है कि पैसे बचाओ. अब पहले वाली बात नहीं रही कि छह महीने की नौकरी के बाद ही कर्ज़ लेकर घर ले लिया, कार ले ली. तब लोग सैलरी का 75 प्रतिशत ईएमआई देने के लिए तैयार रहते थे.

मैनेजमेंट के हथकंडों ने मज़बूर कर दिया

लेकिन अब वो बात नहीं रही. मेरा लक्ष्य है आय का कम से कम 35 फ़ीसदी बचाओ. फिज़ूलखर्जी तो बंद ही कर दी है. अब हर दस दिन पर पार्टी नहीं होती, हर दूसरे दिन रेस्तराँ नहीं जाता.

कुँवारा होना वरदान साबित हुआ

जब नौकरी गई थी तब मैंने आपसे कहा था कि कुँवारा होना मेरे लिए वरदान साबित हुआ. बात बिल्कुल सही थी. हालांकि अब मैं इसी साल के अंत तक शादी करने की सोच रहा हूं बशर्ते लड़की नौकरी कर रही हो.

अगर परिवार में पति-पत्नी दोनों कमाते हों तो टेंशन कम रहता है. बचत भी होती है क्योंकि इस मंदी ने एक डर मन में बिठा ही दिया है कि भविष्य सुरक्षित नहीं है और कभी भी इस तरह के आर्थिक संकट से दो-चार होना पड़ सकता है.

अभी भी नौकरी की तलाश है.. फ़राज़ ख़ान

(आर्किटेक्ट)

मैं तो अभी भी नौकरी की तलाश में हँ. आर्किटेक्ट हूं, इसलिए किसी तरह गुजारा कर रहा हूं.

निजी तौर पर ही कुछ ठेके मिल जाते हैं तो खर्च निकल जाता है. किसी के घर का नक्शा बना दिया या कॉमर्शियल बिल्डिंग के कामकाज को देखने का काम मिल जाता है, इसी से कुछ पैसे बनते हैं.

मैं मानता हूं कि पिछले एक साल में काफ़ी बदलाव आ चुका है. आप भी जानते ही होंगे कि रियल एस्टेट में भी घरों के दाम बढ़ने शुरू हो गए हैं लेकिन नौकरी आसान नहीं रही.

जब मेरी नौकरी गई थी तब मेरी सैलरी 23 हज़ार रूपए थी. आप विश्वास करेंगे, उसके बाद आठ महीने में कम से कम अस्सी इंटरव्यू दे चुका हूँ.

हर जगह यही कहते हैं, "आप लोगों ने पहले तो काफी पैसे कमाए लेकिन अब तो 23 हज़ार नहीं मिलेगा आपको. मंदी का ज़माना है. इसलिए बताइए क्या किया जाए."

आप ही कहिए 23 से भी कम पर कैसे गुजारा होगा. अब इस तरह के सवालों का क्या जवाब दिया जाए जब वे पूछते हैं, 'नौकरी क्यों छोड़ी. आपने ज़रूर कुछ ग़लत किया होगा.'

शादी भी संभव नहीं

जब मै पर्मानेंट नौकरी करता था तो टेंशन नहीं थी. निश्चित तारीख़ को पैसे मिलते थे. अब तो ये बात रही नहीं.

इसलिए शादी भी नहीं कर सकता. बताओ न, दिल्ली में 15-16 हज़ार रूपए लेकर परिवार कैसे चलेगा? क्या करूं? ऐसे में शादी की बात सोच भी नहीं सकता.

नए साल का तोहफ़ा भयानक था

क्या घर से लगातार पैसा लेता रहूं. ये हमेशा तो नहीं चल सकता न.

बस इसी उम्मीद में बैठा हूं कि वर्ष 2010 की शुरुआत सूरज की नई किरण लेकर आए. हाँ, मन में डर नहीं है क्योंकि पास में डिग्री है और क्षमता भी.

ये जो नौकरी देने वाले हैं कब तक मंदी है, मंदी है चिल्लाते रहेंगे. ये सब समय का चक्र है. बदलेगा ज़रूर.

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