मलयालियों का खाड़ी सपना खटाई में?

केरल में शक्तिपुलंगरा गाँव में खाड़ी से लौटे प्रवासी
Image caption केरल के कोल्लम ज़िले के शक्तिपुलंगरा गाँव में खाड़ी देशों से अनेक लोग लौटे है. प्रशिक्षित लोग भी रोज़ी रोटी कमाने के लिए मछली पकड़ने का काम करते हैं

क्या वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण केरल के हज़ारों मलयालियों का खाड़ी देशों में जाकर नौकरी करने का सपना खटाई में पड़ गया है? यदि केरल के नगरों और गाँवों का दौरा करें, तो ऐसा ही प्रतीत होता है.

पिछले कई दशकों से लाखों मलयाली नौकरी की खोज में विदेशों, विशेष तौर पर खाड़ी देशों का रुख़ करते रहे हैं.

दरअसल तिरुवनंतपुरम स्थित ग़ैरसरकारी संस्थान सेंटर फ़ॉर डिवेलप्मेंट स्टडीज़ के अनुसार वर्ष 2008 में हर 100 मलयाली परिवारों के 29 रिश्तेदार खाड़ी देशों में काम कर रहे थे.

सेंटर के अनुसार वर्ष 1999 से वर्ष 2008 के बीच प्रवासी मलयालियों की संख्या 14 लाख से 21 लाख हो गई थी.

आर्थिक संकट शुरु होने के बाद से हर रोज़ लगभग 200 से 300 केरल निवासी खाड़ी देशों से स्वदेश लौट रहे हैं. केरल की वाम मोर्चे की सरकार पहले ही खाड़ी देशों से वापस आने वाले लोगों के लिए 110 करोड़ रुपए के राहत पैकेज की घोषणा कर चुकी है.

केरल सरकार के वित्त मंत्री डॉक्टर थॉमस आईसेक ने कहा है कि सरकार के अनुमान के अनुसार कम से कम पाँच लाख मलयाली अगले कुछ महीनों में राज्य में लौट सकते हैं. राहत पैकेज के बावजूद राज्य सरकार इन बेरोज़ग़ार लोगों को दोबारा बसाने और इस चुनौती के सामने राज्य की अर्थव्यवस्था को स्थिर रख पाने की चुनौती का सामना कर रही है.

खाड़ी से लौटे, मछली पकड़ने में जुटे

केरल के तटवर्ती क़ौल्लम ज़िले में शक्तिपुलनगरा एक ऐसा गाँव है जिसमें हर परिवार का कोई न कोई जन खाड़ी देशों में काम कर रहा था. अब वहाँ लगभग 1000 लोग ऐसे हैं जो खाड़ी देशों में अपनी नौकरी से हाथ धोकर लौटे हैं. इनमें से अधिकतर निर्माण क्षेत्र की अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के लिए काम किया करते थे.

शक्तिपुलनगरा गाँव के टाइटस एंथनी ने बताया, "कुछ महीने पहले तक मैं दुबई में ड्राइवर की नौकरी करता था और मुझे 80 से 100 दिरहम (यानी 800 से 1000 रुपए) मिलते थे. लेकिन नौकरी के जाने के बाद जब लौटा हूँ तो मछुआरों के लिए नेट बुनता हूँ और प्रतिदिन 150 रुपए ही जुटा पाता हूँ."

इसी तरह जोस, विलियम और क्लेटस भी बहुराष्ट्रीय निर्माण कंपनियों के लिए काम करते थे और जब उन्हें भारत लौटना पड़ा तो उन्हें बताया गया था कि उन्हें जल्द वापस बुला लिया जाएगा. क्लेटस ने हमें बताया, "मैंने कल भी अपनी कंपनी के मालिक को फ़ोन किया था. मुझे कहा गया है कि मैं कुछ महीने और इंतज़ार करुँ. अब हम मछुआरों के साथ नौकाओं में सहायक बन कर मछली पकड़ने जाते हैं और देहाड़ी मिलती है कुल 150 रुपए."

वीज़ा लेने वाले घटे

केरेला एसोसिएशन ऑफ़ ट्रैवल एजेंट्स के अध्यक्ष केवी मुरलीधरन का कहना है, "हमारे ज़रिए खाड़ी देशों में जाने वाले प्रवासियों से बातचीत और आवाजाही के रुझान के मुताबिक हम कह सकते हैं कि नौकरी के लिए वीज़ा के आवेदन, सामूहिक वीज़ा आवेदन घटे हैं. दुबई सबसे अधिक प्रभावित प्रतीत होता है. खाड़ी देशों के लिए वीज़ा की माँग हमारे अनुभव के अनुसार लगभग 30 प्रतिशत गिर गई है क्योंकि अनेक देशों में नौकरियाँ ही नहीं हैं."

ये प्रवासी केरल की अर्थव्यवस्था में हर वर्ष करोड़ों रुपए का योगदान देते हैं. वैश्विक आर्थिक संकट के बाद जब खाड़ी देशों में नौकरी के अवसर घटे हैं तो कई परिवारों को आर्थिक तंगी महसूस हो रही है. रीयल एस्टेट यानी भूमि के कीमत घटी है और जिन लोगों ने कर्ज़ ले रखे थे वे उन्हें लौटाने में दिक्कत महसूस कर रहे हैं.

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