दक्षिण एशिया में रेमिटेंस में बढ़ोत्तरी

डॉलर
Image caption विदेशों से दक्षिण एशिया में भेजे गए धन में से 75 प्रतिशत भारत में आता है. वर्ष 2008 में भारत में 52 अरब डॉलर विप्रषित धन आया

प्रवासियों के ज़रिए अपने देश में धन भेजे जाने में हाल के वर्षों में नाटकीय इज़ाफ़ा हुआ है. ये अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रवासन, प्रवासियों के काम करने वाले क्षेत्रों में मज़दूरी बढ़ने और बैंक-हवाला अनेक माध्यमों से धन भेजे जाने के कारण हुआ है.

जिस तरह से आर्थिक संकट का असर प्रत्येक देश और क्षेत्र में अलग-अलग है, उसी तरह विप्रेषण का असर भी अलग-अलग है.

विप्रेषण या रेमिटेंस का मायने यहां उस पैसे से है जो विदेशों में रहकर काम कर रहे लोग अपने देश में अपने परिवारों को बचत या गुज़ारे के लिए भेजते रहते हैं.

बीबीसी वर्ल्ड सर्विस और अमरीका स्थिति माइग्रेशन पॉलिसी इंस्टीट्यूट के संयुक्त अध्ययन में वैश्विक आर्थिक संकट के कारण विप्रेषित धन पर हुए असर पर विस्तृत जानकारी सामने आई है. जिस तरह से आर्थिक संकट का असर प्रत्येक देश और क्षेत्र में अलग-अलग है, उसी तरह विप्रेषण का असर भी अलग-अलग है.

आर्थिक संकट के शुरु होने के बाद अनेक विकासशील देशों में प्रवासियों की ओर से भेजे गए धन में कमी आई है और दक्षिण और पूर्वी एशिया में वर्ष 2009 में इसमें कुछ कमी के संकेत हैं.

उधर पाकिस्तान और बांग्लादेश में भेजा जा रहा विप्रेषित धन बढ़ रहा है. पाकिस्तान में विप्रेषित धन के बढने की दर 23 प्रतिशत है और बांग्लादेश में ये दर 16 प्रतिशत है.

भारत का नंबर सबसे ऊपर

देशानुसार वर्ष 2008 में विकासशील देशों में जिन्हें सबसे अधिक विप्रेषित धन मिला वे क्रमनुसार थे - भारत, चीन, मैक्सिको, फिलिपींस, पौलैंड, नाइजीरिया, मिस्र, रोमानिया, बांगलादेश और वियतनाम.

विश्व बैंक की एक टीम के अनुमान के अनुसार भारत को वर्ष 2008 में लगभग 52 अरब डॉलर विदेशों से भेजे गए. दक्षिण एशिया को भेजे जाने वाले धन का लगभग 75 प्रतिशत भारत को जाता है.

विप्रेषित धन का एक और बड़ा स्रोत आप्रवासी हैं. भारत का उदाहरण लें तो विश्व बैंक के एक विश्लेषण के अनुसार आप्रवासी भारतीयों के खातों में जमा पूँजी वर्ष 2008 में गिरी लेकिन उसके बाद स्थिति बेहतर हो गई. जून 2008 में एनआरआई खातों में 39.6 अरब डॉलर थे जबकि दिसंबर 2008 में ये 36.2 अरब डॉलर थे और जून 2009 में ये बढ़कर 39.3 अरब डॉलर हो गए.

वर्ष 2008 में विकासशील देशों को रिमिटेंस में वार्षिक विकास दर के अनुसार ही रिकार्ड इज़ाफ़ा हुआ. वर्ष 2007 और 2008 में विकासशील देशों की रीमिटेंस में 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई. वर्ष 1999 और 2007 के बीच औसत वार्षिक विकास दर 18 प्रतिशत रही.

दूसरी ओर पूर्वी और दक्षिण एशियाई देशों में विप्रेषित धन का बढ़ना जारी रहा. पूर्वी एशिया को भेजे जाने वाले धन का लगभग 50 प्रतिशत चीन को जाता है.

वर्ष 2000 और 2006 के बीच लातिनी अमरीका और कैरिबियाई देश विदेशी रीमिटेंस में आगे रहे लेकिन अब पूर्वी और दक्षिण एशियाई देश आगे निकल गए हैं.

वर्ष 2000 में अमरीका 25 प्रतिशत विप्रेषित धन का स्त्रोत होता था, लेकिन इस हिस्सेदारी में काफ़ी कमी आई और वर्ष 2008 में यह आंकड़ा मात्र 10 प्रतिशत रह गया. इसके उलट रूस वर्ष 2000 में केवल एक प्रतिशत रीमिटेंस का हिस्सेदार था, जबकि 2008 में वह छह प्रतिशत विप्रेषित धन का स्त्रोत बना.

निर्यात घटा, आगे भी घटेगा

माइग्रेशन पॉलेसी इंस्टीट्यूट के रीमिटेंस और निर्यात के विश्लेषण से पता चलता है कि विकासशील देशों को धन जाने की तुलना में उनके निर्यात में ड्रामाई अंदाज़ से कमी आई है.

पाकिस्तान, कैप वर्डे और फिलिपिंस में रीमिटेंस और निर्यात एक दूसरे के विपरीत दिशा में चल रहे हैं. रीमिटेंस बढ़े हैं और निर्यात में कमी आई है. बांगलादेश में रीमिटेंस और निर्यात दोनों लगातार बढ़ रहे हैं.

विश्व बैंक के एक अनुमान के अनुसार विकासशील देशों के मामले में वर्ष 2009 में जहाँ विकासशील देशों को जाने वाला धन लगभग सात प्रतिशत घटेगा, वहीं विश्व व्यापार में 10 प्रतिशत कमी आएगी और विदेशी पूँजी निवेश लगभग 57 प्रतिशत घटेगा.

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