मौद्रिक नीति में फेरबदल नहीं

  • 27 अक्तूबर 2009
Image caption भारतीय रिज़र्व बैंक ने पिछली तिमाही में प्रमुख दरों को अपरिवर्तित रखा था

भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने मंगलवार को घोषित मौद्रिक नीति में रिवर्स रेपो रेट और सीआरआर में कोई परिवर्तन नहीं किया है.

आरबीआई के गवर्नर डी सुब्बाराव मंगलवार को मौद्रिक नीति की तीसरे तिमाही की घोषणा की.

बैंक ने सांविधिक तरलता अनुपात (एसएलआर) को एक फ़ीसदी बढ़ाकर 25 फ़ीसदी कर दिया है.

इससे अब बैंकों को सरकारी प्रतिभूतियों में पहले से अधिक निवेश करना होगा.

जानकारों का मानना है कि एसएलआर बढ़ाने का फैसला मुद्रास्फीति की आशंकाओं के मद्देनजर किया गया है.

इस समय मुख्य रूप से खाद्य पदार्थों की कीमतों में तेजी के कारण दबाव बढ़ रहा था.

रिज़र्व बैंक ने सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) का अनुमान साढे छह प्रतिशत से घटाकर छह प्रतिशत कर दिया है.

रेपो और रिवर्स रेपो

अप्रैल में रिज़र्व बैंक के गवर्नर ने रेपो और रिवर्स रेपो दर में 25 आधार अंकों यानी 0.25 फीसदी की कटौती की थी जबकि बैंक दर और नकद आरक्षित अनुपात को अपरिवर्तित रखा था.

विभिन्न वाणिज्यिक बैंक अपना पैसा रिज़र्व बैंक के ख़जाने में जमा करते हैं. इस पर रिज़र्व बैंक जिस दर से ब्याज़ देता है उसे रिवर्स रेपो दर कहते हैं.

जबकि रेपो दर ठीक इसके उलट होती है. जब रिज़र्व बैंक अन्य बैंकों को कम अवधि के लिए उधार देता है तो उस पर जिस दर से ब्याज लिया जाता है उसे रेपो दर कहते हैं.

रेपो दर बढ़ने से खुदरा कारोबार करने वाले बैंक रिज़र्व बैंक में ही पैसा रखना फ़ायदेमंद समझते हैं क्योंकि उन्हें अधिक ब्याज मिलता है.

दूसरी ओर रिवर्स रेपो दर बढ़ने से बैंकों को रिज़र्व बैंक से उधार लेने पर अधिक ब्याज का भुगतान करना पड़ता है.

दोनों तरह की ब्याज़ दरें बढ़ने से मुद्रा बाज़ार में नकदी की कमी होती है और इससे माँग घटती है जिससे कीमतों पर अंकुश लगता है.

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