दुबई संकट का असर विश्व बाज़ार पर

  • 27 नवंबर 2009
दुबई के प्रोपर्टी बाज़ार में दुबई वर्ल्ड की बड़ी हिस्सेदारी है

दुनिया की सबसे बड़ी निवेश कंपनियों में से एक दुबई वर्ल्ड की ख़स्ताहाली की ख़बरों से दुनिया भर के शेयर बाज़ारों में खलबली मची है.

गुरुवार को दुबई वर्ल्ड ने स्वीकार किया कि उसके पास कर्ज चुकाने लायक पैसे नहीं हैं. इस ख़बर के बाद यूरोप और एशियाई शेयर बाज़ारों में मानो भूचाल आ गया और भारी गिरावट का सिलसिला शुक्रवार को भी जारी रहा.

भारत में बैंकों और रियल एस्टेट कंपनियों के शेयर तेज़ी से गिरे. आनंद राठी सेक्युरिटीज के डीडी शर्मा कहते हैं, "भारत की कंपनियों ने दुबई में निवेश किया है. तो असर पड़ना लाज़िमी है. हालांकि अभी शुरुआती ख़बरें आ रही हैं. भारतीय कंस्ट्रक्शन और बैंक मध्य-पूर्व में काफी कारोबार करते हैं. दुबई वर्ल्ड से किसी भारतीय कंपनी के रिश्ते का पता नहीं है."

भारतीय बाज़ारों में दो सौ से ज़्यादा अंकों की गिरावट आई, वहीं जापानी सूचकांक निक्केई में तीन प्रतिशत और हॉंगकॉंग शेयर बाज़ार में लगभग पाँच प्रतिशत की भारी गिरावट आई. यही हाल चीन के शेयर बाज़ार का रहा.

लगभग 60 अरब डॉलर के कर्ज के बोझ से दबी दुबई वर्ल्ड सरकारी कंपनी है इसलिए बाज़ार के जानकारों में ये संदेश गया कि ये संकट सिर्फ़ एक कंपनी का नहीं बल्कि दुबई सरकार का है.

मनोवैज्ञानिक असर

भारत के मुंबई स्टॉक एक्सचेंज का सूचकांक सेंसेक्स एक समय 600 अंकों से नीचे जा पहुँचा, हालांकि बाज़ार बंद होते-होते वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा के बयान ने मरहम का काम किया और सेंसेक्स लगभग 225 अंक गिर कर 16 हज़ार 632 अंकों पर बंद हुआ.

आनंद शर्मा ने दिल्ली में पत्रकारों से कहा, "मैं नहीं मानता कि दुबई के रियल स्टेट में कुछ हुआ हो तो उसका असर भारत पर पड़ेगा. भारत की अर्थव्यवस्था बहुत बड़ी है."

ये सब ऐसे समय में हुआ है जब माना जा रहा है कि दुनिया आर्थिक सुस्ती से निकल रही है. और खास तौर पर एशिया को आर्थिक विकास का नया ध्रुव माना जा रहा है.

ऐसे में आर्थिक जानकार आलोक पुराणिक कहते हैं कि दुबई वर्ल्ड के संकट ने मनोवैज्ञानिक असर ज्यादा छोड़ा है, "जब वैश्विक आर्थिक संकट गहराया हुआ था तब भी एशियाई देशों को आर्थिक रुप से मज़बूत माना गया लेकिन इस घटना ने ये मिथक तोड़ दिया है."

उनका मानना है कि दुबई वर्ल्ड को बचाने के लिए अब नकदी उधर जाएगी जिससे बाज़ार में संकट की स्थिति पैदा हो सकती है लेकिन वास्तविक अर्थव्यवस्था की बज़ाए इसका असर वित्तीय प्रणाली पर ज़्यादा होगा.

विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्र कोष और अर्थशास्त्री भी ये चेतावनी देते रहे हैं कि आर्थिक सुस्ती से निकलने का रास्ता तो दिख रहा है लेकिन राह आसान नहीं है. शायद दुबई वर्ल्ड का मसला इसा का एक संकेत है.

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