भारतीय कंपनियों का बर्मा में निवेश का प्रस्ताव

  • 30 दिसंबर 2009
गैस संयत्र (फ़ाइल)
Image caption जानकार मानते हैं कि ये क़दम पूँजी निवेश के साथ गैस कूटनीति का हिस्सा है

भारत की दो सरकारी तेल कंपनियों – ओएनजीसी विदेश लिमिटेड और गैस अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया लिमिटेड (गेल) का 800 किलोमीटर लंबी बर्मा-चीन गैस पाइपलाइन में पूँजी निवेश करने का प्रस्ताव है. ये प्रस्ताव केवल आर्थिक दृष्टि से ही दिलचस्प नहीं बल्कि सामरिक दृष्टि से भी इस ‘गैस कूटनीति’ की ख़ासी अहमियत है.

बंगाल की खाड़ी में गैस के इतने विशाल भंडार हैं कि कहा जाता है कि वह गैस पर तैर रही है. बर्मा में भी गैस के ख़ासे भंडार हैं और जब ये मिले थे तब भारत और चीन समेत ऊर्जा की सख़्त ज़रूरत और गैस आयात करने वाले अनेक देशों के बीच प्रतिस्पर्धा शुरु हुई. भारत के लिए इसकी अहमियत इसलिए भी अधिक थी क्योंकि इससे पहले बांग्लादेश भारत को गैस देने से इनकार कर चुका है.

लेकिन बर्मा की सैन्य सरकार ने पूरी गैस चीन की सरकार को देने का अनुबंध किया है. अब दक्षिणी बर्मा से चीन की सीमा तक 800 किलोमीटर की पाइपलाइन बनाई जाएगी और इस परियोजना की लागत लगभग दो अरब डॉलर तक हो सकती है.

सूत्रों के मुताबिक भारत की ये दो सरकारी कंपनियाँ इस परियोजना में 12.5 प्रतिशत पूँजी निवेश करने की इच्छुक हैं. ग़ौरतलब है कि अभी यह इन कंपनियों का प्रस्ताव ही है और भारत के आर्थिक मामलों पर मंत्रिमंडलीय समिति की इसे हरी झंडी मिलनी बाक़ी है. जब बीबीसी ने ओएनजीसी विदेश लिमिटेड के दो उच्चस्तरीय अधिकारियों से इसके बारे में पूछा तो दोनों का कहना था, "यह एक प्रस्ताव है जो भारत सरकार के विचाराधीन है. फ़िलहाल इस बारे में कोई टिप्पणी करना उचित नहीं होगा."

भारत को गैस न मिलने और बर्मा की सरकार के चीन को गैस देने के निर्णय पर विशेषज्ञ और अपस्ट्रीम के संपादक नरेंद्र तनेजा कहते हैं, "भारत चाहता था कि गैस उसे मिले लेकिन उसकी यह विफलता है कि ऐसा नहीं हुआ. थाइलैंड और कुछ अन्य देशों की भी इसमें दिलचस्पी थी. लेकिन अब ये सारा उत्पादन चीन को जाएगा."

'ताकि चीन पर पूरी निर्भरता न हो'

दक्षिणी बर्मा से चीन की सीमा तक 800 किलोमीटर की जो पाइपलाइन बनाई जानी है और उसके लिए एक कंसोर्टियम बनाया गया है. गैस पाइपलाइनों में ख़ासे पूँजी निवेश और तकनीकी सिलाहियत की आवश्यकता होती है और अन्य देशों के साथ-साथ भारत भी इसमें हिस्सेदारी चाहता है.

दरअसल कई जानकार मानते हैं कि भारत की कोशिश है कि बर्मा का पूरी तरह से चीन की ओर झुकाव न हो जाए. गैस-तेल क्षेत्र के विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा कहते हैं, "ये केवल आर्थिक हिस्सेदारी नहीं है बल्कि सामरिक भी है. ताकि भारत की आवाज़ बर्मा में बनी रहे और बर्मा में सैन्य सरकार पूरी तरह चीन पर निर्भर न हो. भारतीय कंपनियों को रॉयल्टी मिलेगी और आर्थिक लाभ तो होगा लेकिन गैस की कूटनीति के ज़रिए भारत बर्मा की चीन पर निर्भरता को कम करना चाहता है और मेरे विचार में यह भी इस पूँजी निवेश का एक अहम मक़सद है."

ओएनजीसी विदेश लिमिटेड और गेल इंडिया लिमिटेड भारत की वो सरकारी कंपनियाँ हैं जिन्होंने भारत से बाहर अन्य देशों में पहले भी पूँजी निवेश किया है. गेल इंडिया लिमिटेड ने मिस्र में तीन कंपनियों में हिस्सेदारी की है, चीन में भी चाइना गैस होल्डिंग में भी ये सक्रिय है और गेल ग्लोबल (सिंगापोर) गेल इंडिया की मिल्कियत वाली कंपनी है. ओएनजीसी विदेश तो बर्मा, रूस, वियतनाम में पहले से पूँजी निवेश कर चुका है और अब इन कंपनियों की नज़रें टिकी हैं बर्मा पर.

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