शेयर बाज़ारों में भारी गिरावट

  • 5 फरवरी 2010
ब्रोकर
Image caption बजट से निवेशकों को कोई ख़ास उम्मीद नहीं हैं.

कुछ यूरोपीय देशों के भारी कर्ज़ में फँसने और अमरीका में बेरोज़गारी बढ़ने की ख़बरों के बीच दुनिया भर के शेयर बाज़ारों में शुक्रवार को तेज़ गिरावट आई.

भारत के बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का मुख्य सूचकांक सेंसेक्स शुरुआती दो घंटों के कारोबार में लगभग तीन महीने बाद 16 हज़ार अंकों के नीचे चला गया. इसमें चार सौ अंकों से ज़्यादा की गिरावट दर्ज की गई है.

जापान, ताइवान, दक्षिण कोरिया, चीन और थाईलैंड के शेयर बाज़ारों में भी भारी गिरावट देखी जा रही है.

गिरावट की शुरुआत गुरुवार दोपहर यूरोपीय शेयर बाज़ारों से हुई जब ग्रीस और पुर्तगाल की वित्तीय व्यवस्था को लेकर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) ने गंभीर चिंता जताई.

दोनों देशों के सरकारी बॉंड कौरी के भाव भी लेने को निवेशक तैयार नहीं है और वहाँ का सरकारी घाटा बढ़ता जा रहा है.

विश्लेषकों के मुताबिक़ दोनों देशों को मौजूदा आर्थिक समस्या से निपटने के लिए राहत पैकेज लाना पड़ सकता है.

इस ख़बर से ब्रिटेन के सूचकांक फुटसी, जर्मनी के कैक समेत अन्य मुख्य देशों के शेयर बाज़ारों में दो फ़ीसदी से ज़्यादा की गिरावट आई.

इसके बाद अमरीकी श्रम विभाग ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में बताया कि एक हफ़्ते के दौरान बेरोज़गारी भत्ता लेने वालों की संख्या आठ हज़ार बढ़ कर चार लाख अस्सी हज़ार हो गई है.

इसका सीधा असर अमरीकी शेयर बाज़ार पर पड़ा और डाउ जोंस 268 अंक गिर कर दस हज़ार अंकों पर बंद हुआ.

सेंसेक्स में गिरावट

Image caption जापान के मुख्य सूचकांक में तीन फ़ीसदी गिरावट आई

इस बीच दुनिया की पाँच प्रमुख मुद्राओं की तुलना में डॉलर की क़ीमत बढ़ने के कारण निवेशक भारत, दक्षिण कोरिया, ताइवान जैसे विकासशील देशों से पैसा खींच रहे हैं.

विदेशी निवेशक सस्ती दर पर कर्ज़ लेकर वो पैसा भारत और अन्य विकासशील देशों के शेयर बाज़ार में लगाते थे लेकिन डॉलर की मज़बूती के कारण उन्हें कर्ज़ लेने में मुश्किल हो सकती है.

इसी कारण से भारतीय शेयर बाज़ारों में विदेशी संस्थागत निवेशक लगातार मुनाफ़ा वसूली कर रहे हैं.

पिछले एक पखवाड़े में सेंसेक्स 17 हज़ार पाँच सौ से फ़िसल कर शुक्रवार को 15 हज़ार 800 के आस-पास पहुँच गया.

घरेलू निवेशकों को आगामी बजट से भी कोई ख़ास उम्मीद नहीं है. वित्त मंत्री कई बार कह चुके हैं कि वर्ष 2008 की आर्थिक सुस्ती से निपटने के लिए जो राहत पैकेज उद्योग जगत को मिला, उसे चरणबद्ध तरीक़े से वापस लेने का समय आ गया है.

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