भारत-दक्षिण अफ़्रीक़ा: 'देर से आए पर दुरुस्त आए'

  • 19 जून 2010
विक्रम दुरईस्वामी
Image caption विश्व कप की मेज़बानी दक्षिण अफ़्रीका के लिए राजनीतिक और आर्थिक रूप से अहम है

दक्षिण अफ़्रीका में जब से रंगभेद समाप्त हुआ है, भारत उसका एक अहम साझेदार बनकर उभरा है. भारत-दक्षिण अफ़्रीका व्यापार 7.5 अरब डॉलर हो गया है और जहाँ सड़को पर टाटा-महेंद्रा की गाड़ियाँ दौड़ती नज़र आती हैं, वहीं स्टेडियम्स में भारतीय कंपनियों के विज्ञापन आम हैं.

जोहानेसबर्ग स्थित भारतीय वाणिज्य दूत विक्रम दुरईस्वामी ने बीबीसी से विशेष बातचीत बताया कि दोनों देशों में निवेश और सांस्कृतिक आदान-प्रदान बढ़ा है. कई मुद्दों पर खुलकर बोलते हुए उन्होंने कहा कि सहयोग के नए रास्ते भी खुल रहे हैं.

प्रस्तुत हैं बातचीत के मुख्य अंश:

दक्षिण अफ़्रीका और भारत के रिश्ते कैसे हैं आजकल?

भारत के लिए दक्षिण अफ़्रीका बहुत महत्वपूर्ण साझेदार है. इस महाद्वीप में हमारे व्यापार और निवेश सबसे ज़्यादा यही हैं. दक्षिण अफ़्रीका इस महाद्वीप में सबसे बड़ी अर्थव्यस्था है. वैसे हमारे संबंध काफ़ी पुराने हैं. महात्मा गांधी ने सत्याग्रह की रणनीति यहीं से शुरू की. हमारे लिए दक्षिण अफ़्रीका हर तरह से एक बहुत ही अहम पार्टनर है.

अगर व्यापार और निवेश की बात करें, तो आधिकारिक रूप से रंगभेद ख़त्म होने के बाद निवेश कितना बढ़ा है?

अगर आँकड़ों की बात करें तो अभी कुल मिलाकर व्यापार 7.5 अरब अमरीकी डॉलर हो गया है. इसमें दक्षिण अफ़्रीका की ओर से व्यापार पाँच अरब डॉलर से ज़्यादा है और हमारी ओर से थोड़ा कम यानी क़रीब दो अरब डॉलर का है. लेकिन ये हमारे लिए तकलीफ़ की बात नहीं है. आजकल भारत दक्षिण अफ़्रीका से कोयला आयात करने वाला सबसे बड़ा देश है. दक्षिण अफ़्रीकी कोयला बहुत अच्छा है. हमारी आर्थिक प्रगति में ऊर्जा की अहम भूमिका है.

इससे भी ज़्यादा अहम बात ये है कि भारत से यहाँ पर निवेश बहुत बढ़ रहा है. अगर आप यहां के सड़कों पर जाएँ तो टाटा की गाड़ियाँ चलती हैं, महिंद्रा की गाड़ियाँ चलती हैं. अगर आप स्टेडियम में जाएँ, तो महेंद्रा सत्यम के विज्ञापन चल रहे हैं. हम देर से आए हैं लेकिन दुरुस्त आए हैं.

Image caption रंगारंग शुरुआत के बाद दक्षिण अफ़्रीका में विश्व कप फ़ुटबॉल के मैच चल रहे हैं

व्यापार में कहा जाता है कि आपसी सहयोग बना रहे, तभी लंबे समय तक रिश्ते चलते हैं, तो क्या भारत की तरह दक्षिण अफ़्रीका की ओर से भी भारत की तरह निवेश हो रहा है?

दक्षिण अफ़्रीका की कुछ बड़ी कंपनियाँ भारत में भी मौजूद हैं. मुंबई में जो हवाई अड्डे का आधुनिकीकरण हो रहा है, उसमें एयरपोर्ट्स कंपनी ऑफ़ दक्षिण अफ़्रीका और बिडवेस्ट मिल कर काम कर रहे हैं. दक्षिण अफ़्रीकी की एक बड़ी केमिकल कंपनी सैसॉल टाटा के साथ उड़ीसा में एक संयुक्त उपक्रम लगा रहा है, जिसमें कोयले से तेल निकाला जाएगा. इस कंपनी के पास ये ख़ास किस्म की तकनीक है. दक्षिण अफ़्रीका का फ़र्स्ट नेशनल बैंक मुंबई में है, यहाँ की इंश्योरेंस कंपनियाँ ओल्ड म्युचुअल, होलार्ड और सानलाम सब भारत में मौजूद हैं.

दक्षिण अफ़्रीका में भारतीय लोग बहुत बड़ी संख्या में हैं और यहाँ की अर्थव्यवस्था में उनका अहम योगदान है. क्या यहाँ की सरकार उनकी चिंताओं पर ध्यान देती है?

यहाँ के भारतीय लोग सौ साल से भी ज़्यादा समय से हैं. यहाँ के भारतीय मूल के लोग पहले दक्षिण अफ़्रीकी हैं. उसके बाद अपनी भारतीय संस्कृति को क़ायम रखते हैं. हिंदू हों या मुसलमान, गुजराती हों या केरल के- ये सब लोग भारतीय संस्कृति निभाते हैं लेकिन पहले अपने आप को दक्षिण अफ़्रीकी समझते हैं. रंगभेद के ख़िलाफ़ आंदोलन में भारतीय मूल के लोगों ने काफ़ी अहम योगदान दिया था. ये हमारे लिए गर्व की बात है कि भारतीय मूल के लोग इस मुल्क का एक अहम हिस्सा हैं.

दक्षिण अफ़्रीका में आधिकारिक रूप से रंगभेद ख़त्म हुए 16 साल हो गए हैं लेकिन अब भी ये कहा जाता है कि इसके अंश मौजूद हैं, दीवार अब भी है. इस स्थिति में क्या भारतीय अपने आप को सुरक्षित महसूस करते हैं?

भारत सरकार के प्रतिनिधि के रूप में इस पर टिप्पणी करना अनुचित होगा लेकिन निजी तौर पर मुझे महसूस होता है कि 16 साल में तेज़ी से बदलाव हुए हैं. ये बदलाव सिर्फ़ ऊपरी तौर पर नहीं हुआ है, ये बदलाव नीचे तक गया है. कोई ऐसी ऐतिहासिक प्रक्रिया नहीं है जो एक दिन में हो जाए. उसको थोड़ा समय चाहिए. अगर आप जोहानेसबर्ग के शॉपिंग मॉल में जाएँ, रेस्टोरेंट्स में जाएँ, स्टेडियम में जाएँ, आप देखेंगे कि हर रंग, हर रूप के लोग एक साथ बैठते हैं. एक साथ फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप का आनंद ले रहे हैं. ये इस समाज में बदलाव की एक और अहम कड़ी है. मेरे दक्षिण अफ़्रीकी दोस्त भी यही मानेंगे कि रंगभेद के ख़िलाफ़ जो काफ़िला निकला है, वो रास्ते पर है, लेकिन अभी उसे मंजिल नहीं मिली है.

दक्षिण अफ़्रीका की अर्थव्यवस्था की बात करें, तो ये भारत से बहुत पीछे हैं. पिछले दिनों तो ये नकारात्मक में चला गया है. यहाँ आधारभूत सुविधाओं मसलन सार्वजनिक यातायात की बहुत समस्या है...इसके बावजूद यहाँ विश्व कप का आयोजन हो रहा है, इसके पीछे क्या वजह है?

इस पर भी कैसे टिप्पणी करें. अगर इतिहास की ओर देखें, तो यहाँ सार्वजनिक यातायात व्यवस्था आम लोगों के लिए नहीं थी. एक समुदाय के लिए पूरे शहर बने थे. बाक़ी दूसरे रंग के लोगों को दूर रखा गया था, क्योंकि वे सेवा करने वाले लोग थे. उस समय उनको ये नहीं समझा गया था कि ये देश का हिस्सा हैं. अब सार्वजनिक यातायात व्यवस्था धीरे-धीरे बन रही है, क्योंकि अब इसकी आवश्यकता है. तो ये प्रक्रिया है, ये हो रहा है. लेकिन आप बाक़ी आधारभूत सुविधाएँ देखें, हवाई अड्डा देखें, सड़कें देखें, स्टेडियम देखें, तो आपको बदलाव नज़र आएगा. इस देश में खेल का अपना एक कल्चर है. इस देश में हर समुदाय खेल में शामिल रहा है. भारतीयों की भी रही है, अफ़्रीकी लोगों की भी रही है. इसलिए राजनीतिक और आर्थिक रूप से विश्व कप की मेज़बानी काफ़ी अहम है. ऐसे खेल अफ़्रीका में आने भी चाहिए क्योंकि यहाँ खेल काफ़ी अहम हैं और अफ़्रीका में अगर आ रहा है तो दक्षिण अफ़्रीका को छोड़कर दूसरा कोई मुल्क नहीं था, जो राजनीतिक तौर पर इतना मज़बूत था और जहाँ आधारभूत क्षेत्र में इतना निवेश था.

लेकिन ये तो आप मानेंगे कि भारत की अर्थव्यवस्था दक्षिण अफ़्रीका से काफ़ी मज़बूत है फिर उसे ऐसे अहम मुक़ाबलों की मेज़बानी क्यों नहीं मिलती?

शायद जब हमारा फ़ुटबॉल स्टैंडर्ड ऊपर आ जाए, तो हो जाए. एशियाई देशों में विश्व कप फ़ुटबॉल कराने में कोई समस्या नहीं है. जापान और दक्षिण कोरिया में आयोजन हो भी चुका है. लेकिन जापान और दक्षिण कोरिया कई बार विश्व कप के लिए क्वालीफ़ाई हो चुके हैं. तो हमें भी उस पर ज़ोर लगाना पड़ेगा कि हम पहले क्वालीफ़ाई करें. फिर शायद हम मेज़बानी के लिए दावा भी कर सकते हैं.

आप किस टीम का समर्थन कर रहे हैं?

मैं यहाँ रह रहा हूँ, तो दक्षिण अफ़्रीका को समर्थन कर रहा हूँ. इस मुल्क में अपनी टीम का जनसमर्थन देखकर बहुत अच्छा लगता है. आप स्टेडियम में जाकर दक्षिण अफ़्रीकी टीम का झंडा लहराएँ, तो लोगों को भी अच्छा लगता है कि उनकी टीम पूरी दक्षिण अफ़्रीका का प्रतिनिधित्व कर रही है. इस देश के लिए यह ऐतिहासिक मौक़ा है.

Image caption आजकल दक्षिण अफ़्रीक़ा में लोगों पर फ़ुटबॉल का जुनून छाया हुआ है

भारत-दक्षिण अफ़्रीका में सांस्कृतिक आदान-प्रदान के लिए नियमित कोई आयोजन होते हैं क्या?

जोहानेसबर्ग और डरबन में हमारे कल्चरल सेंटर भी हैं, जिन्हें और मज़बूत किया जा रहा है. हर साल हम एक विशेष उत्सव का आयोजन करते हैं. उसमें हम साहित्य लाते हैं, नृत्य लाते हैं, थियेटर लाते हैं, संगीत लाते हैं और खाना भी लाते हैं. एक महीने के लिए पूरा भारतीय महीना होता है. ये महीना सितंबर के शुरू से अक्तूबर के शुरू तक चलता है. ऐसा तीन साल से चल रहा है.

विश्व कप के दौरान भारत से कितने लोग यहाँ आए हैं?

हमारे पास आँकड़े तो नहीं हैं. हमें पता लगाना होगा. लेकिन हमारा जो आकलन है, उसके हिसाब से कुछ हज़ार लोग यहाँ आए हैं.

भारतीय खाने का तो यहाँ पर काफ़ी क्रेज है, भारतीय फ़िल्मों का यहाँ कितना क्रेज है?

बहुत है. अगर आप देखें तो यहाँ के सिनेमाघरों में नई-नई फ़िल्में दिखाई जा रही हैं. फ़िल्म राजनीति अभी चल रही है, उससे पहले काइट्स लगी थी. जो हमारे एनआरआई हैं यहाँ पर, उन्हें यहाँ पर हमारा कल्चर, हमारा खाना और हमारी फ़िल्में मिस करने का कोई चांस नहीं है.

अगले कुछ वर्षों में भारत की दक्षिण अफ़्रीका में रणनीति क्या रहेगी?

हमारी यहाँ दीर्घकालिक योजना है. हमें ऊर्जा के क्षेत्र में साझेदारी करनी है, हमें तकनीक के क्षेत्र में पार्टनरशिप करनी है. हमें लगता है कि आने वाले वर्षों में हमारा निवेश यहाँ और बढ़ेगा.

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