भारत चढ़ा, जापान गिरा

  • 31 अगस्त 2010
Image caption भारत की आर्थिक तेज़ी में घरेलू खपत का योगदान है

जापान और भारत से मिले ताज़ा आर्थिक आंकड़ो से इस बात को बल मिलता है कि धनी देशों और विकासशील देशों की आर्थिक प्रगति का मौजूदा पैटर्न एक-दूसरे से बिल्कुल अलग है.

ताज़ा आंकड़ों के अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था जून में समाप्त तिमाही में 8.8 प्रतिशत के दर से बढ़ी है. भारत के लिए ये पिछले दो वर्षों की सर्वोच्च विकास दर है.

इसी अवधि में जापान की आर्थिक विकास दर मात्र 0.4 प्रतिशत रही.

भारत की आर्थिक विकास दर में मुख्य योगदान औद्योगिक उत्पादन और खनन क्षेत्र में आई तेज़ी का रहा है. पिछली तिमाही में इन दोनों क्षेत्रों में साल भर पहले के मुक़ाबले क्रमश: 12 प्रतिशत और 9 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.

सेवा क्षेत्र भी ज़्यादा पीछे नहीं रहा जिसमें क़रीब 10 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई. उल्लेखनीय है कि भारतीय अर्थव्यवस्था का 55 प्रतिशत हिस्सा सेवा क्षेत्र का है जिसमें बैंकिंग और होटल व्यवसाय भी शामिल हैं.

इसी के साथ भारत ने चीन के बाद दूसरी सबसे तेज़ वृद्धि दर वाली अर्थव्यस्था का दर्जा बरकरार रखा है.

मंदी का डर

दूसरी ओर बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के पैमाने पर चीन से पीछे छूटते जा रहे जापान की आर्थिक स्थिति बाक़ी विकसित देशों के पैटर्न पर ही है, यानि नाम मात्र का आर्थिक विकास और एक मंदी से उबरने के तुरंत बाद दूसरी मंदी का डर.

यदि दूसरी मंदी की आशंका आगे चल कर सही साबित हुई तो इसका असर कमोबेश सभी विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर ज़रूर पड़ेगा क्योंकि धनी देशों को उनका निर्यात प्रभावित होगा.

भारत की आर्थिक प्रगति के बारे में एक और महत्वपूर्ण बात ये है कि ये बहुत हद तक घरेलू खपत पर आधारित है, लेकिन चीन और अन्य कई विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता.

इसलिए अमरीका और अन्य धनी देशों को दोबारा मंदी का सामना पड़ा तो विकासशील देशों का उससे बचना या नहीं बचना इस बात पर काफ़ी कुछ निर्भर करेगा कि उनकी घरेलू खपत कितनी ज़्यादा है और वे आपस में कितना व्यापार करते हैं.

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