सरकार ने जीडीपी आंकड़ों में सुधार किया

  • 2 सितंबर 2010

वित्त वर्ष 2010-11 की पहली तिमाही में आर्थिक विकास दर की गणना को लेकर पैदा हुए विवाद को समाप्त करने के लिए सरकार ने क़दम उठाया है.

बुधवार की देर शाम सरकार ने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर के बाज़ार कीमत वाले आंकड़े को दुरुस्त करते हुए इसे 10 फ़ीसदी कर दिया है.

मंगलवार को जारी आंकड़ों में बाजार मूल्य पर जीडीपी वृद्धि दर को 3.65 फ़ीसदी बताया था जबकि स्थिर मूल्यों पर इस दर को 8.8 फ़ीसदी बताया था.

अर्थशास्त्रियों ने दोनों आंकड़ों में भारी अंतर को लेकर सरकार का ध्यान आकर्षित किया था.

वैसे सुधार के बावजूद सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 8.8 फ़ीसदी की विकास दर के आंकड़े पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

दरअसल आर्थिक विकास को नापने के दो अलग-अलग तरीके हैं. एक तरीका बाज़ार में कीमतों का आधार बनाता है.

दूसरा तरीका सरकार और निजी क्षेत्र के खर्चे को आधार बनाता है. सरकार और निजी क्षेत्र की खर्च की गई रकम हमेशा बाज़ार की कीमत से कम होती है.

दोनों तरीकों में फ़र्क आने से अर्थशास्त्रियों में हड़कंप मचा हुआ था.

अर्थशास्त्री कहते हैं कि कृषि और उद्योग जैसे सेक्टरों में बढ़ोत्तरी से अर्थव्यवस्था में तो तेज़ी आई, लेकिन सवाल ये कि क्या देश में खपत की क्या स्थिति है.

बैंक ऑफ़ बड़ौदा की प्रमुख अर्थशास्त्री रूपा रेगे कहती हैं कि सरकारी आंकड़े ऊपर नीचे होते रहते हैं लेकिन इतना ज़्यादा फ़र्क पहली बार सामने आया.

एक उद्योग संगठन के अर्थशास्त्री ने सरकारी आंकड़ों की गुणवत्ता पर चिंता व्यक्त की थी.

उन्होंने कहा, '' ये कोई नई बात नहीं कि सरकार अर्थव्यवस्था की अच्छाइयों के बारे में तो बात करती है लेकिन बुराइयों को छिपा जाती है. इन आंकड़ों के बाद केंद्रीय रिज़र्व बैंक हरकत में आएगा और ब्याज़ दर को बढ़ाने जैसे क़दम उठाए जा सकते हैं जिससे अर्थव्यवस्था की वृद्धि में बाधा आएगी.''

यहाँ ये कहना ज़रूरी है कि कई बार चीन की अर्थव्यवस्था के बारे में वहाँ से आ रहे आंकड़ों को शक़ की निगाह से देखा जाता है.

आंकड़ों पर शक

इंडियन मर्चैंट्स चैंबर की किरन नंदा समझाती हैं, '' दरअसल कंपनियों को प्रति व्यक्ति खपत के आंकड़ें मिलते हैं वो सरकारी आंकड़ों से मेल नहीं खाते. किसी भी सेक्टर से आ रहे आंकड़ों को एक साथ मिलाकर नहीं देखा जाता. चाहे वो आरबीआई हो, वित्त मंत्रालय हो, उद्योग मंत्रालय हो या फिर वाणिज्य मंत्रालय, सभी के आंकड़े अलग होते हैं. दरअसल, किसी भी सेक्टर के बारे में संकलित आंकड़े होने चाहिए और उसके बाद अर्थव्यवस्था को लेकर आंकड़े पेश किए जाने चाहिए.''

वो कहती हैं, '' सरकार महंगाई के आंकड़े भी अपनी सुविधानुसार पेश करती है. आप इसे कैसे समझाएंगे कि एक तरफ़ रियल जीडीपी में 8.8 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई लेकिन सही मायनों में निवेश में सिर्फ़ 3.7 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई. ये एक भारी अंतर है.''

उनका कहना था, '' क्या इसका मतलब है कि भविष्य में जीडीपी में गिरावट आएगी क्योंकि अभी हो रहे निवेश का असर भविष्य में दिखेगा. बड़े बंदरगाहों में आ और जा रहे माल में गिरावट आई है. रेल के माल ढोने में ठीक-ठाक बढ़ोत्तरी हुई. औद्योगिक उत्पाद में हो रही तेज़ी में कमी आई है. इन सब बातों से साथ है कि ज़मीनी हालात उतने अच्छे नहीं हैं. आंकड़ों में इतनी भारी असंगतियाँ कभी हुई हैं.''

एक अर्थशास्त्री ने बीबीसी को बताया कि कंपनियाँ सरकारी आंकड़ों के बजाए खुद इकट्ठे किए गए आंकड़ों पर ज़्यादा भरोसा करती हैं क्योंकि उनके मुताबिक सरकारी आंकड़ों में राजनीति छुपी रहती है.

उनका कहना था कि उद्योग जगत में लोग गुस्से में हैं और उन्हें फ़ोन कर रहे हैं.

हालांकि कुछ अर्थशास्त्री ऐसे भी हैं जो इन असंगतियों को तूल नहीं दे रहे हैं क्योंकि उनके मुताबिक हर देश में ऐसी समस्याएँ आती हैं.

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