'गांवों में आर्थिक संपन्नता से बढ़ीं क़ीमतें'

भारतीय योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने कहा है कि खाद्द पदार्थों में महंगाई की एक बड़ी वजह है ग्रामीण इलाक़ों में बढ़ी आर्थिक संपन्नता.

उन्होंने कहा कि इन इलाक़ों में लोगों की खाद्यान्नों की खपत भी बढ़ी है. वहीं योजना आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा है कि योजना आयोग की मध्यावधि समीक्षा के अनुसार भारत की पिछले पांच सालों की कृषि विकास दर तीन प्रतिशत है.

खाद्य सुरक्षा विशेषज्ञो ने मोंटेक सिंह अहलूवालिया की टिप्पणी की तीखी आलोचना करते हुए कहा है कि इससे यह पता चलता है कि योजना आयोग ज़मीनी हालात से कितना दूर है.

भारत में जहां 40 प्रतिशत से ज़्यादा आबादी ग़रीबी रेखा के नीचे है उसके बारे में योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया का आकलन है कि ग्रामीण इलाक़ों में आर्थिक संपन्नता के बढ़ने से खाद्दान्नों की क़ीमत बढ़ रही है.

भारत में खाद्यान्नों की महंगाई दर पिछले सप्ताह के मुक़ाबले एक प्रतिशत कम हुई है लेकिन अब भी 15 प्रतिशत के ऊपर है.

योजना आयोग के एक महानिदेशक डॉक्टर संतोष मेहरोत्रा यह तो नहीं कहते कि ग्रामीण इलाक़ों में समृद्धि बढ़ी है लेकिन आय में वृद्धि को महंगाई की एक वजह कहने को तैयार है.

आलोचना

डॉक्टर संतोष मेहरोत्रा ने कहा, "यूपीए सरकार के क़दमों से ग्रामीण इलाक़ों में लोगों की आय में वृद्धि हुई है. राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना की वजह से भूमिहीन किसानों, मज़दूरों और अनुसूचित जाति के लोगों की आय बढ़ी है. वहीं पिछले कुछ सालों में सरकार ने कई खाद्यान्नों के न्यूनतम समर्थन मूल्य को लगभग दोगुना कर दिया है जिससे दूसरे किसानों को भी फ़ायदा पहुंचा है. मगर यह भी नहीं भूलना चाहिए की किसानों की आत्महत्याओं में कोई कमी नहीं आयी है."

लेकिन कृषि और खाद्य सुरक्षा विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा ने योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह की टिप्पणी की आलोचना करते हुए इसे दुर्भाग्यपूर्ण और उसे सरासर ग़लत बताया.

उन्होंने कहा, "नैशनल सैंपल्स सर्वे ओपरेशंस ने 2008 में जो रिपोर्ट पेश की थी उसमें कहा था कि ग्रामीण और शहरी इलाक़ों में लोगों के सामान्य और पौष्टिक आहार में कमी आई है. इससे यह पता चलता है कि योजना आयोग ज़मीनी हालात से कितना दूर है और किसके लिए योजना बना रहा है."

योजना आयोग के डॉक्टर संतोष मेहरोत्रा इस बात पर बल देते हैं कि जहां कृषि विकास दर तीन प्रतिशत पर अटकी हुई है वहीं चीनी के उत्पादन में डेड़ प्रतिशत की कमी हुई है और गेहूं और चावल के उत्पादन में वृद्धि भी 2 से ढाई प्रतिशत तक रही है जो काफ़ी नहीं है.

लेकिन डॉक्टर संतोष मेहरोत्रा का मानना है कि ग़रीबों की कमर तोड़ने वाली खाद्यान्नों की क़ीमतों की एक सबसे बड़ी वजह सार्वाजानिक प्रणाली में व्यापक भ्रष्टाचार है क्योंकि सरकार की ओर से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ख़रीदा हुआ अनाज ग़रीबी रेखा से उबरने की कोशिश करने वालों की झोली के बजाय कालाबाज़ारियों के पास पहुंच जाता है.

सरकारी बहस के बीच उलझा खाद्य सुरक्षा विधेयक लोगों की ज़िंदगी में कब आएगा इसका सबको इंतज़ार है.

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