अर्थव्यवस्था में 600 अरब डालने की घोषणा

  • 4 नवंबर 2010
अमरीकी फ़ेडरल रिज़र्व

अमरीकी संसद के चुनावों में राष्ट्रपति बराक ओबामा को अपने कार्यकाल का सबसे गंभीर झटका लगने के बाद अमरीका के केंद्रीय बैंक फ़ेडरल रिज़र्व ने अर्थव्यवस्था में तेज़ी लाने के लिए 60 ओरब की राशि अर्थव्यवस्था में डालने की घोषणा की है.

ओबामा की डेमोक्रेटिक पार्टी ने मध्यावधि संसदीय चुनावों प्रतिनिधि सभा में बहुमत खो दिया है और राष्ट्रपति ने कहा है कि मतदाता आर्थिक मंदी से उबरने की धीमी गति से निराश हैं.

अमरीकी फ़ेडरल रिज़र्व के फ़ैसले के अर्थव्यवस्था में अरबों डॉलर झोंकने के बाद गुरुवार सुबह एशियाई शेयर बाज़ारों में तेज़ी आई है और जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, हॉंगकॉंग, मलेशिया, सिंगापुर और ताईवान के शेयर बाज़ार ऊपर चढ़े हैं.

अगले साल के मध्य तक

अमरीकी फ़ेडरल रिज़र्व की 600 अरब डॉलर अर्थव्यवस्था में झोंकने की घोषणा तमाम प्रयासों के बावजूद देश में अर्थव्वयस्था में सुधार की गति धीमी रहने के बाद की गई है.

यह राशि अगले साल के मध्य तक दी जाएगी. नई घोषित नीति के तहत अमरीका का केंद्रीय बैंक वित्तीय बाज़ार में अपनी सक्रियता बढ़ाएगा और सरकारी बॉन्ड्स और उनकी देनदारियों को ख़रीदेगा.

Image caption कुछ विशेषज्ञों ने मुद्रा यु्द्ध की चेतावनी भी दी है

इन सबके लिए वो कुछ नए स्रोतों से अर्जित धन ख़र्च करेगा.

अर्थव्यवस्था में धन के इस प्रवाह को बढ़ाने की इस योजना को इसीलिए 'क्वांटिटेटिव इज़िंग' यानी तनाव में परमाणात्मक कमी की संज्ञा दी गई है.

बेरोज़गारी की समस्या

जहाँ तक संघीय बैंक का सवाल है तो जानकारों के मुताबिक़ बैंक को सरकारी कर्ज़ और दूसरी देनदारियों पर ब्याज़ दर में कमी करनी चाहिए जिससे कि व्यापार के ज़रिए और आम लोगों के ज़रिए होने वाले ख़र्च को बढ़ावा मिले.

इस पूरी क़वायद का मक़सद अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना है जिसकी रफ़्तार काफ़ी धीमी है.

अमरीका में 9.6 प्रतिशत कामकाज़ी लोग बेरोज़गार हैं. इसके अलावा ऐसे और लोग भी हैं जिन्हें काम की तलाश है और उनकी कोई आधिकृत गिनती भी नहीं हुई है.

केंद्रीय बैंक की एक दूसरी चिंता मुद्रास्फीति में आई कमी भी है जिसकी वजह से क़ीमतों में गिरावट की आशंका है. यदि ऐसा हुआ तो इससे एक अलग समस्या उत्पन्न हो जाएगी.

अर्थव्यवस्था में धन के तेज़ी से प्रवाह का एक ख़तरा ये भी है कि इससे मुद्रास्फीति में भी बढ़ोत्तरी हो सकती है. साथ ही वित्तीय संपत्तियों की क़ीमतों में भी अस्थिरता का डर है.

इन्हीं सब ख़तरों को देखते हुए केंद्रीय बैंक की इस नीति को निर्धारित करने वाली समिति के एक सदस्य ने इसके ख़िलाफ़ वोटिंग की है.

उसने चेतावनी दी है कि इन सब उपायों से देश की अर्थव्यवस्था अस्थिर हो सकती है साथ ही इससे डॉलर भी कमज़ोर हो सकता है.

डॉलर का कमज़ोर होना उस स्थिति का सूचक हो सकता है जिसे करेंसी वॉर यानी 'मुद्रा-युद्ध' कहते हैं. कुछ आलोचकों का ये भी कहना है कि इस फ़ैसले के साथ ही अमरीका दुनिया के अन्य देशों की परेशानियों को अपने सिर पर उठा रहा है.

हालांकि बहुत से अर्थशास्त्रियों ने केंद्रीय बैंक के इस फ़ैसले का समर्थन भी किया है.

बहरहाल जानकारों का यही कहना है कि बराक ओबामा को यदि दोबारा चुनाव जीतना है तो उन्हें अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने की रफ़्तार तेज़ करनी ही होगी.

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