आउटसोर्सिंग का मामला आएगा ओबामा के सामने

बराक ओबामा
Image caption अमरीकी राष्ट्रपति को कई सवालों से जूझना पड़ सकता है

भारत के सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र को अमरीकी राष्ट्रपति की भारत यात्रा का काफी इंतज़ार है.

इनफ़ोसिस के अध्यक्ष एस गोपालकृष्णन ने हाल में बंगलौर में मीडिया से बातें करते हुए कहा वह आउटसोर्सिंग के मुद्दे को राष्ट्रपति ओबामा और उनकी टीम के सामने रखेंगे. पिछले एक-डेढ़ साल से आउटसोर्सिंग का मामला दोनों देशों के बीच रिश्ते में थोड़ी कड़वाहट का कारण रहा है.

अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा के दौरान जिन मुद्दों पर बातचीत होगी उनमें ईटी क्षेत्र में आउटसोर्सिंग पर लगे प्रतिबंध और एच 1 वीजा की फीस में भारी बढ़ोतरी के मामले भी शामिल हैं. दोनों देशों के बीच 2005 में बने सीईओ मंच पर भी इन मुद्दों पर बहस होने की संभावना है. दो साल पहले राष्ट्रपति बनने के बाद से बराक ओबामा ने अक्सर आउटसोर्सिंग पर चिंता जताई है और इसे रोकने के लिए अब तक जो कदम उठाए हैं उनसे भारतीय ईटी कंपनियों को आमतौर पर नुक़सान हुआ है.

इसी लिए कभी कभी उन्हें भारत में जॉर्जे बुश की तरह एक दोस्त की तरह से नहीं देखा गया है. भारत और अमरीका के बीच व्यापार 44 अरब डॉलर का है जिस में सर्विसेज़ या सेवा उद्योग का योगदान 22 अरब का है.

अमरीका में भारतीय राजदूत मीरा शंकर के अनुसार दोनों देशों के बीच आर्थिक रिश्ते केवल मज़बूत ही नहीं हो रहे हैं बल्कि संतुलित भी हैं.

सेवा उद्योग में अमरीका से भारत को साढ़े दस अरब डालर की सेवाएँ निर्यात की जाती हैं जबकि भारत से अमरीका को 12 अरब डॉलर का निर्यात होता है. यानी अगर भारत में अमरीकी के सर्विज़ेस उद्योग के कारण से नौकरियां आती हैं तो भारत से भी निर्यात के कारण अम्रीका में नौकरियों के अवसर पैदा होते हैं.

भारतीय दूतावास के एक बयान के मुताबिक अमरीका में भारतीय निवेश 20 अरब डालर की लागत का है जिसके कारण तीन लाख के करीब नौकरियों के अवसर पैदा हुए हैं. मारिलैंड विश्वविद्यालय की छात्रा नम्रता चिन्दरकर चाहती हैं कि राष्ट्रपति ओबामा अपनी भारत यात्रा के दौरान आउटसोर्सिंग और वीजा फीस की बढ़ोतरी के मामलों पर विचार करें.

ईटी क्षेत्र के एक बड़े अधिकारी जिनका संबंध भारत के राज्य केरल से है अमरीका में बढ़ती बेरोज़गारी के कारण अमरीकी दृष्टिकोण समझते हैं लेकिन उनका कहना है अमरीका में बेरोज़गारी की समस्या भारत को किये जाने वाले आउटसोर्सिंग के कामों के कारण नहीं है.

उनके अनुसार दुसरे क्षेत्रों में भी काफी बेरोज़गारी है. लेकिन अगर राष्ट्रपति ने भारतीयों की बात नहीं सुनी तो क्या इस से दोनों देशों के बीच रिश्ते बिगड़ सकते हैं?

ऐसा भारतीय प्रशासन नहीं समझता. वॉशिंगटन में भारतीय राजदूत मीरा शंकर के विचार में आउटसोर्सिंग जैसे मामलों से ऊपर उठ कर सोचना चाहिए.

वह कहती हैं, "एक तो यह समझना चाहिए कि रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टी दोनों हिन्दुस्तान से रिश्ता मज़बूत करना चाहती हैं. आउटसोर्सिंग का जो सवाल है हम यह सोचते हैं कि पूरे रिश्ते को देखना चाहिए." भारती अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया के वरिष्ठ वॉशिंगटन संवादाता चिदानंद राजघट्टा कहते हैं यह कोई मुद्दा है ही नहीं. उनके अनुसार भारत को समझना होगा की यह अमरीकी जनता की राजनीति की मजबूरी है.

वह कहते हैं, "अमरीका में बेरोज़गारी का बढ़ना राष्ट्रपति ओबामा की लिए एक चिंता का विषय है. यह यहाँ एक राजनीतिक मामला है. और भारत के लिए यह कोई बड़ा मुद्दा भी नहीं है." भारत का सूचाना प्रौद्योगिकी क्षेत्र 60 अरब डॉलर का है और भारत इस का 60 प्रतिशत हिस्सा अमरीका को निर्यात करता है.

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