अर्थव्यवस्था: इस वर्ष की चुनौतियां

सोना

विश्व बैंक ने ‘ग्लोबल इकॉनॉमिक प्रास्पैक्ट्‌स रिपोर्ट’ में अनुमान लगाया है कि आने वाले समय में विश्व अर्थव्यवस्था में सुधार आएगा.

वर्ष 2010 में औद्योगिक देशों की विकास दर 2.2 प्रतिशत रही. अगले के अगले साल यानी वर्ष 2012 में इसके 2.5 प्रतिशत तक बढ़ने के आसार हैं.

विकासशील देशों की विकास दर छह प्रतिशत के सम्मानजनक स्तर पर कायम रहने की आशा है. इस सकारात्मक आकलन के साथ-साथ विश्व बैंक ने स्वीकार किया है कि विकसित देशों में ऋण की समस्या से ख़तरा उत्पन्न हो सकता है.

विश्लेषकों का मानना है कि ऋण के साथ-साथ महंगाई की समस्या भी उत्पन्न हो सकती है. हमारे सामने परस्पर दो विरोधी परिदृश्य उपलब्ध हैं- एक ओर आर्थिक विकास दर में सुधार हो रहा है तो दूसरी तरफ ऋण का ख़तरा बढ़ रहा है. प्रश्न है कि इसमें कौन सी प्रवृत्ति प्रभावी होगी?

इस प्रश्न का उत्तर ढ़ूंढने के लिए हमें गत तीन वर्षों में उत्पन्न हुए वैश्विक संकट के कारणों को समझना होगा.

संकट की जड़ें

Image caption अमरीका में मंदी से उबरने के लिए केंद्रीय बैंक 'फ़ेडरल रिज़र्व' ने 600 बिलियन डॉलर के पैकेज का ऐलान किया है.

संकट के पूर्व, विकसित देश तेज़ी से आगे बढ़ रहे थे. इन देशों में श्रमिकों के वेतन ऊंचे थे. मसलन अमरीका में अकुशल श्रमिक का दैनिक वेतन लगभग 4000 रुपए है जबकि भारत में केवल 200 रुपए. इस आय के आधार पर विकसित देशों के लोग भारी मात्रा में खर्च भी कर रहे थे.

इनकी खपत की पूर्ति के लिए विकासशील देशों का माल सप्लाई किया जा रहा था. जैसे भारत से बासमती चावल और चीन से खिलौने. विकसित देशों में नई तकनीकों का विकास हो रहा था जैसे पर्सनल कंप्यूटर, इंटरनेट, हाईब्रीड कार इत्यादि.

विकासशील देशों की ये सुखद परिस्थिति पिछले चार-पांच वर्षों में दबाव में आ गई है क्योंकि नए हाईटेक आविष्कारों में ठहराव आ गया है. नब्बे के दशक में इंटरनेट के बाद विश्व में किसी और प्रभावी तकनीक का अविष्कार नहीं हुआ है.

साथ-साथ विदेशी निवेश के माध्यम से पश्चिमी देशों ने अपनी 'एडंवास्ड' तकनीकों को भारत और चीन को हस्तांतरित कर दिया है. जैसे कि भारत में हाईब्रीड कारें बनने लगी हैं.

उधर अमरीका में 'स्टिमुलस पैकेज' के अंतर्गत टैक्स में छूट बढ़ाई गई है. फलस्वरूप सरकार की आय कम हो रही है. इसके चलते सरकार को नोट ज्यादा छापने पड़ रहे हैं. 'स्टिमुलस पैकेज' के अंतगर्त सरकारी खर्च भी बढ़ाए जा रहे हैं जैसे पुरानी कार को स्क्रैप करके अधिक एवरेज देने वाली नई कारें खरीदने के लिए नागरिकों को सब्सिडी दी गई है.

इन ख़र्चों को पोषित करने के लिए सरकार को फिर से नोट छापने पड़ रहे हैं. नोट छापने से घरेलू अर्थव्यवस्था में महंगाई पैठ बना रही है. सरकारी खर्चों को पोषित करने के लिए भारी ऋण भी लिए जा रहे हैं. फलस्वरूप इन देशों की मुद्राएं भी दबाव में आ रही हैं. ये देश महंगाई और ऋण के दोहरे दलदल में धंसते जा रहे हैं.

अमरीका-यूरोप के लिए ये साल

Image caption यूरोप में संकट गहराता जा रहा है.

इस पृष्ठभूमि में 2011 के वैश्विक परिदृश्य का अनुमान लगाया जा सकता है. अमरीका और इंग्लैंड में श्रमिकों के वेतन में कटौती का दबाव जारी रहेगा. महंगाई बढ़ने और मुद्रा के टूटने के कारण इन्हें मजबूरन 'स्टिमुलस पैकेज' को समाप्त करना ही होगा. 'स्टिमुलस पैकेज' को समाप्त करते ही वेतन में कटौती का दबाव तेज़ी से सामने आएगा और नागरिकों में हाहाकार मच जाएगा.

नागरिक आक्रोश के कारण इन देशों को संरक्षणवादी नीतियां अपनानी होंगी. परन्तु इनसे भी विशेष राहत नहीं मिलेगी क्योंकि अपनी वर्तमान खपत को बनाए रखने के लिए इन्हें भारी मात्रा में विदेशों से तेल, कपड़े, रबड़ आदि माल का आयात करना पड़ता है जो कि आगे चलकर कठिन होता जाएगा.

इसलिए अमरीका और इंग्लैंड का मूल परिदृश्य नकारात्मक है. अनुत्तरित प्रश्न सिर्फ़ ये है कि 'स्टिमुलस पैकेज' से पीछे हटने का क्रम कब चालू होगा. संभव है कि यह वर्ष 2011 में नहीं बल्कि वर्ष 2012 में हो. ऐसे में 2011 की परिस्थिति सामान्य सी बनी रहेगी.

यूरोप की परिस्थिति ज़्यादा विकट है. अमरीका और इंग्लैंड ने श्रमिकों के वेतन में कटौती को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया है. यूरोप ने ऐसा कम ही किया है. फलस्वरूप यूरोपीय देशों की परिस्थिति अंदर से ज़्यादा खोखली होती जा रही है जैसा कि ग्रीस, आयरलैण्ड और पुर्तगाल के वित्तीय संकट से पता लगता है.

जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों में भी यह संकट शीघ्र ही फैलेगा. यूरोपीय संघ को बने रहने में भी संदेह उत्पन्न होगा. फिर से दोहराना होगा कि यह विकट परिस्थिति 2011 के बाद भी उत्पन्न हो सकती है.

विकासशील देश

Image caption भारत और चीन 2011 में भी अपनी विकास गति को बनाए रखेंगे.

भारत और चीन समेत दूसरे विकासशील देशों की परिस्थिति तुलनात्मक रुप में सुदृढ़ रहेगी. वर्ष 2011 में इन पर दो विपरीत प्रभाव पड़ेंगे.

पश्चिमी देशों के संकट के गहराने से इन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. पश्चिम निवेशक घबराकर हमारे शेयर बाजारों में बिकवाली करके अपनी पूंजी को वापस स्वदेश ले जा सकते हैं.

दूसरी तरफ़ इनकी परिस्थिति सुधरेगी. 'स्टिमुलस पैकेज' के समाप्त होने के साथ-साथ पश्चिमी देशों का माल विश्व बाज़ार में महंगा होता जाएगा. साथ-साथ हमारे माल की बिक्री बढ़ेगी. पश्चिमी देशों की संरक्षणवादी नीति अपनाने के कारण यह सकारात्मक प्रभाव कुछ नरम पड़ सकता है.

परंतु मूल प्रवृत्ति हमारी प्रतिस्पर्धा करने की शक्ति के बढ़ने की होगी. इसलिए मेरा आकलन है कि विकासशील देशों की मूल चाल उर्ध्वगामी होगी.

सारांश में पश्चिमी देशों का संकट गहराएगा जबकि विकासशील देशों की चाल ऊपर की तरफ़ होगी हालांकि रुक-रुक कर.

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