जनता की कसौटी पर होगा प्रणब का बजट

Image caption शुक्रवार को प्रणव मुखर्जी ने 2011-12 के लिए आर्थिक सर्वे पेश किया था.

भारत में जहां आम जनता महंगाई की मार झेल रही है वहीं सरकार करोड़ों रुपए के घोटालों के बीच जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए जूझ रही है.

साथ ही इस साल पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. इस पृष्ठभूमि में केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी सोमवार को देश का 80वां आम बजट पेश करेंगे.

कहा जा रहा है कि वित्त मंत्री वेतनभोगियों को टैक्स में रियायत देने की घोषणा कर सकते हैं और किसानों को प्रोत्साहन की पेशकश भी.

ऐसी उम्मीद की जा रही है कि बजट में आयकर छूट की सीमा एक लाख 60 हज़ार से बढ़ाकर एक लाख 80 हज़ार तक की जाएगी.

प्रणब मुखर्जी प्रत्यक्ष-कर संहिता में पहले ही छूट सीमा बढ़ाकर सालाना दो लाख रुपए कर चुके हैं.

शुक्रवार को प्रणव मुखर्जी ने 2011-12 के लिए आर्थिक सर्वे पेश किया था जिसमें उन्होंने आर्थिक वृद्धि दर 9 फ़ीसदी तक बने रहने की संभावना जताई थी.

लेकिन उनके पास महंगाई से जूझती जनता के लिए कोई ठोस समाधान नहीं था.

महंगाई पर नियंत्रण

पिछले साल खाद्द पदार्थों और पेट्रोल की कीमत में भारी उछाल आया था और अगर कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ज़्यादा रहती है तो बढ़ती कीमतों पर सरकार का नियंत्रण खो सकता है.

खाद्य पदार्थों के दाम फिलहाल 11 फ़ीसदी तक बढ़े हुए हैं. सरकार के लिए परेशानी की सबसे बड़ी वजह है कि बढ़ती कीमतों के ज़्यादातर कारण उसके नियंत्रण-क्षेत्र से बाहर हैं.

एक ओर जहां महंगाई का मुद्दा वित्त मंत्री के एजेंडे पर होगा वहीं आर्थिक घाटे के मुद्दे को संबोधित करना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी.

वर्ष 2011-12 की आर्थिक समीक्षा में राज कोषीय घाटा 4.8 फ़ीसदी तक रहने का अनुमान जताया जा रहा है जो चालू वित्त वर्ष के लिए 5.5 फ़ीसदी से कम है.

विशेषज्ञों का कहना है कि राज कोषीय घाटा कम होकर 4.8 फ़ीसदी पर आने के अनुमान को देखते हुए वित्त मंत्री को रियायतें उपलब्ध कराने की गुंजायश मिल सकती है.

कर छूट की सीमा बढ़ाने से भले ही राजस्व में कुछ गिरावट देखने को मिल सकती है लेकिन प्रणव को उम्मीद है कि आर्थिक गतिविधियों से सरकारी खज़ाने में और धन आएगा.

आर्थिक वृद्धि रहे बरकार

अनुमान लगाया जा रहा है कि इस बजट में खाद्य सामग्री जहां सस्ती होगी वहीं होम- लोन, वाहन, शिक्षा, पेट्रोल और इलैक्ट्रॉनिक उत्पाद महंगे हो सकते हैं.

ऐसे में ब्याज दरें बढ़ाने का मतलब होगा लोन लेने वालों और आम आदमी पर दबाव बढ़ना.

जहां आम आदमी की उम्मीद है कि महंगाई पर लगाम लगाई जाए वहीं उद्योग जगत की उम्मीद है कि कॉरपोरेट टैक्स में कटौती की जाए.

उद्योग और वाणिज्य संगठन (एफआईसीसीआई) का कहना है कि आर्थिक वृद्धि को बरकार रखने वाले क़दमों में कटौती करना हितकारी नहीं होगा.

दूसरी ओर भारतीय उद्योग संस्था ‘एसोचैम’ का कहना है कि टैक्स प्रणाली की मरम्मत का जानी चाहिए.

एक समय खुद वित्तमंत्री रहे मनमोहन सिंह के उस बजट को इस वर्ष 20 साल पूरे हो गए हैं, जिसने देश को आर्थिक सुधार की राह पर अग्रसर किया.

अब देखना यह होगा कि वर्तमान वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी उद्योग जगत और आम आदमी दोनों की उम्मीदों पर खरा उतर पाते हैं या नहीं.

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