व्यापारिक रिश्तों को संवारने की कोशिश

  • 23 अप्रैल 2011
भारत-पाक
Image caption भारत पाक वार्ता के शुरू होने में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की निजी रुचि रही है

भूटान की राजधानी थिम्पू से एक बार फिर से शुरू हुई भारत-पाकिस्तान विश्वास बहाली की गाड़ी का अगला पड़ाव इस्लामाबाद में हैं.

दोनों देशों के वाणिज्य सचिव अगले सप्ताह इस्लामाबाद में मिलेगें.

पिछले वित्त वर्ष में दोनों देशों के बीच 8765 करोड़ रुपए का व्यापार हुआ जो भारत के कुल वैश्विक व्यापार का महज़ 0.04 प्रतिशत है. भारत-पाक के बीच व्यापार की ताकत कितनी है इस बात का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि मुंबई पर नवंबर 2008 के हमलों के ठीक बाद वाले वित्त वर्ष में दोनों देशों के बीच व्यापर में 6.89 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज हुई. यानी दोनों देशों के कूटनीतिक बयानों के सुर चाहे जो हों पर पैसे की रागनियाँ बदस्तूर बजती रहीं. पाकिस्तान में भारत के पूर्व उप उच्चायुक्त टीसीए रंगाचारी कहते है कि दोनों देशों के बीच व्यापार के सरकारी आँकड़े पूरा सच नहीं बताते.

रंगाचारी कहते हैं, " दोनों देशों के बीच बहुत सा व्यापार तीसरे देश के ज़रिए भी होता है. जो आंकड़ों को पढ़ते हैं वो जानते हैं कि भारत और संयुक्त अरब अमीरात और पाकिस्तान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच व्यापार भी बढ़ गया है. इसका मतलब ये कि दोनों देशों के बीच व्यापार तीसरे देश के ज़रिए भी होता है."

पाकिस्तानी आशंकाएं

भारत के साथ मुक्त व्यापार के प्रति पाकिस्तानी आशंकाओं की बात करते हुए रंगाचारी कहते हैं कि पाकिस्तान को लगता है कि भारत की औद्योगिक ताक़त इतनी बड़ी है कि पाकिस्तान बहुत ज़्यादा नुकसान में रहेगा. रंगाचारी मानते हैं कि धीरे-धीरे वैश्वीकरण के साथ इस तरह की सोच पाकिस्तान में बदल रही है. भारत का निर्यात पकिस्तान से उसके आयात से हमेशा ज़्यादा रहा है. वित्त वर्ष 2008 -09 में जब दोनों देशों के बीच व्यापर पिछले पांच वित्तीय वर्षों में सबसे कम था तब भी भारत का पकिस्तान को निर्यात पाकिस्तान से आयात के मुकाबले करीब पांच गुना ज्यादा था. मुंबई हमलों के बाद के वित्त वर्ष में भारत का पकिस्तान को निर्यात तो बढ़ा पर आयात में और ज़्यादा कमी आ गई. भारत ने पाकिस्तान को वित्तीय वर्ष 2009 -10 में करीब साढ़े सात हज़ार करोड़ रुपयों का निर्यात किया लेकिन पड़ोसी देश से आयात 1300 करोड़ रुपयों से कुछ ही ज़्यादा था.

भारतीय उम्मीद

भारत चाहता है कि पाकिस्तान उसे प्राथमिकता वाले देशों की सूची में रखे. रंगाचारी मानते हैं कि सेवा का क्षेत्र ऐसा है जहाँ अगर दोनों देशों की सरकारें केवल रास्ते खोल दें तो बाकी का काम व्यापारी खुद कर लेंगें.

वे कहते हैं, "भारत की कई कम्पनियां चाहती हैं कि वो पाकिस्तान जाएँ. वहां के युवाओं को ट्रेनिंग दें और पाकिस्तानी सेवा शर्तों के हिसाब से उन्हें नौकरियां दें. बस दोनों देशों की सरकारों को रास्ते खोलने होंगें." कहा जाता हैं की रुपया बोलता है और डर आदमी को अंधा- बहरा बना देता है. देखते हैं सोमवार को दोनों देशों के बीच वार्ता में क्या हावी होता है डर या रुपया.

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