पेट्रोल पाँच रुपए और महंगा

  • 14 मई 2011
पेट्रोल पंप

भारत की तेल कंपनियों ने पेट्रोल की क़ीमतों में पाँच रुपए प्रति लीटर की बढ़ोत्तरी करने का निर्णय लिया है.

ये क़ीमतें शनिवार की मध्यरात्रि से लागू हो जाएँगीं.

हाल के समय में पेट्रोल की क़ीमतों में ये अब तक की सबसे बड़ी बढ़ोत्तरी है.

हालांकि डीज़ल और रसोई गैस यानी एलपीजी की क़ीमतों में फ़िलहाल कोई बढ़ोत्तरी नहीं की गई है.

तेल कंपनियों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की क़ीमतों में हुई भारी बढ़ोत्तरी की वजह से पेट्रोल का दाम बढ़ाना पड़ा है.

हालांकि तेल कंपनियों को पिछले जनवरी से ही कच्चे तेल की क़ीमतों की बढ़ी क़ीमतें चुकानी पड़ रही थीं लेकिन समझा जाता है कि पाँच राज्यों के चुनावों के ध्यान में रखते हुए सरकार ने इसे रोक रखा था.

ये और बात है कि अधिकृत रूप से सरकार ने पेट्रोल की क़ीमतों से अपना नियंत्रण हटा लिया है और अब तेल कंपनियाँ ही इसका निर्णय लेती हैं.

'और बढ़ सकती हैं क़ीमतें'

तेल कंपनियों को कहना है कि आने वाले दिनों में पेट्रोल की क़ीमतें और बढ़ानी पड़ सकती हैं.

कंपनियों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत पिछले ढाई साल के अपने अधिकतम स्तर पर जा पहुँची है.

इस समय अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत 110 डॉलर प्रति बैरल से भी अधिक हो गई है.

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम ने पेट्रोल की क़ीमतों में 4.99 रुपए से लेकर 5.01 प्रति लीटर बढ़ोत्तरी का फ़ैसला किया है.

एक अधिकारी के हवाले से पीटीआई ने कहा है, "अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की क़ीमतों को देखते हुए घरेलू स्तर पर पेट्रोल के दाम साढ़े नौ रुपए से दस रुपए तक बढ़ना चाहिए लेकिन फ़िलहाल कंपनियों ने दाम आधे ही बढ़ाए हैं."

उनका कहना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेट्रोल के दाम ऐसे ही बने रहे तो जल्दी ही पेट्रोल के दाम एक बार और बढ़ाए जा सकते हैं.

कच्चे तेल के दाम

भारत सरकार ने जून, 2009 में सरकार ने पेट्रोल की क़ीमतों पर से सरकारी नियंत्रण को ख़त्म कर दिया था और इसे तेल कंपनियों पर छोड़ दिया था कि वे कच्चे तेल की क़ीमतों के आधार पर पेट्रोलियम पदार्थों की क़ीमतें तय करें.

इसके बाद से तेल कंपनियाँ ख़ुद निर्णय करती रही हैं कि वे कब क़ीमतें बढ़ाएंगीं.

संयोग से इसके बाद से अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमतें बढ़ती रही हैं और इसका सीधा असर भारतीय उपभोक्ताओं पर पड़ता रहा है.

इस समय अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत 110 डॉलर प्रति बैरल के आसपास है.

पिछले पाँच मई को ही तेल की क़ीमतों में दस प्रतिशत की गिरावट आई थी. इससे पहले तेल 120 डॉलर से भी अधिक हो गई थीं.

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Image caption मध्यपूर्व में राजनीतिक उथल-पुथल का असर भी तेल की क़ीमतों पर पड़ा है

पिछले कुछ समय की बात करें तो जुलाई 2008 में तेल की क़ीमतों में रिकॉर्ड वृद्धि हो गई थी और प्रति बैरल तेल 147 डॉलर के आसपास बिकने लगा था.

तब कुछ विशेषज्ञों ने तेल की क़ीमतें 200 डॉलर तक पहुँच जाने की भविष्यवाणी भी कर दी थी.

लेकिन इसके बाद अमरीकी अर्थव्यवस्था में मंदी का दौर शुरु हो गया और फिर यूरोप के देश इसकी चपेट में आने लगे और एकाएक तेल की क़ीमतें घटने लगीं.

दिसंबर, 2008 में कच्चे तेल की क़ीमत अपने न्यूनतम स्तर पर पहुँच गई थी. उस समय तेल 46 डॉलर प्रति बैरल की दर से मिलने लगा था.

मई 2009 में तेल की क़ीमत एक बार फिर बढ़ने लगी. इस समय तेल 66 डॉलर प्रति बैरल बिक रहा था.

तब से तेल की क़ीमतों में धीरे-धीरे बढ़ोत्तरी होती रही है.

अमरीकी और यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्था में सुधार और मध्यपूर्व देशों में राजनीतिक अस्थिरता का असर तेल की क़ीमतों पर पड़ा है.

दुनिया के कुल तेल उत्पादन का एक तिहाई इस समय मध्य पूर्व और उत्तरी अफ़्रीका से आता है. इतना ही नहीं पूरी दुनिया के ज्ञात तेल भंडार का 60 प्रतिशत इसी इलाक़े में है.

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