'कम ब्याज दरों से वित्तीय संकट का ख़तरा'

बीआईएस
Image caption बीआईएस अंतरराष्ट्रीय संस्था है जो विभिन्न देशों के केंद्रीय बैंकों को सहयोग देती है

बैंक ऑफ़ इंटरनेशनल सेटलमेंट्स (बीआईएस) चेतावनी दी है कि पूरे विश्व में बैंको की ओर से कम ब्याज दर पर कर्ज़ देना पूरी दुनिया की वित्तीय स्थिरता के लिए ख़तरा बन सकता है.

बीआईएस वो अंतरराष्ट्रीय संस्था है जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मौद्रिक और वित्तीय सहयोग बढ़ाने के प्रयास करती है और विभिन्न देशों के केंद्रीय बैंकों की संस्था के तौर पर काम करती है.

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इस संस्था का मक़सद केवल बहस और नीतिगत विश्लेषण को बढ़ावा देना ही नहीं बल्कि केंद्रीय बैंको के लेन-देन में भी उनको सहयोग देना है.

वर्ष 2008 में पैदा हुए वित्तीय संकट से बाहर निकलने के लिए पूरी दुनिया में केंद्रीय बैंकों ने ब्याज दरें घटाई हैं. बीआईएस ने चेतावनी दी है कि इसका अर्थव्यवस्थाओं पर उलटा असर हो सकता है.

बैंक ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में कहा है, "लंबे समय तक घटी हुई ब्याज दरों पर कर्ज़ देने से वित्तीय नीतियों में गंभीर त्रुटियाँ पैदा होने का ख़तरा रहता है. इससे संसाधनों के बारे में सही आकलन लगाने में ग़लती और वित्तीय संकट से सबसे ज़्यादा प्रभावित विकसित देशों पर बुरे प्रभावों का ख़तरा बढ़ जाता है."

2008 के वित्तीय संकट की ही तरह

जहाँ घटी हुई ब्याज दरों से विकास हुआ है वहीं उसका दूसरा पहलु है कि उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं (विशेष तौर पर एशिया) में खाद्य और अन्य ज़रूरी पदार्थों की बढ़ती क़ीमतों से जूझना पड़ सकता है.

बीआईएस ने चेतावनी दी है कि इन देशों में नीतिगत बदलावों की ज़रूरत है ताकि इस स्थिति से निपटा जा सके.

इस अंतरराष्ट्रीय बैंक ने कहा है, "महँगाई पर काबू पाने के लिए कड़ी वैश्विक मौद्रिक नीति की ज़रूरत है ताकि वित्तीय स्थिरता के ख़तरों का सामना किया जा सके. यह इसलिए भी ज़रूरी है यदि केंद्रीय बैंकों को महँगाई का सामना करने में अपनी विश्वसनीयता को कायम रखना है."

बीआईएस ने चेतावनी दी है, "आसानी से मिलने वाले कर्ज़ से कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं में संपत्ति की क़ीमतें अव्यावहारिक स्तर पर पहुँच गई हैं और इससे निजी क्षेत्र का कर्ज़ ख़ासा बढ़ रहा है. विकसित देशों में इसी तरह की स्थिति के कारण वर्ष 2008 का अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संकट पैदा हुआ था. यही नहीं, इस क्षेत्र में ज़रूरत के अधिक विकास हुआ और अनेक घर-इमारतें बिके ही नहीं और इस नुक़सान से बाहर निकलने में कई वर्ष लग सकते हैं."

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