विकास की मार मध्यमवर्ग की बचत पर

  • 11 जुलाई 2011
पवार परिवार
Image caption पवार परिवार के लिए मंहगाई के कारण मुश्किलें बढ़ी हैं

एशिया के विकास की तेज़ गति से दुनिया हैरत में है, शायद जलती भी हो लेकिन एशियाई देशों में रह रहे आम लोगों के लिए ये सफलता बढ़ती मंहगाई के कारण भारी पड़ रही है.

मानसी पवार हैदराबाद में रहती हैं. सॉफ़्टवेयर इंजीनियर हैं. हाल ही में उन्होंने काम छोड़ दिया है. उनके पति भी इसी क्षेत्र में काम करते हैं.

ये परिवार एशियाई देशों में संपन्न मध्यम वर्ग परिवार का सही उदाहरण है.

वो कहती हैं, "बाहर से तो सब अच्छा लगता है. हम बड़े घर में रहते हैं, इतना किराया देते हैं और हमारे बच्चे बड़े स्कूलों में जाते हैं."

बस परेशानी एक बात की है.

मानसी कहती है कि दरअसल उनकी जमा पूंजी धीरे धीरे कम हो रही है.

तेज़ी से बढ़ती मंहगाई

महगांई की दर नौ प्रतिशत है जिसकी वजह से मानसी के आंखों के सामने उनकी बचत ख़त्म होती जा रही है.

मानसी कहती हैं, "हमारे पास थोड़ी रकम थी और हमें पता नहीं चल रहा था कि इसका निवेश कहां किया जाए. ये ज़रूरी है कि वो पैसा यूं पड़ा न रहे लेकिन हम उसे बैंक में नहीं जमा करना चाहते हैं क्योंकि बैंक उस स्तर का ब्याज नहीं देता है जिस स्तर पर महंगाई बढ रही है."

एशिया में बढ़ती मंहगाई की बहुत सारी वजह है. इसकी वजह से पूरे एशिया में लाखों मध्यम वर्ग परिवार पहली बार अपने निजी वित्तीय फ़ैसले कर रहे हैं.

दबाव इतना ज़्यादा है कि कई अर्थशास्त्रियों का कहना है कि बढ़ती मंहगाई एशिया के आर्थिक विकास को पटरी से उतार देगी.

आर्थिक विकास के ऊंचे दर की क़ीमत मध्यमवर्ग मंहगाई की मार झेल कर अदा कर रहा है.

ग़रीब और सेवानिवृत

जो लोग मध्यमवर्ग के पायदान से नीचे रहते हैं उनके लिए स्थिति और भी भयंकर है.

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार पिछले साल भारत में उपभोक्ता क़ीमत 13.2% बढ़ी, पाकिस्तान में 11.7% और वियतनाम में 9.2%. दूसरे एशियाई देशों में स्थिति इतनी बुरी नहीं थी लेकिन मोटे तौर पर पूरे महाद्वीप में 6% प्रतिशत बढ़त मानी जा सकती है.

विकसित देशों में इस बढ़त का औसतन आंकड़ा केवल 1.6 % था.

जिस रफ़्तार से मंहगाई बढ़ रही है इसका मतलब ये है कि जबतक लोग बचत और निवेश के कारगर तरीक़े न अपनाएं वो ग़रीब होते जाएंगे भले ही एशिया महाद्वीप संपन्न होता जा रहा हो.

Image caption मोनिका हालन

वित्तीय अख़बार मिंट मनी की संपादक मोनिका हालन कहती हैं ‘अगर आप नौकरी में हैं या पैसा कमा रहे हैं तो आपको चिंता करने की ज़रूरत नहीं है. चिंता उनके लिए है जो निम्न मध्यमवर्ग हैं, सेवानिवृत लोग हैं या ग़रीब. ज़ाहिर है कि ब़ुज़ुर्ग और सेवानिवृत लोग सबसे ज़्यादा मुश्किल में हैं.'

लेकिन मंहगाई से लड़ने का तरीक़ा है. अगर आप बचत करें और कुछ हिस्सा अर्थव्यवस्था के उन भागों में निवेश करें जो कि आर्थिक विकास के साथ उपर उठ रहा है.

सोने में समझदारी

मोनिका हालन कहती है कि ज़्यादातर लोगों के लिए इसका मतलब है कि शेयर या इक्विटी में पैसा लगाएं. ये एक सबसे कारगर तरीक़ा है अपनी आमदनी बढ़ाने का और मंहगाई का मुक़ाबला करने का.

लेकिन कई भारतीय सोने की ख़रीदारी में अपनी समझदारी मानते हैं क्योंकि वे शेयर और इक्विटी के बाज़ार पर पूरी तरह भरोसा नहीं कर पाते हैं. इसीलिए भारत में अब वित्तीय सलाहकारों की मांग भी बढ़ रही है.

दुनिया भर की सबसे ऊंची बचत दर भारत और एशिया के दूसरे देशों में है.

(इस लेख में जिन लोंगों ने अपने विचार व्यक्त किए हैं वे निजी हैं. बीबीसी उनके लिए ज़िम्मेदार नहीं है. इनके आधार पर आप अपने निवेश का फ़ैसला न करें.)

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