खनन कंपनियाँ नए टैक्स के ख़िलाफ़

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Image caption खनन उद्योग के भ्रष्टाचार को लेकर हाल ही में बड़े विवाद हुए हैं

सरकार ने एक नया खनन या माइनिंग विधेयक तैयार किया है जिसके तहत खनन कंपनियों को स्थानीय विकास के लिए अतिरिक्त कर (टैक्स) देने का प्रस्ताव किया गया है.

सरकार ने नए विधेयक में 'ग़ैर-कोयला' खनिजों के लिए टैक्स को वर्तमान में लागू टैक्स से दोगुना कर दिया है जबकि कोयले के लिए ये टैक्स 26 प्रतिशत कर दिया गया है.

सरकार ने कहा है कि ये विधेयक संसद में सोमवार से शुरु हुए मानसून सत्र में ही पेश किया जाएगा.

लेकिन खनन कंपनियाँ इस विधेयक का विरोध कर रही हैं और इस प्रयास में जुट गई हैं कि ये विधेयक पेश ही न किया जाए.

उनका कहना है कि इतना टैक्स देने से कंपनियाँ वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाएँगीं और इससे कंपनियों का विकास भी प्रभावित होगा और रोज़गार पर भी असर पड़ेगा.

दूसरी ओर ग़ैर सरकारी संगठनों और खनन विरोधी कार्यकर्ताओं ने विधेयक के प्रावधानों का स्वागत किया है.

विधेयक और विरोध

खनन कंपनियों ने सरकार की ओर से प्रस्तावित विधेयक की तुलना दक्षिण अफ़्रीका के ब्लैक इकॉनॉमिक एम्पॉवरमेंट एक्ट (बीईई) से किया है.

दक्षिण अफ़्रीका में ये विधेयक रंगभेद की वजह से पैदा हुई असमानता को दूर करने के लिए पेश किया गया था.

इस विधेयक में प्रस्ताव है कि खनन कंपनियाँ अपने लाभ का एक हिस्सा खदान के इलाक़े के विकास और स्थानीय लोगों की बेहतरी के लिए दें.

वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी के नेतृत्व में गठित एक मंत्रिमंडलीय समिति ने खनन कंपनियों के लिए ग़ैर-कोयला खनिज के लिए टैक्स को दोगुना करने की सिफ़ारिश की थी.

इसके अनुसार लोहे से लेकर बॉक्साइट तक विभिन्न खनिजों के लिए कंपनियों को वर्तमान दरों से दोगुना टैक्स देना होगा. ये टैक्स हर खनिज के लिए अलग-अलग है.

मंत्रिमंडलीय समिति ने कोयले पर टैक्स को बढ़ाकर 26 प्रतिशत करने का सुझाव दिया था.

सरकार का कहना है कि वह खनन वाले इलाक़े और विशेषकर इससे प्रभावित होने वाले परिवारों के 'समग्र विकास के लिए' ये प्रावधान किए गए हैं.

विरोध

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Image caption खदान वाले इलाक़ों का विकास सरकारों के लिए चुनौती रही है

माओवादी हिंसा से सर्वाधिक प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने पिछले साल भारत सरकार पर इस बात के लिए बहुत दबाव डाला था कि खनन कंपनियों को होने वाले लाभ में 10 प्रतिशत का अधिभार जोड़ा जाए जिससे कि ग्रामीण इलाक़ों का विकास हो सके और लोगों को माओवादी विद्रोहियों की ओर जाने से रोकने में सहयोग मिल सके.

अब खनन कंपनियाँ तर्क दे रही हैं कि माओवादी प्रभावित राज्यों के दबाव में केंद्र सरकार उन पर टैक्स का बोझ डाल रही है.

फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन मिनरल इंडस्ट्रीज़ के प्रमुख पीके मुखर्जी का कहना है, "मैं इस बात से सहमत नहीं हूँ कि विकास के लिए फ़ंड की कमी है."

उनका तर्क है कि सरकार के पास फ़ंड पहले से ही हैं लेकिन उन्हें सही इलाक़ों में खर्च नहीं किया जा रहा है.

खनन उद्योग का कहना है कि वे सरकार पर दबाव डालेंगे कि वे इस विधेयक को इस सत्र में पेश न करें.

'अथाह लाभ'

भारत में ज़्यादातर खनिज जिन इलाक़ों में हैं वो आदिवासी बहुल इलाक़े हैं.

शिकायतें रही हैं कि निजी कंपनियाँ आदिवासी इलाक़ों में खनन के लिए ज़मीनें हथियाने के लिए दमनात्मक तरीक़ें अपनाती हैं.

इसके लिए या तो सरकारी सुरक्षा एजेंसियों का सहारा लिया जाता है या फिर स्थानीय प्रभावी लोगों का.

गाँव वालों को शिकायतें रही हैं कि उन्हें अपनी ज़मीनों के लिए बहुत कम मुआवज़ा मिलती है.

वे स्वास्थ्य सुविधाओं, पेयजल, स्कूलों और शौचालय आदि की कमी की भी शिकायत करते हैं.

हाल ही में दिल्ली की एक संस्था 'सेंटर फ़ॉर साइंस एंड एनवारनमेंट' ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि भारत के सबसे बड़े खनन इलाक़े देश के सबसे कम विकसित 150 ज़िलों में स्थित हैं.

सामाजिक कार्यकर्ता और वकील सुदीप श्रीवास्तव का कहना है, "खनिज कंपनियाँ अथाह लाभ अर्जित कर रही हैं, वे पर्यावरण को प्रदूषित कर रही हैं, स्थानीय लोगों को विस्थापित कर रही हैं और वे अतिरिक्त टैक्स भी अदा नहीं कर रही हैं..क्या ये ठीक है?"

उनका कहना है कि खनिज के लिए बढ़ती मांग की वजह से ये कंपनियाँ अतिरिक्त टैक्स भी भरने के लिए बाध्य होंगीं.

हालांकि अतिरिक्त टैक्स की इस ख़बर से सरकारी और ग़ैर सरकारी दोनों कोयला कंपनी के शेयरों को भारी गिरावट का सामना करना पड़ा है.

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