मज़बूत है भारत की बुनियाद

  • 9 अगस्त 2011
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पिछले सप्ताह से एशिया, अमरीका और यूरोप के बाज़ारों में भूकंप आया हुआ है. भारतीय शेयर बाज़ारों में इसके झटके महसूस किए जा रहे हैं. अमरीका इस पूरी समस्या की जड़ है. शुक्रवार को क्रेडिट रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पूअर्स ने अमरीका की क्रेडिट रेटिंग को घटा दिया था.

उससे पहले अमरीकी कर्ज़ पर शुरु हुए विवाद और अब यूरोप के आर्थिक विकास से जुड़ी चिंताओं का विश्व के बाज़ारों पर असर पड़ा था.

इन सभी कारणों का व्यापक प्रभाव दुनियाभर के बाज़ारों पर पड़ा है जिसमें भारत भी शामिल है. अब आर्थिक विशेषज्ञ कहने लगे हैं कि हम एक बार फिर 2008 की तरह विश्व आर्थिक संकट के मुहाने पर खड़े हैं.

इसके बावजूद वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने हाल में कहा कि बाज़ार के गिरने से भारतीय अर्थव्यवस्था पर ज़्यादा असर नहीं पड़ेगा. शेयर बाज़ारों के एक विशेषज्ञ दिवाकर उनसे सहमत हैं.

वे कहते हैं, "भारतीय अर्थव्यवस्था निर्यात नियंत्रण अर्थव्यवस्था नहीं है. चीन की अर्थवयवस्था 60 प्रतिशत निर्यात से नियंत्रित है. भारत में आरबीआई या विभिन्न संगठनों का जीडीपी का अनुमान अभी आठ प्रतिशत है. भारत में घरेलू मांग मज़बूत है और मध्य वर्ग की आय भी बढ़ रही है. लेकिन आज की जो गिरावट है, वो भी हर तरफ़ नहीं है. सारे स्टॉक नहीं गिरे हैं."

दिवाकर की तरह कई शेयर दलालों के तर्क भी कुछ ऐसे ही हैं. दरअसल जिन देशों ने अमरीका में पैसे ज़्यादा लगा रखे हैं और जो देश अमरीका को अपना सामान ज़्यादा निर्यात करते हैं उनके लिए अधिक परेशानी और चिंता की बात है.

चिंता

इन देशों में चीन सबसे आगे है, जिसने अमरीका में एक खरब 20 अरब डॉलर लगा रखे हैं. जापान दूसरे नंबर पर है, जिसने लगभग एक खरब डॉलर से कुछ कम लगा रखे हैं.

यहाँ तक कि ब्राज़ील ने लगभग 250 अरब डॉलर अमरीका में लगा रखे हैं, जबकी भारत ने केवल 40 अरब डॉलर ही लगए हैं. तो ज़ाहिर है अमरीकी संकट का सबसे अधिक असर पड़ेगा चीन और जापान पर और सबसे कम भारत पर.

शेयर दलाल अलोक चूड़ीवाला कहते हैं कि भारत का अपना घरेलू बाज़ार इतना मज़बूत है कि विदेशी संकट का भारत के शेयरों और भारत की अर्थव्यवस्था पर अधिक प्रभाव नहीं पड़ेगा.

देश के भीतर लोगों के पास ख़र्च करने के लिए पैसे बहुत हैं. चीज़ों की मांग कम नहीं ज़्यादा हो रही है. कंपनियों ने पैदावार की यूनिट्स बंद नहीं की हैं. यानी जैसा कि प्रणब मुखर्जी ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था मज़बूत बुनियादों पर स्थापित है. इसीलिए आर्थिक विकास दर आठ प्रतिशत से कम नहीं हुआ है.

ख़तरा

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Image caption महंगाई पर काबू न पाना एक चिंता है

हाँ आर्थिक विशेषज्ञ और शेयर दलाल यह ज़रूर कहते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था को अगर कहीं से ख़तरा है तो वो है अंदरूनी समस्याओं से, जिनमें महंगाई पर काबू पाने में नाकामी सबसे महत्वपूर्ण है.

उद्योगपति सुशील ज्वारिज्का कहते हैं, "भारत को दिक्क़तें होंगी. इन्फ्लेशन यानी महंगाई की मार से. इन्फ्लेशन कम करने के लिए सरकार ने ब्याज़ दर कई बार बढ़ाया है, लेकिन इसका कोई ख़ास फ़ायदा नहीं हो रहा है."

उनका कहना था कि सरकार को हर हाल में महंगाई पर काबू पाने की ज़रुरत है.

अंदरूनी ख़तरों में काला धन का पनपना भी शामिल है. महंगाई कम नहीं होने का कारण है अर्थव्यवस्था में काले धन का मौजूद होना और बड़ी मात्र में मौजूद होना. अगर सरकार ने ब्याज़ दर बढ़ा भी दिया तो बाज़ार में पैसे कम नहीं पड़ेंगे.

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