औद्योगिक विकास दर में गिरावट

  • 12 सितंबर 2011
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Image caption सरकारी आंकड़ों के अनुसार जुलाई में औद्योगिक विकास की दर धीमी हुई है.

खनन, निर्माण और और कैपिटल गुड्स यानि पूंजीगत माल की धीमी रफ़्तार के चलते इस वर्ष जुलाई में भारत की औद्योगिक दर महज़ 3.3 प्रतिशत रह गई है.

औद्योगिक उत्पादन के सूचकांक आईआईपी पर आधारित आंकड़ों में पिछले वर्ष जुलाई ये दर में 9.9 प्रतिशत थी.

ये जानकारी सोमवार को जारी आईपीपी की ताज़ा आँकड़ों से सामने आई है.

मौजूदा वित्त वर्ष की अप्रैल-जुलाई की तिमाही में औद्योगिक उत्पादन के सूंचकाक की विकास दर 5.8 प्रतिशत रही है. जोकि गत वर्ष इसी अवधि के दौरान 9.7 प्रतिशत से क़रीब चार फ़ीसदी कम है.

औद्योगिक उत्पादन के सूंचकाक में मैनुफ़ैक्चरिंग की हिस्सेदारी 75 फ़ीसदी होती है. इस सेक्टर में इस वर्ष जुलाई में सिर्फ़ 2.3 प्रतिशत की विकास दर देखी गई. इसी अवधि के दौरान पिछले साल 10.8 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई थी.

कैपिटल गुड्स के उत्पादन में जुलाई में 15.2 प्रतिशत की कमी आई है. पिछले वर्ष यानि 2010 में इसी महीने इस सेक्टर में 40.3 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई थी.

इसी तरह सोमवार को सामने आए आंकड़ों में खनन और उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन में भी कमी देखी गई है.

ब्याज़ दरों का असर?

कुल मिलाकर इस अवधि में भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ़्तार 7.7 प्रतिशत रही है जोकि बीती छह तिमाहियों में सबसे धीमी है.

जानकारों के अनुसार औद्योगिक आंकड़ों में गिरावट भारतीय अर्थव्यवस्था में जारी धीमेपर की ओर संकेत दे रही है.

वैसे भारतीय उद्योग इस धीमी विकास दर के लिए ब्याज़ दरों में बढ़ोतरी को ज़िम्मेदार मान रहा क्योंकि इसके चलते कर्ज़ों की क़ीमत बढ़ गई है, और ताज़ा निवेश में बाधक साबित हो रही है.

आपको बता दें कि मार्च 2010 के बाद से अबतक मंहगाई दर को क़ाबू में लाने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक ने 11 बार ब्याज़ दरों में बढ़ोतरी की है. पिछले साल दिसंबर के बाद से भारत में प्रमुख मुद्रास्फीती नौ प्रतिशत से ऊपर रही है.

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