'पूँजीवाद ज़िंदा है, पर पश्चिम में नहीं'

  • 5 अक्तूबर 2011
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Image caption 'समाजवाद का अंत 20 साल पहले हो चुका है, लेकिन पूँजीवाद ज़िंदा है'

पूँजीवाद ज़िंदा है और सेहतमंद है, लेकिन पश्चिमी देशों में नहीं...ये पूर्व की ओर आगे बढ़ गया है.

रूस का पूँजीवाद पुराना है और इसे तुरंत मरम्मत की ज़रूरत है. लेकिन पूँजीवाद की आत्मा - जैसे ख़तरा लेना, बचत, निवेश, कड़ी मेहनत, इन सभी नैतिक गुणों ने भारत, चीन, इंडोनीशिया, कोरिया और जापान जैसे देशों में जगह ले ली है.

हमने कभी नहीं सोचा था कि ये देश ग़रीबी से बाहर निकल पाएँगे.

क़रीब आधी शताब्दी तक पश्चिमी पूँजीवाद ने पूर्ण रोज़गार, समृद्धि और लगभग निश्चित विकास का मज़ा लिया. इससे हमारी कीमतें बढ़ गईं, उत्पादन उद्योग ने दूसरे देशों का रुख़ किया और वित्तीय परेशानियाँ आईं.

हमें अपने विकास के मॉडल और मूल्यों पर दोबारा सोच-विचार करना होगा. हमें पूराने नैतिक गुणों को अपनाना होगा क्योंकि पूँजीवाद इतनी जल्दी कहीं नहीं जा रहा है.

अगर एशिया में जोशपूर्ण पूँजीवाद मौजूद है और हम पुराने पूँजीवाद से ऊब चुके हैं तो हमें इसके लिए भारी कीमत चुकानी होगी.

समाजवाद का अंत 20 साल पहले हो चुका है, लेकिन पूँजीवाद ज़िंदा है. ये अपना आकार बदल लेता है. ये एक जगह छोड़कर दूसरी जगह चला जाता है. ये पूर्ण रूप से वैश्विक है.

अब हमें समझ में आ गया है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था क्या है. इसका मतलब है कि हम उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने कि दूसरे लोग और देश. अगर हम कड़ी मेहनत नहीं करेंगे तो हम अपना महत्व खो बैठेंगे. आज की दुनिया का यही सबक है.

पूँजीवाद ने कई मुश्किलों का सामना किया है. हमारे पास कचरा बचा है और हमें इससे बाहर निकलने के लिए कुछ करना होगा, लेकिन वो कोशिश पूँजीवाद की विचारधारा के अनुरूप होगी, ना कि इसके विरुद्ध.

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