यूरो से एकीकरण या वैमनस्य?

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Image caption क्षेत्र की एकजुटता के उद्देश्य से शुरू की गई मुद्रा फ़िलहाल फूट की वजह बनती दिख रही है.

यूरो को एक मुद्रा के रूप में लागू करने वालों ने इसके लिए बड़े-बड़े सपने देखे थे.

उन्होंने सोचा था कि पूरे यूरोप के लिए एक मुद्रा होने से क्षेत्र में एकजुटता होगी, एक ऐसी एकजुटता जो महज़ बयानों और राजनीतिक समझौतों की बदलौत हासिल नहीं हो सकती है.

हालांकि अर्थशास्त्रियों ने जर्मनी के तत्कालीन चांसलर हेलमट कोल को चेतावनी दी था कि चूंकि सदस्य देशों में वित्तीय एकीकरण की बात नहीं हो रही है तो उस स्थिति में सिर्फ़ एक मौद्रिक एकीकरण की योजना हमेशा अस्थिर रहेगी.

उनका कहना था कि कम ब्याज पर मिलने वाले क़र्ज़ के चलते सदस्य देश अधिक ऋण लेते रहेंगे और इस स्थिति में पूरी योजना ध्वस्त हो जाएगी.

युद्ध-रहित यूरोप

लेकिन हेलमट कोल ने जवाब दिया कि यूरो की योजना अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखकर नहीं बनाई गई है.

जर्मनी के पूर्व चांसलर का कहना था कि ये युद्ध और शांति के लिए है, एक ऐसे यूरोप के निर्माण के लिए जहां दोबारा जंग नहीं होगी.

हालांकि योजना के समर्थकों को भी मालूम था कि ये एक तरह का जुआ है.

लेकिन उन्हें यक़ीन था कि अमरीका के उलट ये व्यवस्था यहां काम कर जाएगी. अमरीका में मौद्रिक एकीकरण के पहले राजनीतिक एकीकरण की प्रक्रिया पूरी की गई थी.

वैमनस्य

लेकिन इस दौरान यूरो मुद्रा सभी को साथ लानेवाली व्यवस्था की बजाए वैमनस्य का कारण बनकर उभरती दिख रही है.

जर्मनवासी वैसे लोगों (देशों) को धन दिए जाने पर नाराज़गी जता रहे हैं, जिन लोगों ने उनकी नज़र में आमदनी से ज़्यादा ख़र्च किया या कर रहे हैं.

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Image caption ग्रीस में नाराज़ लोगों ने बैंक के दरवाज़ों पर पेंट पोत दिया.

लोगों को लगता है कि उन देशों के लोग मेहनत भी नहीं करना चाहते हैं.

ग्रीस में इस बात को लेकर ग़ुस्सा है कि यूरोपीय संघ के अधिकारी उन पर तरह-तरह के प्रतिबंध लगा रहे हैं.

उन्हें लग रहा है कि द्वितीय विश्व युद्ध का वो समय फिर वापस आ गया है, जब जर्मनी ने उनके धन पर क़ब्ज़ा कर लिया था.

ग्रीस को क़र्ज़ संकट से उबराने के लिए जो धन दिया गया है, उसके बदले वहां ख़र्च कटौतियों की कई शर्तें भी लगाई गई हैं.

इटली को लग रहा है कि उसे पीछे धकेल दिया गया है. जबकि वो यूरो को लागू करने वालों में से एक अहम सदस्य था.

सबपर असर

फ्रांस में हाल में लगाई गई कटौतियों के चलते लोगों का झुकाव दक्षिणपंथियों की तरफ़ हो रहा है.

ये कटौतियां रेटिंग एजेंसियों को ध्यान में रखकर की जा रही हैं, जो देशों के क़र्ज़ वापस कर पाने के आकलन के आधार पर उनकी रेटिंग कर रहे हैं.

ये रेटिंग बाज़ार से मिलने वाले क़र्ज़ के ब्याज दर के लिए अहम होती हैं यानी क़र्ज़दार इसी आधार पर दर कम या अधिक करते हैं.

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Image caption यूरो क्षेत्र में आए संकट को लेकर कई बैठके हुई हैं और आईएमएफ़ के कोष बढ़ाने की बात भी कही गई थी.

कई देशों की सरकारें गिर गई हैं. स्पेन, आयरलैंड और पुर्तगाल में जल्द ही नई सरकारों का गठन होगा.

वो 10 देश, जो यूरो मुद्रा का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, उन्हें लग रहा है कि जो अहम फ़ैसले किए जा रहे हैं, उनमें उनका कोई दख़ल नहीं है. जबकि ये निर्णय उन्हें भी प्रभावित करेंगे.

ये वो तालमेल नहीं है, जिसकी कल्पना इसे लागू करने वालों ने की थी.

लेकिन इसका अर्थ ये नहीं है कि दूरदर्शिता अंत में दोषपूर्ण साबित होगी.

वित्तीय कोष

कम से कम एक बात तो हुई है कि इस उथल-पुथल के बीच एक वित्तीय कोष स्थापित करने की बात हुई है.

जो इस मामले को समझते हैं, उन्हें मालूम है कि अगर यूरो पर संकट आया तो वो यूरोप को भी प्रभावित करेगा.

जर्मनी की चांसलर एंगेला मर्केल ने कहा है, "अगर यूरो नाकाम होता है, तो यूरोप भी प्रभावित होगा."

इस पूरे मामले में जर्मनी अलग-थलग नहीं खड़ा रहना चाहता है, इसलिए वो ऐसा सब कुछ करने को तैयार होगा, जो वो कर सकता है. वो संकटग्रस्त देशों को मदद देने को तैयार होगा, बशर्त वो अपने ख़र्च और टैक्स का बेहतर प्रबंधन कर सकें.

लेकिन ये स्पष्ट है कि आख़िर में जो यूरोप उभरकर सामने आएगा, वो मज़बूत होगा.

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