किंगफ़िशर में कहाँ कमी रह गई?

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Image caption किंगफ़िशर का कहना है कि उसने सरकार से सहायता की मांग नहीं की थी.

किंगफ़िशर का मूलमंत्र है 'फ़्लाई विद गुड टाइम्स'. लेकिन लगता है किंगफ़िशर के आर्थिक संकंट ने उसका अच्छा समय बुरे समय में तब्दील कर दिया है.

किंगफ़िशर को साल 2010 -11 में क़रीब 1027 करोड़ का घाटा हुआ है और लगभग 7057 करोड़ रुपए के कर्ज़ के बोझ के तले ये एयरलाइन दबी हुई है.

इतना ही नहीं अब इस विमान सेवा कंपनी ने अपनी उड़ाने भी बंद कर दी है.

भारी घाटे और कर्ज़ से निपटने के लिए किंगफ़िशर का बोर्ड रास्ते तलाशने की कोशिश कर रहा है.

सोमवार को हुई बोर्ड की बैठक के बाद किंगफ़िशर का कहना है कि उसने सरकार से सहायता की मांग नहीं की थी.

वहीं एयरलाइन को बेल ऑउट पैकेज दिया जाए या नहीं, उस पर भी मुखर आवाज़ें सुनाई दे रही है.

सार्क सम्मेलन से भारत लौटते वक़्त प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पत्रकारों से किंगफ़िशर मसले पर कहा था, “एयरलाइंस को प्रंबधन कुशलतापूर्वक चलाना चाहिए. लेकिन अगर निजी कंपनियाँ संकट में हों, तो हमें उनकी मदद करने के तरीक़े ढूँढने होंगे.”

उधर किंगफ़िशर को सरकारी मदद पर नागरिक उड्डयन मंत्री वायलार रवी ने कहा था कि उन्होंने वित्त मंत्री से कहा है कि किंगफ़िशर मुश्किल में है और उसकी मदद की जानी चाहिए.

विरोध

इस बयान के बाद से ही विपक्षी दल इसका विरोध कर रहे हैं. भाजपा साफ़ तौर पर कह चुकी है कि किंगफ़िशर को सरकारी आर्थिक सहायता नहीं मिलनी चाहिए.

भाजपा के प्रवक्ता शहनवाज़ हुसैन ने कहा था, ''सरकार को आमआदमी के लिए बेल ऑउट पैकज लाना चाहिए.''

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव प्रकाश कारत ने भी भाजपा के सुर में सुर मिलाते हुए बेल ऑउट का विरोध किया था और उड्डयन क्षेत्र में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की भी ख़िलाफ़त की थी.

बजाज ऑटों के अध्यक्ष राहुल बजाज ने स्पष्ट तौर पर कहा कि कोई भी क्षेत्र हो, चाहे टेक्सटाइल, ऑटोमोटिव या फिर एयरलाइन, अगर उसमें सभी कंपनियाँ ख़राब प्रदर्शन कर रही है तो सरकार नीतियों में बदलाव ला सकती है.

उन्होंने मीडिया में छपे अपने बयानों को तोड़-मरोड़कर पेश करने का आरोप लगाया और कहा विजय माल्या उनके दोस्त है और वे सिर्फ़ इतना कहना चाहेंगे,''चाहे कोई कंपनी बजाज ऑटों या किंगफ़िशर हो, सरकार का उसको करदाताओं के पैसों से बेलऑउट करना सही नहीं.''

उनका कहना था कि सरकार और नागरिक उड्डन मंत्री को जो भी ठीक लगे, वो करें.

लेकिन ये भी सवाल उठाए जा रहे है कि आख़िर किंगफ़िशर को इतने बड़े घाटे को क्यों सहना पड़ा, क्या ग़लत फ़ैसले लिए गए या फिर कुछ और था.

'बिजनेस मॉडल में बदलाव'

नागरिक उड्डयन मामलों के विशेषज्ञ जतिन भार्गव का कहना है कि किंगफ़िशर को अपने 'बिजनेस मॉडल' में बदलाव लाना होगा. वे ख़ुद को सस्ती उड़ानों वाली श्रेणी में शामिल ना करके अपना ही नुक़सान कर रही है.

सरकारी आर्थिक सहायता दिए जाने पर जतिन भार्गव कहते है,"किंगफ़िशर को आर्थिक सहायता नहीं दी जानी चाहिए. इससे ग़लत परंपरा बन जाएगी. लेकिन इस बात को भी नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता कि भारतीय विमान कंपनियों को इस समय सरकार के हस्तक्षेप की ज़रुरत हैं. ईधन पर टैक्स को कम किया जाना चाहिए. नैविगेशन, लैंडिंग और पार्किंग के ख़र्चों में कमी लाई जानी चाहिए. रुपए की क़ीमत घटाने के साथ-साथ ब्याज़ दरों में भी कमी लानी चाहिए ताकि सभी विमान कंपनियों को अस्थायी मदद मिल सके."

वहीं ऐसी ख़बरें भी है कि किंगफ़िशर विदेश प्रत्यक्ष निवेश चाहती है लेकिन जतिन इन अटकलों को ख़ारिज करते है.

उनका कहना है कि आंकड़ों के मुताबिक़ ज़्यादातर एयरलाइन घाटे में चल रही हैं और ऐसे में कोई भी विदेशी कंपनी भारत में क्यों निवेश करना चाहेगी. वहीं इसके साथ ही भारतीय विमान कंपनियों में विदेशी कंपनियों का दख़ल बढेगा जो कोई कंपनी नहीं चाहेगी.

स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया का कहना है कि किंगफ़िशर को अपनी विमान सेवा को इस आर्थिक संकंट से निकालने के लिए हिस्सेदारी अपने अन्य व्यावसायों से इकट्ठा करनी होगी.

लेनदारों के कर्ज़ को हिस्सेदारी में बदलने के सवाल को टालते हुए स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष प्रतीप चौधरी ने कहा कि वित्त मंत्रालय के निर्देश पर देनदार किंगफ़िशर के प्रबंधन से मंगलवार को मुलाक़ात करेंगे.

जानकारों का मानना है कि किंगफ़िशर को ख़ुद को उच्च श्रेणी के शामिल करने से वे आम जनता दूर हो रही है.

ये ज़मीनी सच्चाई है कि भारतीय नागरिक उड्डयन उद्योग बहुत संवेदनशील है और आम जनता 200-300 रुपए के लिए अपना एयरलाइन बदल लेती हैं, ऐसे में उसे ज़्यादा यात्रियों को आकर्षित करने के लिए अपने बिजनेस मॉडल में बदलाव लाना होगा.

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