यूरोज़ोन संकट का भारत पर असर

  • 20 नवंबर 2011
भारतीय मुद्रा रुपये के नोट और सिक्के
Image caption विश्लेषकों का मानना है कि यूरोज़ोन कर्ज़ संकट का असर धीमी पड़ती भारतीय अर्थव्यवस्था पर दिखना शुरु हो गया है.

पिछले कुछ वर्षों से लगभग आठ प्रतिशत की दर से बढ़ रही भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ़्तार अब कुछ धीमी पड़ती नज़र आ रही है.

हाल ही जारी हुए औद्योगिक उत्पादन और निर्यात दरें भी इस ओर इशारा करती हैं. इस साल औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर सितंबर में घटकर 1.9 प्रतिशत पर पहुँच गई जबकि पिछले साल सितंबर में यह दर 6.1 प्रतिशत थी. ये पिछले दो साल में सबसे बड़ी गिरावट है.

वहीं वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय की ओर से जारी प्रारंभिक आंकड़ों के अनुसार अक्तूबर में निर्यात केवल 10.8 फ़ीसदी की दर से बढ़कर 19.9 अरब डॉलर रहा.

इसी अवधि में कुल आयात 21.7 प्रतिशत की दर से बढ़कर 39.5 अरब डॉलर रहा. इससे व्यापार घाटा 19.6 अरब डॉलर हो गया, जो पिछले चार वर्ष के किसी भी महीने के मुक़ाबले सबसे ज़्यादा है.

जुलाई महीने में जहां निर्यात 82 प्रतिशत की दर से बढ़ा था, वहीं अगस्त में 44.25 प्रतिशत, सितंबर में 36.36 प्रतिशत और अक्तूबर में 10.8 प्रतिशत की दर से बढ़ा. यानी जुलाई से गिरावट का रुख़ जारी है.

इस धीमी रफ़्तार की एक बड़ी वजह कुछ जानकार और विश्लेषक यूरोज़ोन के कर्ज़ संकट को भी मान रहे हैं.

अंग्रेज़ी दैनिक टाइम्स ऑफ़ इंडिया में वित्तीय मामलों के सहायक संपादक प्रभाकर सिन्हा कहते हैं कि ये भारत के लिए चिंता की बात है.

प्रभाकर सिन्हा कहते हैं, “भारत पर यूरोज़ोन कर्ज़ संकट का असर पड़ना शुरू हो गया है. इस संकट को जल्दी नहीं सुलझाया गया तो ये और ज़्यादा गहराएगा. ये भारत के लिए बहुत दुखद स्थिति है क्योंकि भारत की अर्थव्यवस्था लगभग आठ प्रतिशत की दर से बढ़ने की कोशिश कर रही थी. लेकिन इस संकट के कारण ये दर 1.5 से दो प्रतिशत तक कम हो गई है. भारत में ग़रीबी की बड़ी समस्या है और इसलिए हमारी अर्थव्यवस्था का तेज़ी से बढ़ना ज़रूरी है.”

यूरोपीय कर्ज़ संकट का हल ढूंढ रही अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की अध्यक्ष क्रिस्टीन लैगार्ड ने भी कुछ दिन पहले चेतावनी दी थी कि अब एशिया भी बाक़ी दुनिया की मुश्किलों से अछूता नहीं रह सकता.

लेकिन भारतीय उद्योग और वाणिज्य महासंघ (फ़िक्की) के महासचिव डॉ. राजीव कुमार इस बात को नहीं मानते कि भारतीय अर्थव्यवस्था में आई मंदी को सीधे तौर पर यूरोप में छाए कर्ज़ संकट से जोड़ा जा सकता है.

राजीव कुमार का कहना था, "यूरोप में आर्थिक संकट चल रहा है और आने वाले समय में इसके और गहरा होने की संभावना है. उसका भारतीय अर्थव्यवस्था में छाई मंदी से सीधा और प्रत्यक्ष संबंध नहीं दिखता है. हमारे निर्यात पर इस संकट का ज़रूर असर पड़ेगा क्योंकि यूरोप भारत के लिए एक बहुत बड़ा बाज़ार है. इसलिए असर तो पड़ेगा लेकिन ये कितना ज़्यादा होगा और कब तक रहेगा, ये अभी से कहना थोड़ा मुश्किल है. फ़िलहाल आए आंकड़ों के आधार पर ये कहना कि यूरोप की वजह से हम भारत में परेशान हैं, ये बात ग़लत है."

वैसे भारतीय अर्थव्यवस्था घरेलू मांग पर ज़्यादा निर्भर है और भारत निर्यात से ज़्यादा आयात करता है. इन बातों के चलते एक मान्यता ये भी है कि भारतीय अर्थव्यवस्था यूरोज़ोन संकट से अपेक्षाकृत सुरक्षित रहेगी.

लेकिन प्रभाकर सिन्हा कहते हैं, "भारत भले ही निर्यात कम और आयात ज़्यादा करता है लेकिन निर्यात पर असर तो पड़ रहा है. देखिए, निर्यात सीधा-सीधा बाहर के देशों की अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन पर निर्भर करता है. अगर दूसरे देशों की अर्थव्यवस्थाओं में मंदी आएगी तो हमारे निर्यात भी कम हो जाएंगे लेकिन आयात उतना ही रहेगा."

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Image caption यूरोप में बढ़ती कीमतों का असर भारत में आम आदमी की जेब पर भी जल्द दिखेगा. उससे रोज़गार भी कम होंगे.

घरेलू मांग के बारे में वे कहते हैं, “घरेलू मांग तो मज़बूत रहेगी जिसके चलते भारतीय अर्थव्यवस्था छह से सात प्रतिशत की रफ़्तार से बढ़ती रहेगी. लेकिन ये कहना कि हम बाक़ी दुनिया में छाई मंदी से पूरी तरह से अछूते हैं या रहेंगे, ये ठीक नहीं है.”

मंदी का डर

निर्यातकों को डर है कि यूरोक्षेत्र संकट का असर आने वाले दिनों में निर्यात पर और बुरा असर डाल सकता है. इंडियन सिल्क प्रमोशन काउंसिल के अध्यक्ष बिमल मावंडिया कहते हैं कि कम से कम अगले साल तक तो बाज़ार में मंदी छाई रहेगी.

बिमल मवंडिया कहते हैं, "पिछले साल लगभग 60 करोड़ डॉलर का निर्यात हुआ था लेकिन हमारे पास जो जून-जुलाई तक के प्रारंभिक आंकड़े आए हैं, उन्हें देखकर इस वर्ष पिछले साल की तुलना में हमें निर्यात में 10-15 प्रतिशत की कमी की आशंका है."

वे आगे कहते हैं, "लोग डरे हुए हैं. हर आदमी बाज़ार को ध्यान से देख रहा है जिसके चलते ख़रीद कम हो रही है. आम धारणा ये है कि कम से कम अगले साल तक तो निर्यात क्षेत्र में सुधार नहीं होगा और इसमें थोड़ी मंदी तो रहेगी."

आम आदमी पर असर

हालांकि फ़िलहाल यूरोप के संकट का असर सिर्फ़ निर्यात पर ही दिखाई पड़ रहा है लेकिन आने वाले दिनों में इससे आम आदमी भी प्रभावित होगा.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया के प्रभाकर सिन्हा कहते हैं, "आम आदमी पर इसका असर पड़ना शुरू होगा. नौकरियां घटेंगी, महंगाई पर बहुत ज़्यादा लगाम नहीं कसी जा सकेगी. भारत में आधी आबादी ग़रीबी रेखा के आस-पास जीती है. इसलिए अगर इस संकट का हमारे आर्थिक विकास पर थोड़ा बहुत भी असर पड़ा तो स्पष्ट है कि ग़रीबी की अवस्था से बाहर निकलने की दर और कम हो जाएगी और जो अभी की परिस्थिति है, जो बहुत अच्छी नहीं है, वो जारी रहेगी. दूसरे शब्दों में कहें कि ग़रीबी से लड़ने के लिए भारत के पास एक ही रास्ता है और वो ये कि हम अपने आर्थिक विकास को तेज़ करें. इस काम में यूरोप और अमरीका में छाई मंदी का असर पड़ रहा है."

फ़िक्की के राजीव कुमार भी इस बात को मानते हैं, हालांकि वे पूरी तरह से निराश नहीं है.

वे कहते हैं, "हमारे निर्यात की दर पहले से कम हो ही गई है. अगर ये और कम हुए तो इस क्षेत्र से जुड़े रोज़गारों में भी कमी आएगी जिससे अर्थव्यवस्था पर भी दबाव पड़ेगा. हाल ही में रिज़र्व बैंक ने विकास की दर के अनुमान को 8.5 से घटाकर 7.5 प्रतिशत कर दिया है और अगर हालात ऐसे ही बने रहे तो शायद ये दर और भी घटा दी जाए. अगर ऐसा होता है तो उसके साथ रोज़गार भी कम होगा इसलिए हमारे लिए संकट की स्थिति तो बन सकती है. हां, इतना ज़रूर है कि ऐसा संकट नहीं होगा जैसा कि यूरोप और अमरीका में है, लेकिन फिर भी उम्मीद से नीचे तो हमारी अर्थव्यवस्था आ ही सकती है."

चीन और भारत से उम्मीदें

यूरोपीय और अमरीकी नेता अपने आर्थिक संकट से उबरने के लिए फ़िलहाल चीन और भारत जैसी तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं की ओर देख रहे हैं. लेकिन क्या ये देश, ख़ासकर भारत, इन उम्मीदों को पूरा कर सकते हैं?

फ़िक्की के महासचिव डा. राजीव कुमार कहते हैं, "भारत से ये उम्मीद की जा रही है कि उसकी अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ती रहेगी, जिससे विश्व की अर्थव्यवस्था को तेज़ी मिलेगी और इसके चलते यूरोप में कर्ज़ संकट कुछ हद तक सुधर जाएगा. लेकिन फ़िलहाल जो हालात भारत में हैं और मंद होती हुई अर्थव्यवस्था को देखते हुए मुझे नहीं लगता कि हम उन उम्मीदों पर इतने खरे उतर पाएंगे."

तो भारत पर इस संकट के लिए कम से कम असर पड़े, इसके लिए क्या किया जा सकता है?

डॉ. कुमार कहते हैं, "इसके लिए कई क़दम उठाने की ज़रूरत है. पहले तो ये कि जिन आर्थिक सुधारों को उठाकर ताक पर रख दिया गया है, उन्हें जल्दी-से-जल्दी कार्यान्वित करना चाहिए. इसके अलावा इंफ़्रास्ट्रक्चर और कार्य प्रणाली को आसान बनाने की भी ज़रूरत है. हाल ही में घोषित राष्ट्रीय उत्पादन नीति को भी जल्द से जल्द कार्यान्वित करने की ज़रूरत है. जितनी जल्दी हम आर्थिक सुधारों के ज़रिए निवेश परिस्थितियों को सुधारें, उतनी जल्दी ही हम अपने आप को दुनिया में छाए इस संकट से बचा सकते हैं."

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