ठोस सरकारी कदमों की ज़रूरत: अर्थशास्त्री

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Image caption अर्थशास्त्रियों के मुताबिक आने वाले कुछ महीने मुश्किल हो सकते हैं.

भारतीय औद्योगिक उत्पादन की दर में आई गिरावट के लिए अर्थशास्त्रियों ने सरकारी नीतियों में शिथिलता, ब्याज दरों में बढ़ोत्तरी और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक हालात को ज़िम्मेदार ठहराया है.

एसोचैम के महासचिव डीएस रावत ने कहा कि जहाँ लंबे समय से औद्योगिक उत्पादन चिंता का विषय था, पिछले कुछ समय से खनन क्षेत्र में भी धीमापन आ गया है.

उन्होंने कहा, “विद्युत क्षेत्र में कुछ विकास तो हुआ है लेकिन इसका लक्ष्य पर असर नहीं पड़ेगा. नीति निर्माताओं को बहुत ज़्यादा ज़िम्मेदारी लेने की ज़रूरत है. आज की ज़रूरत है नीति में गतिशीलता लाने की.”

यस बैंक की प्रमुख अर्थशास्त्री शुभदा राव कहती हैं कि उन्हें ख़राब आंकड़ों की उम्मीद थी, लेकिन विभिन्न क्षेत्रों के विकास दर में इतनी कमी आएगी, इसका अंदाज़ा उन्हें नहीं था.

रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के अर्थशास्त्री डीके जोशी का भी यही कहना है. ये सभी इन ख़राब आंकड़ों के लिए कुछ मुख्य कारण गिनाते हैं.

सरकारी शिथिलता

पहला कारण ये कि रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया लगातार ब्याज दर बढ़ा रहा है जिसका असर उत्पादन दर पर पड़ा है.

दूसरा कारण ये कि सरकारी नीति निर्माता अर्थव्यवस्था को दिशा नहीं दे पा रहे हैं.

साथ ही लागत में भी बढ़ोत्तरी हुई है जिसका असर उत्पादन क्षेत्र में पड़ा है.

यस बैंक की शुभदा राव कहती हैं कि बहुत समय बाद उन्हें हर तरफ़ से प्रतिकूल आँकड़े नज़र आ रहे हैं. उन्होंने कहा कि पिछली बार ऐसा उन्होंने फ़रवरी 2009 के आसपास देखा था, जब अर्थव्यवस्था की तेज़ी में कमी आ रही थी.

शुभदा बताती हैं कि त्योहारों से पहले उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन में बढ़ोत्तरी देखी गई थी, लेकिन बाज़ार में मांग का स्तर क़ायम नहीं रह पाया. त्योहारों के बाद पाया गया कि उपभोक्ता के लिए बनने वाले टिकाऊ वस्तुओं के उत्पादन में गिरावट हुई और निवेश का वातावरण ख़राब हो रहा है.

उन्होंने कहा, “ब्याज दरों में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है. इससे माहौल प्रतिकूल होता है. लागत ख़र्च लगातार बढ़ रहे हैं. लेकिन सबसे महत्वपूर्ण कारण है सरकारी नीति में अव्यवस्था. ये ऐसा कारण है जिससे भारतीय व्यापारी निवेश नहीं कर रहे हैं. बढ़ती ब्याज दरों से लोग कम धन ख़र्च कर रहे हैं. मुद्रा-स्फ़ीति दर भी ऊँची है.”

भारत ज़्यादा आयात करता है और कम निर्यात करता है. अगर रुपए की कीमत में 18 प्रतिशत तक की कमी होती है तो मुद्रा-स्फ़ीति के माहौल में और मुश्किलें पैदा होती हैं.

शुभदा राव के मुताबिक़ अगली दो तिमाहियों तक हालात में कोई ख़ास बदलाव होने की उम्मीद नहीं है, लेकिन नीति मामले में कुछ गतिविधियों की उम्मीद की जा रही है.

लेकिन वो कहती हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था की नींव मज़बूत है, बचत और निवेश अनुपात अभी भी 32-33 से अच्छा ख़ासा ऊपर है और कंपनियों और बैंकों का बहीखाता मज़बूत स्थिति में है, हालाँकि बैंकों के बहीखातों में कुछ चूकें हुई हैं.

वो कहती हैं, “बैंकों की संपत्ति की गुणवत्ता में कुछ समस्या हो सकती है, या फिर कंपनियों के मुनाफ़ों में कमी हो सकती है, लेकिन ये बहुत बड़ी चिंता के कारण नहीं हैं."

भारतीय अर्थव्यवस्था मज़बूत

राव कहती हैं, “भारतीय अर्थव्यवस्था का ताना-बाना मज़बूत है. मेरे विचार में अगले दो सालों में भारतीय अर्थव्यवस्था की दर में साढ़े सात प्रतिशत से ज़्यादा की बढ़ोत्तरी नहीं होगी. अगर इस बढ़ोत्तरी को नौ प्रतिशत का आंकड़ा छूना है, तो इसके लिए वैश्विक कारण भी ज़िम्मेदार होंगे. और देश में मूलभूत सुविधाओं में तेज़ी की ज़रूरत होगी. लेकिन आज के माहौल में सात से साढ़े सात प्रतिशत की दर इतनी बुरी भी नहीं कही जा सकती.”

क्रिसिल के डीके जोशी कहते हैं कि इन आंकड़ों का आम आदमी पर असर होगा.

वो कहते हैं, “अगर अर्थव्यवस्था धीमी होती है तो नौकरियों में कमी होगी, और मुद्रा-स्फ़ीति में भी कमी आएगी.”

बार्क्लेज़ के प्रमुख अर्थशास्त्री सिद्धार्थ सान्याल के अनुसार फ़िलहाल स्थिति में सुधार की बहुत उम्मीद नहीं दिख रही है क्योंकि ब्याज दरों में सुधार की उम्मीद नहीं है.

वो कहते हैं, “अमरीका में विकास की स्थिति बेहतर हो रही है लेकिन यूरोप में स्थिति अभी भी काफ़ी गंभीर है. वहाँ बहुत जल्द सुधार की उम्मीद नहीं है. इसलिए औद्योगिक उत्पादन में भी बहुत सुधार की उम्मीद नहीं है. वैसे तो कहा जा सकता है कि इन मुश्किल परिस्थितियों में भी सात प्रतिशत की विकास दर ख़राब नहीं है, लेकिन अगर हमें लगता है कि इसका असर हम पर कभी नहीं पड़ेगा तो ये ग़लत है. हमें बहुत सतर्क रहने की ज़रूरत है.”

उधर विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने इन आंकड़ों पर सरकार को आड़े हाथ लिया और आंकड़ों को आश्चर्यजनक बताया. उन्होंने कहा कि यूपीए में ख़ुद ही आर्थिक सुधारों को लेकर अलग-अलग सोच है और हर बदलाव का मतलब सुधार नहीं होता.

उन्होंने कहा कि आर्थिक सुधारों को लागू करने से पहले ये जानना आवश्यक है कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर उनका क्या प्रभाव पड़ेगा.

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