छोटे शहरों पर बड़ी ज़िम्मेदारी

  • 15 दिसंबर 2011
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Image caption आर्थिक जानकार कहते हैं कि छोटे शहरों में सामान की बिक्री की बदौलत ही देश की विकास दर में छह या सात प्रतिशत की वृद्धि हो रही है

ये कोई नई बात नहीं कि दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों में विकास एक हद तक चरम सीमा तक पहुँच गया है, और अब कंपनियों की निगाहें छोटे शहरों की ओर हैं.

दरअसल, स्वतंत्र संस्था नील्सन के सर्वेक्षण में कहा गया है कि एक से दस लाख की आबादी वाले चार सौ शहरों में दस करोड़ मध्यम वर्ग के लोग हैं और वर्तमान में ये आबादी भारत में हाथो हाथ बिकने वाली उपभोक्ता वस्तुओं की 20 फ़ीसदी खपत करती है.

एक तरफ़ जहां देश के आर्थिक विकास में कमी आ रही है, वहीं दूसरे और तीसरे दर्जे के शहरों में तेज़ी से आर्थिक विकास हो रहा है और वहाँ आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ी हैं.

छोटे शहरों में लोगों के पास ख़र्च करने के लिए ज़्यादा धन है. आर्थिक मामलों के जानकार कहते हैं कि छोटे शहरों में सामान की बिक्री की बदौलत ही देश की विकास दर में छह या सात प्रतिशत की वृद्धि हो रही है.

जानकार कह रहे हैं कि शहरों में विकास काफ़ी हो चुका है, वहाँ रहन-सहन अच्छा हो चला है, और अब आर्थिक विकास दर में वृद्दि छोटे शहरों से ही आएगी.

नील्सन के आंकड़ों से पता चलता है कि छोटे शहरों में ज़्यादा मौक़े पैदा हो रहें हैं, ज़्यादा कॉल सेंटर बन रहे हैं, और छोटे शहरों में लोगों के पास ख़र्च करने के लिए ज़्यादा धन है.

गाड़ियाँ छोटे शहरों में ज़्यादा बिक रही हैं, बड़े शहरों में ज़मीन की क़ीमत थम सी गई हैं. बिल्डर छोटे शहरों का रुख़ कर रहे हैं.

ज़मीन की क़ीमत बढ़ने से लोगों के हाथ में ज़्यादा धन आएगा.

अगली लहर

बड़ी-बड़ी कंपनियाँ भी यही कह रहीं हैं. विकास की अगली लहर इन्ही छोटे शहरों से आएगी.

उद्योग संगठन एसोचैम के बैंकिंग और फ़ाइनेंस डिविज़न के प्रमुख ज्योतिर्मय जैन कहते हैं कि जहाँ तक अर्थव्यवस्था की तेज़ी में कमी की बात है, किसी भी अर्थव्यवस्था के जीवनकाल में ये होना आम बात है. वो कहते हैं कि वैश्विक आर्थिक मुश्किलों के बावजूद सात प्रतिशत विकास की दर कम नहीं होती.

जैन कहते हैं, “सूरत, जयपुर जैसे बहुत शहर हैं जो उम्मीद की किरण हैं. भटिंडा जैसे शहर में धन नज़र आता है. कुछ शहर ऐसे हैं जो पहले बहुत पिछड़े थे लेकिन नरेगा जैसी सरकारी योजनाओं की वजह से वहाँ समृद्धि आई है. इससे लोगों को सहारा बँधा है.”

फ़ाइनेंसियल एक्सप्रेस के प्रबंध संपादक एमके वेणु कहते हैं कि उपभोक्ता खपत में इसलिए आ रही है क्योंकि भारत के 30-40 करोड़ लोगों में खपत की शुरुआत अभी शुरू हुई है.

वो कहते हैं, “400 शहरों में जहाँ आबादी एक लाख से दस लाख है, वहाँ खपत हो रही है. सर्वे में सबसे रोचक आंकड़ा ये है कि इन 400 शहरों में वर्ष 2010 में कुल बिक्री छह अरब डॉलर्स की हुई थी. 2002 की तुलना में इसमें साढ़े तीन गुना तक की वृद्धि हुई. सर्वे में कहा गया है कि 2018 में ये बाज़ार 20 अरब तक का हो जाएगा. इसका मतलब है कि अर्थव्यवस्था की विकास दर आठ प्रतिशत तक की तो रहेगी ही.”

वेणु बताते हैं कि वर्ष 2008-9 के दौरान जब वैश्विक अर्थव्यवस्था का बुरा हाल था, उपभोक्ता वस्तुओं की कंपनियों में 15 प्रतिशत तक की वृद्दि हो रही थी और आज भी जब हालात बहुत अच्छे नहीं हैं, इन कंपनियों में 10 प्रतिशत की विकास दर से वृद्दि हो रही है.

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