मौद्रिक नीति में ढील की संभावना: आरबीआई

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भारतीय रिज़र्व बैंक ने कहा है कि वो विश्व में आर्थिक मंदी की आशंका के बीच अपनी मौद्रिक नीति में ढील दे सकता है.

रिज़र्व बैंक के गवर्नर डी सुब्बाराव ने बीबीसी से ख़ास बातचीत में कहा है कि इस बात की पूरी संभावना है कि बैंक ज़्यादा ज़ोर आर्थिक विकास को बढ़ावा देने पर लगाएगा.

बीबीसी के 'इंडिया बिज़नेस रिपोर्ट' कार्यक्रम में रिज़र्व बैंक के गवर्नर ने कहा है, “अब के बाद हम उम्मीद कर सकते हैं कि वित्तीय नीति में बदलाव आएगा. लेकिन ये कहना मुश्किल होगा ऐसा कब होगा और किस रूप में होगा.”

मंहगाई से निपटने के नाम पर रिज़र्व बैंक ने मार्च 2010 से लेकर हाल तक 13 बार ब्याज दर बढ़ाए थे. लेकिन आशंका जताई जाती रही है कि मौद्रिक नीति में ज़्यादा कड़ाई से विकास पर बुरा असर डाल सकती है.

पिछले दो वर्षों में भारतीय रिज़र्व बैंक ने अपना ज़्यादा ध्यान मुद्रा स्फीति की बढ़ती दर पर केंद्रित किया है.

खाद्य पदार्थों और ईंधन जैसी ज़रूरी चीज़ों की क़ीमतें काफ़ी बढ़ गई है.

इस कारण रिज़र्व बैंक को ब्याज दर बढ़ानी पड़ी है ताकि ऋण लेना महंगा हो जाए और घरेलू स्तर पर माँग में कमी आए.

'आर्थिक विकास ज़रूरी'

इसका असर भी दिखने लगा है. मुद्रा स्फिति की दर अक्तूबर में 9.7 से गिरकर नवंबर में 9.1 हो गई है.

लेकिन ये चिंता भी जताई जा रही है कि बढ़ती ब्याज दरों से भारत में कारोबार पर असर पड़ रहा है.

घरेलू और साथ ही यूरोज़ोन और अमरीका में आर्थिक संकट के कारण ये आशंका जताई जा रही है कि भारत के विकास दर में कमी आ जाएगी.

डी सुब्बाराव ने कहा है कि हालांकि महंगाई अब भी एक ख़तरा है लेकिन आरबीआई इस बात को समझता है कि विकास को भी बढ़ावा देने की ज़रूरत है.

उन्होंने कहा, “आम सहमति के उलट हम हमेशा विकास को लेकर सजग रहे हैं. दिसंबर में अपने बयान में हमने कहा भी था कि विकास एक गंभीर मुद्दा है. इसलिए मुझे लगता है कि विकास और मुद्रा स्फिति के बीच तालमेल 2012 में बदलेगा.”

असमंजस

लेकिन जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर अरुण कुमार जैसे अर्थशास्त्री मानते हैं कि भारत ही नहीं दुनिया भर के केंद्रीय बैंक अपनी नीतियों को लेकर असमंजस की स्थिति में हैं.

उन्होंने कहा कि मौद्रिक नीति बदलने मात्र से कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं होगा.

प्रोफ़ेसर कुमार कहते हैं कि भारतीय रिज़र्व बैंक को ऐसी नीतियाँ अपनानी चाहिए जो देश की वित्तीय नीति को सहयोग करें.

उन्होंने कहा कि मौद्रिक नीति में ढिलाई के लिए कॉरपोरेट सेक्टर का दबाव भी रहा. पर ऐसा नहीं है कि इसका तुरंत फ़ायदा होगा और कॉरपोरेट निवेश बढ़ाएगा.

उनका मानना है कि भ्रष्टाचार के आरोपों से और दूसरे कारणों से पिछले दो साल में सरकार नीतिगत फ़ैसले करने में असफल रही है और निवेश का पुराना मॉडल चरमरा गया है.

प्रोफ़ेसर कुमार कहते हैं कि सिर्फ़ ब्याज दरें बदलने से इन स्थितियों में बदलाव नहीं होगा.

हालांकि उन्होंने माना कि ब्याज दरें कम होने से आम आदमी खुश होगा. लेकिन साथ ही उन्होंने कहा कि आर्थिक मंदी से बेरोज़गारी बढ़ेगी और

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