एफ़डीआई पर छोटे व्यापारी-उद्योगपति चिंतित

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption छोटे व्यापारियों को डर है कि ख़ुदरा व्यापार में विदेशी निवेश बढ़ने से उन्हें घाटा होगा.

छोटे व्यापारियों और लघु उद्योग संगठनों के मुताबिक़ सिंगल ब्रांड यानी एक ही ब्रांड के ख़ुदरा व्यापार में 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ़डीआई) की नीति को लागू करने में नियंत्रण की कोई व्यवस्था बनानी ज़रूरी है अन्यथा इसका दुरुपयोग होगा.

अब तक भारत में एक ब्रांड के ख़ुदरा व्यापार में 51 प्रतिशत एफ़डीआई को मंज़ूरी थी. मंगलवार को वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने इस सीमा को बढ़ाकर 100 प्रतिशत कर दिया.

मंत्रालय के मुताबिक 51 प्रतिशत से ज़्यादा एफ़डीआई वाले ख़ुदरा व्यापार में कुल बिक्री का कम से कम 30 प्रतिशत मूल्य का सामान छोटे और लघु उद्योग से ख़रीदना व्यापारी के लिए अनिवार्य होगा.

सरकार के मुताबिक ये प्रावधान इसीलिए रखा गया है कि एफ़डीआई बढ़ने के बावजूद घरेलू व्यापारियों को नुकसान की जगह फ़ायदा ही हो.

लेकिन कॉनफ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन ट्रेडर्स के राष्ट्रीय सचिव प्रवीण खंडेलवाल ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि सरकारी नीति में निहित इस शर्त का फ़ायदा तब तक उन्हें नहीं मिलेगा जब तक इसे लागू करने के लिए कोई औपचारिक व्यवस्था ना बनाई जाए जिससे बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर नज़र रखी जा सके.

‘लघु उद्योग को फ़ायदा नहीं’

प्रवीण खंडेलवाल ने कहा, “बहुराष्ट्रीय कंपनी को केवल ख़ुद को एक सर्टिफ़िकेट देकर ये प्रमाणित करना होगा कि वो इस नियम का पालन कर रही है, जब तक सरकार इसकी जांच का कोई तरीका नहीं बनाती, इसका ग़लत इस्तेमाल होने की पूरी आशंका है.”

हालांकि सरकार की अधिसूचना के मुताबिक बहुराष्ट्रीय कंपनी के सर्टिफ़िकेट देने के बाद उसके दावे को परखने के लिए उसके खातों को ऑडिटर द्वारा जांचा जाएगा.

प्रवीण खंडेलवाल ने दावा किया कि ‘कैश एन्ड कैरी’ की सुविधा के ज़रिए विदेशी निवेशक भारत के थोक व्यापार में काम कर रहे हैं, लेकिन वो अपना सामान ख़ुदरा व्यापारी की तरह भी बेचते हैं और इसकी जांच भी नहीं की जा रही.

वहीं लघु उद्योग के बारे में जानकारी और छोटे व्यापारियों को मदद देने का काम करने वाली संस्था, 'लघु उद्योग भारती' के मुताबिक भी सरकारी नीति से इस वर्ग को नुकसान ही होगा.

'लघु उद्योग भारती' में राष्ट्रीय महासचिव, ओमप्रकाश मित्तल ने कहा, “देश में भ्रष्टाचार की स्थिति ऐसी है कि इन बड़ी कंपनियों से ये सुनिश्चित करना कि वो कम से कम 30 प्रतिशत मूल्य का सामान छोटे और लघु उद्योग से ख़रीदने की शर्त का पालन करें ये नामुमकिन है.”

साथ ही प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि सरकार को ये स्पष्ट करना चाहिए कि भारतीय लघु उद्योग से सामान ख़रीदने की उनकी शर्त विश्व व्यापार संगठन के साथ किए भारत के समझौते (‘ट्रेड रिलेटिड इन्वेस्टमेंट मेज़र्स’ – ट्रिम्स) का उल्लंघन तो नहीं है.

क्योंकि अगर ट्रिम्स के मुताबिक कंपनियों को अपने सामान की ख़रीद दुनिया भर से करने की अनुमति हो तो बहुराष्ट्रीय कंपनियां सरकार की शर्त के ख़िलाफ़ अदालत का दरवाज़ा खटखटा सकती हैं.

एक से ज़्यादा ब्रांड में एफ़डीआई?

मंगलवर को वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने एक बयान जारी कर कहा था, “एक ब्रांड के ख़ुदरा व्यापार में एफ़डीआई को मंज़ूरी देने से बड़ी विदेशी कंपनियां भारतीय बाज़ार में उतरी हैं, अब इस नई शर्त के साथ निवेश की सीमा 51 से 100 प्रतिशत तक बढ़ाने से घरेलू उत्पादन में तेज़ी आएगी और लघु उद्योग में तकनीकी विकास का मौका मिलेगा.”

यानी अब बड़ी विदेशी ब्रांड्स, जैसे जूतों की कंपनी रीबॉक, फ़र्नीचर की आईकिया, लाइफ़स्टाइल साज़ो-सामान की गुच्ची इत्यादि भारत में पूरे मालिकाना हक़ के साथ दुकानें खोल सकेंगी.

उद्योग संगठन एसोचैम के महासचिव डी एस रावत ने सरकार के इस फ़ैसले का स्वागत करते हुए कहा, “हमें उम्मीद है कि राजनीतिक पार्टियों में जल्द सहमति बने और मल्टी-ब्रांड ख़ुदरा व्यापार में भी 100 फ़ीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को अनुमति दे दी जाए.”

संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान मंत्रिमंडल की बैठक में फ़ैसला लिया गया था कि भारत में ख़ुदरा व्यापार में एक ब्रांड में 100 प्रतिशत और मल्टी-ब्रांड में 51 प्रतिशत एफ़डीआई को अनुमति दी जाए.

लेकिन विपक्षी पार्टियों और तृणमूल कांग्रेस समेत सरकार के सहयोगी दलों के पुरज़ोर विरोध के बाद मल्टी-ब्रांड ख़ुदरा व्यापार में एफ़डीआई के फ़ैसले पर फ़िलहाल रोक लगा दी गई है.

संबंधित समाचार