'विश्व अर्थव्यवस्था पर गहरे संकट के बादल'

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Image caption मुद्राकोष का कहना है कि वैश्विक स्तर पर आर्थिक वृद्वि दर उम्मीद से कम रहेगी.

अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष ने कहा है कि यूरोज़ोन संकट के चलते विश्व की अर्थव्यवस्था पर गंभीर ख़तरा है.

मुद्राकोष ने अलग अलग देशों के लिए 2012 में होने वाली संभावित आर्थिक विकास दर के अपने पूर्वानुमान में बदलाव किया है.

आईएमएफ़ का अनुमान है कि 2012 में विश्व की अर्थव्यवस्था 3.25 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ेगी.जबकि पहले वृद्धि दर का आंकलन 4 प्रतिशत किया गया था.इसका मतलब ये हुआ कि वैश्विक स्तर पर आर्थिक वृद्वि दर उम्मीद से कम रहेगी.

पूर्वानुमान में कमी

इसी तरह ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर के आंकलन 1.6%.में 0.6%की क़टौती की गई है.

जबकि यूरोज़ोन की वृद्धि दर पहले के 1.1 फ़ीसदी के अनुमान से 0.5 फ़ीसदी घट सकती है

आईएमएफ़ का कहना है कि संसार एक बार फिर से मंदी का दौर की चपेट में आ सकता है विशेष रुप से इटली और स्पेन की अर्थव्यवस्थाएं इससे प्रभावित हो सकती हैं. यूरोज़ोन संकट का असर पूरे संसार में महसूस किया जाएगा.

मुद्रा कोष ने सरकारों से कहा है कि वो अब इन अनुमानों के आधार पर योजनाओं के बारे में फिर से विचार करें कि वो कैसे और कितनी जल्दी खर्चों में कटौती कर सकती है.

हांलाकि आईएमएफ़ ने देशों का नाम नही लिया है लेकिन बीबीसी के आर्थिक संवाददाता का कहना है कि लगता है कि उसका इशारा जर्मनी की ओर है

2012 में जर्मनी की आर्थिक वृद्धि दर के बारे में आईएमएफ़ का आंकलन 0.3 फ़ीसदी का है जबकि सितम्बर में ये अनुमान 1.3 फ़ीसदी का था.

इसी तरह फ्रांस के लिए अनुमान 0.3 प्रतिशत का है. पर अमरीका के मामले में अभी भी मुद्रा कोष 1.8 प्रतिशत की विकास दर का संभावना पर कायम है.

मुद्रा कोष का कहना है कि मध्य व पूर्वी यूरोप और एशिया जैसे विकासशील बाज़ार भी यूरोसंकट से प्रभावित हो सकते है.

यूरोपीय चुनौती

इसलिए यूरोप की सबसे बड़ी चुनौती विश्वास बहाल कर यूरो संकट का अंत करना है.

सोमवार को ही आईएमएफ़ प्रमुख क्रिस्टीन लगार्दे ने चेतावनी देते हिए कहा था कि अगर यूरोसंकट से ज्ल्द न निपटा गया तो विश्व की अर्थव्यवस्था 1930 के आर्थिक संकट को दोहरा सकती है.

क्रिस्टीन लगार्दे का कहना था कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में स्थिरता लाने के लिए उसे अपना कोष 500 अरब डॉलर तक बढ़ाना होगा.

इस अतिरिक्त राशि का उपयोग यूरोज़ोन में कर्ज़ के बोझ से दबे देशों की सहायता में किया जा सकता है.

आईएमएफ़ का कहना है कि आने वाले वर्षों में उसे एक खरब डॉलर की राशि की ज़रुरत होगी.

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