एशिया की प्रगति से बढ़ती अमीर-गरीब की खाई

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Image caption तेज आर्थिक वृद्धि का फायदा सब लोगों तक नहीं पहुंच रहा है

एशिया की तेज आर्थिक वृद्धि स्थिरता के लिए चुनौती बन सकती है क्योंकि अमीर और गरीब के बीच फासला बढ़ता ही जा रहा है. एशिया विकास बैंक की रिपोर्ट में यह बात कही गई है.

अपनी सालाना रिपोर्ट जारी करते हुए बैंक ने कहा कि एशिया में औसत 38 बिंदुओं के आधार पर मापी गई असमानता का स्तर काफी बढ़ गया है.

लैटिन अमरीका और अफ्रीका में यह असमानता औसत से कम पाई गई जबकि एशिया में यह लगातार बढ़ रही है.

दूसरे अन्य क्षेत्र में यह घट रही है. चीन, भारत और इंडोनेशिया में असमानता में काफी बढ़ोत्तरी देखी गई है.

सवाल बस रोटी का नहीं

बीबीसी से बातचीत में एशिया विकास बैंक (एडीबी) के प्रमुख अर्थशास्त्री छांगयोंग री ने बताया कि एशिया में अमीर और गरीब के बीच अंतर से जिस तरह निपटा जा रहा है, उसमें एक दीर्घकालीन बदलाव देखने को मिल सकता है.

1960 और 1970 के दशकों के दौरान एशिया इस मायने में बेहतर था कि आर्थिक वृ्द्धि के कारण क्षेत्र की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा हाशिए पर न चला जाए और इससे अमीर और गरीब के बीच अंतर कम हो रहा था.

लेकिन पिछले एक दशक में अचानक आर्थिक वृद्धि के विस्फोट और तेजी से समृद्ध हुए बहुत से लोगों के कारण अमीर और गरीब के बीच खाई बढ़ी है.

एडीबी का अनुमान है कि फिलहाल ज्यादातर एशियाई देशों में आबादी के कुल पांच प्रतिशत सबसे अमीर लोगों के खाते में ही कुल खर्च का 20 प्रतिशत हिस्सा आता है.

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Image caption एडीबी की रिपोर्ट के मुताबिक चीन में सबसे ज्यादा आर्थिक असमानता पाई गई

वहीं करोड़ों लोग शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और रहन-सहन की बुनियादी सुविधाओं से भी वंचित हैं और इनके लिए उन्हें पाना मु्श्किल और बेहद खर्चीला साबित हो रहा है.

एडीबी के छांगयोंग री का कहना है कि नीति निर्माताओं को इस बढ़ते अंतर पर ध्यान देना होगा क्योंकि लोग अब इस बात को अच्छी तरह जानने लगे हैं कि वे पिछड़ रहे हैं.

उन्होंने कहा, "तकनीक और संचार सुविधाओं के चलते अब लोग देख सकते हैं कि बाकी दुनिया में लोग किस तरह से रह रहे हैं और उन्हीं की तरह रहने की उनकी इच्छा भी बढ़ती जा रही है. लोग बेहतर जिंदगी की मांग कर रहे हैं. वे सिर्फ रोटी नहीं चाहते हैं, बल्कि वे रोटी के बंटवारे में से ज्यादा हिस्सा मांग रहे हैं."

सामाजिक तनाव बढ़ेंगे

एडीबी ने 'गिनी गुणांक' के आधार पर असमानता के अंतर को मापा और उसका कहना है कि यह आंकड़ा जितना ज्यादा होगा, समस्या उतनी ही बड़ी है.

अपनी रिपोर्ट में एडीबी ने कहा है कि चीन में गिनी गुणांक 2010 में बढ़ कर 43 हो गया जबकि 1990 के दशक में यह 32 था. भारत के लिए यह आंकड़ा इस अवधि में 33 से बढ़ कर 37 हो गया. इंडोनेशिया में यह वृद्धि 29 से 39 हो गई.

री कहते हैं, "असानता से क्रूरता को बढ़ावा मिलता है. अवसरों की असमानता से आदमनी की असमानता पैदा होती है जिससे बाद में परिवारों के लिए भावी अवसरों में नाटकीय रूप से अंतर आता है."

वह कहते हैं कि सामाजिक तनाव से सरकारों के लिए चुनौतियां पैदा हो सकती हैं और लोकलुभावन राजनीति को बढ़ावा मिलेगा. इससे शहरी और ग्रामीण इलाकों में राष्ट्रीय विकास में भी अंतर दिखेगा जिससे आंतरिक अस्थिरता और तनाव बढ़ेंगे.

गरीबी में गिरावट

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Image caption आर्थिक असमानता सुरक्षा के लिए सीधे तौर पर खतरे पैदा कर सकती है

वैसे रिपोर्ट में एशिया के लिए सिर्फ चिंताजनक बातें ही नहीं कही गई हैं, क्षेत्र में आर्थिक विकास के बराबर बढ़ते रहने की उम्मीद जताई गई है. एशिया का विकास दर 2012 में 6.9 प्रतिशत और 2013 में 7.3 प्रतिशत रह सकता है.

एडीबी की रिपोर्ट के मुताबिक प्रतिदिन 1.25 डॉलर से कम पर जी रहे गरीबी रेखा से नीचे के लोगों की संख्या में 2005 से 2010 के बीच 43 करोड़ की कमी आई है.

बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक क्षेत्र के आर्थिक विकास का फायदा सब लोगों को मिलना चाहिए, जो बहुत अहम है.

री का कहना है कि अगर 1990 के बाद से असमानता बढ़ने के बजाय स्थिर रहती तो पिछले 20 साल के दौरान 24 करोड़ और लोग गरीबी से निकाले जा सकते थे.

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