क्यों परेशानी में है एयर इंडिया?

  • 9 मई 2012
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Image caption सरकार ने हाल में ही कंपनी को 30,000 करोड़ रुपए का आर्थिक पैकेज देने का फैसला किया है.

भारत की घरेलू सेवा ‘इंडियन एयरलाइन्स’ और अंतरराष्ट्रीय सेवा ‘एयर इंडिया’ का औपचारिक विलय 27 फरवरी 2011 को हुआ.

हालांकि इसका फैसला वर्ष 2007 में ही ले लिया गया था जब अधिकार प्राप्त मंत्रियों के एक समूह ने इसे हरी झंडी दी थी.

सरकार के मुताबिक दोनों विमानन सेवाओं को निजी एयरलाइन्स से कड़ी टक्कर मिल रही थी जिस वजह से उन्हें नुकसान हो रहा था.

विलय होने से भारत सरकार की ओर से घरेलू और अंतरराष्ट्रीय सभी विमानन सेवाएं ‘एयर इंडिया’ के तहत उड़ाईं जाने लगीं और कंपनी को उम्मीद थी कि इससे उसकी कार्यक्षमता बढ़ेगी.

कर्मचारियों में मतभेद

लेकिन विलय ने नई कंपनी की दिक्कतों को और बढ़ा दिया है.

'एयर इंडिया' और 'इंडियन एयरलाइन्स' के कर्मचारी अब भी मानने को तैयार नहीं कि वो एक कंपनी का हिस्सा हैं.

वेतन, काम के दायरे और तरक्की जैसे मामलों पर आपसी भेदभाव बढ़ता जा रहा है.

कई बार हड़तालें हुई हैं और वर्तमान स्थिति में 'ड्रीमलाइनर' विमान उड़ाने के लिए चालकों के प्रशिक्षण पर मतभेद के चलते कई पायलट छुट्टी पर चले गए हैं.

यात्रियों का सरोकार

विलय के बाद भी 'एयर इंडिया' के विमान अपनी क्षमता से कम पर चल रहे हैं.

'एयर इंडिया' प्रबंधन खुद प्रधानमंत्री कार्यालय को बता चुका है कि उसे अपने कर्जों पर ब्याज चुकाने में दिक्कत आ रही है.

'एयर इंडिया' पर 45,000 करोड़ रुपए के घाटे के बोझ को देखते हुए सरकार ने हाल में ही कंपनी को 30,000 करोड़ रुपए का आर्थिक पैकेज देने का फैसला किया है.

जाहिर है सरकारी खजाने से जाने वाला ये पैसा करदाताओं का ही है.

इसके अलावा बार-बार हो रही हड़तालों से यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, साथ ही राष्ट्रीय विमान कंपनी की छवि भी धूमिल हो रही है.

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