शहरो से ज़्यादा खर्च कर रहे हैं भारतीय गांव

 बुधवार, 29 अगस्त, 2012 को 20:22 IST तक के समाचार

पिछले पांच वर्षों में ग्रामीण भारत में निर्माण क्षेत्र की नौकरियों में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई जबकि कृषि क्षेत्र में काम करने वालों की संख्या घटी है.

एक अध्ययन के मुताबिक खर्च के मामले में भारतीय गांव तेजी से शहरों को पछाड़ते जा रहे हैं. दो दशक पहले शुरु हुए आर्थिक सुधारों के बाद ये पहला मौका है जब खर्च के मामले में गांवों ने शहरों को पीछे छोड़ दिया है.

रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के एक अध्ययन के मुताबिक वर्ष 2009-10 और 2011-12 के बीच ग्रामीण भारत ने 3.75 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च किया जो इसी दौरान शहरी भारत के 2.995 लाख करोड़ रुपये के आंकड़े से कहीं ज़्यादा था.

ग्रामीण भारत की आबादी को देखते हुए उत्पाद और सेवाओं की खपत हमेशा ही ज़्यादा रही है लेकिन पिछले दशक में शहरी भारत में खपत की दर बढ़ने से ये अंतर कम हो गया था.

लेकिन क्रिसिल के मुताबिक ग्रामीण इलाकों में तेज़ी से बढ़ रही खपत को बरक़रार रखने के लिए ये ज़रूरी है कि वहां सरकारी रोज़गार योजनाओं जैसी कम अवधि वाले उपायों की जगह लंबे समय तक टिकने वाले रोज़गार अवसरों को बढ़ावा दिया जाए.

ग़ैर-कृषि क्षेत्र में रोज़गार के बढ़ते अवसर

ग़ैर-कृषि क्षेत्र में रोज़गार के बढ़ते अवसरों और मनरेगा जैसी सरकारी रोज़गार योजनाओं के चलते ग्रामीण भारत में आमदनी बढ़ी जिससे इस क्षेत्र में खपत को बढ़ावा मिला.

नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइज़ेशन (एनएसएसओ) के आंकड़े दिखाते हैं कि वर्ष 2004-05 से 2009-10 के दौरान ग्रामीण निर्माण क्षेत्र में काम करने वालों की तादाद में 88 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई जबकि कृषि क्षेत्र में काम करने वालों की संख्या चौबीस करोड़ नौ लाख से घटकर बाइस करोड़ नौ लाख रह गई.

काम की तलाश में शहर गए लोगों ने वहाँ ढांचागत और निर्माण क्षेत्रों में काम किया और गांवों में रह रहे अपने परिवारों को ज़्यादा पैसा भेजा जिससे भी खपत बढ़ी.

"ग्रामीण भारत में विकास दर को बनाए रखने के लिए निजी क्षेत्र की भूमिका अहम होगी ताकि भारत को ग्रामीण इलाकों में नौकरीशुदा लोगों की बढ़ती आबादी का फ़ायदा मिले. निजी क्षेत्र द्वारा ग्रामीण इलाकों में रोज़गार के नए मौके मुहैया कराने के लिए सरकारी नीतियां महत्वपूर्ण होंगी."

धर्माकीर्ति जोशी, वरिष्ठ निदेशक, क्रिसिल

क्रिसिल के अध्ययन के मुताबिक ग्रामीण भारत की खपत में ख़ासतौर पर ज़रूरत के सामान की बजाय अपने पसंदीदा उत्पादों की ओर झुकाव देखा गया.

भविष्य गांवों में

अब हर दो में से एक ग्रामीण परिवार में एक मोबाइल फ़ोन है. यहां तक कि बिहार और ओडिशा जैसे भारत के सबसे ग़रीब राज्यों में भी हर तीन में से एक परिवार में एक मोबाइल फ़ोन है.

वर्ष 2009-10 में लगभग 42 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों में टेलिविज़न था जबकि पांच साल पहले ये आंकड़ा 26 प्रतिशत था. इसी तरह वर्ष 2009-10 के दौरान 14 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों में दोपहिया वाहन था जो कि वर्ष 2004-05 की तुलना में दोगुना है.

भारत की युवा आबादी, तेज़ी से बढ़ती आमदनी और कई उपभोक्ता उत्पादों की बाज़ार में कम पैठ--ये वो कई कारक हैं जिनसे पता चलता है भविष्य में ग्रामीण इलाके बढ़ती मांग का स्रोत होंगे.

क्रिसिल में वरिष्ठ निदेशक और मुख्य अर्थशास्त्री धर्माकीर्ति जोशी कहते हैं, "ग्रामीण भारत में विकास दर को बनाए रखने के लिए निजी क्षेत्र की भूमिका अहम होगी ताकि भारत को ग्रामीण इलाकों में नौकरीशुदा लोगों की बढ़ती आबादी का फ़ायदा मिले. निजी क्षेत्र द्वारा ग्रामीण इलाकों में रोज़गार के नए मौके मुहैया कराने के लिए सरकारी नीतियां महत्वपूर्ण होंगी."

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