नोबेल विजेता एक साल बाद भी जेल में

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Image caption शांति के नोबेल पुरस्कार का घोषणा के बाद अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा समेत कई नेताओं ने चीन से लू श्याबाओ की रिहाई की अपील की.

लू श्याबाओ को पिछले वर्ष शांति के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.

नोबेल समिति ने इस वर्ष के विजेताओं के नामों की घोषणा भी कर दी है, पर लू श्याबाओ के जीवन में कुछ नहीं बदला, पिछले अक्तूबर से वो जेल में ही हैं.

सत्ता को नुकसान पहुंचाने के जुर्म में वो 11 वर्ष की सज़ा काट रहे हैं.

अगर किसी को उम्मीद थी कि शांति के नोबेल पुरस्कार से लू श्याबाओ की सज़ा की अवधि कम होगी या चीन के समाज में खुलापन बढ़ेगा, तो वे ग़लत थे.

बल्कि इसका उलट ही हुआ है. लू श्याबाओ की पत्नी लू शिया अपने घर में नज़रबंद लगती हैं और कई चीनी सामाजिक कार्यकर्ता सरकार के निशाने पर हैं.

लेकिन ऐसा भी नहीं कि चीन में मानवाधिकारों पर बहस ख़त्म हो गई हो.

55 वर्षीय लू श्याबाओ के सम्मानित किए जाने और बाद में अरब क्रांति ने, चीन के राजनीतिक ढांचे और उसके राजनेताओं पर ध्यान केन्द्रित किया है.

नोबेल शांति पुरस्कार

लू श्याबाओ को वर्ष 2009 में क्रिसमस के दिन सज़ा सुनाई गई थी. उनका जुर्म था राजनीतिक बदलाव की पैरवी करने वाले एक घोषणापत्र को लिखने में सहायता देना.

वो 20 वर्षों से इन मुद्दों पर आवाज़ उठाते आए थे लेकिन उस व़क्त वो चर्चित नहीं थे, ना चीन में और ना ही विश्व में.

लेकिन उनका लिखा घोषणापत्र और फिर उन्हें सुनाई गई कड़ी सज़ा ने अचानक उन्हें दुनिया की नज़रों में जगह दे दी.

संयोगवश ये उसी समय हुआ जब नोबेल शांति पुरस्कार समिति चीनी सरकार के ख़िलाफ आवाज़ उठाने वाले एक कार्यकर्ता की तलाश कर रही थी.

समिति के स्थाई सचिव गीर लुन्डेस्टैड ने कुछ दिन पहले कहा था, “अपने अनुभव से हम जानते थे कि चीन में सत्ता-विरोधी स्वर बंटे हुए हैं, एक तरीके से चीनी सरकार ने हमारे लिए फैसला आसान कर दिया.”

पुरस्कार की घोषणा होने तक लू श्याबाओ की पत्नी लू शिया नियमित रूप से उन्हें जेल में मिलने जाती थीं, लेकिन फिर सब बदल गया.

लू शिया मानो अचानक ग़ायब हो गईं. राजधानी बीजिंग में उनके घर के बाहर कड़ा पहरा हो गया.

उनका टेलिफोन और इंटरनेट कनेक्शन काट दिया गया. बीबीसी की टीम ने जब उनसे मिलने की कोशिश की तो रोक दिया गया.

मनमानी नज़रबंदी पर संयुक्त राष्ट्र के वर्किंग ग्रुप ने पिछले वर्ष जब इन पाबंदियों पर सवाल उठाए तो चीनी सरकार ने कहा कि लू शिया कोई क़ानूनी रोकटोक नहीं लगाई गई है.

मुश्किल हुई ज़िन्दगी

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Image caption लू श्याबाओ को पुरस्कार दिए जाने की घोषणा के बाद से उनकी पत्नी लू शिया सार्वजनिक जगहों पर नहीं दिखती है.

अन्य मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, वकीलों और इंटरनेट के माध्यम से अपना विरोध प्रकट करने वालों के लिए पिछले एक वर्ष में ज़िन्दगी और मुश्किल हो गई है.

मध्य-पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में राजनीतिक उठापठक ने शायद चीनी नेताओं को परेशान किया है और उन्हें डर है कि बदलाव की मांग उनके देश में भी तेज़ ना होने लगे.

इसलिए हर विरोधी स्वर को दबाया जा रहा है. लोगों को डराया धमकाया गया है, हिरासत में लिया गया है और कई बार उनके ख़िलाफ कड़ी कार्रवाई तक की गई है.

चाइनीज़ ह्यूमन राइट्स डिफेन्डर्स के मुताबिक, “एक चीनी नागरिक को पहली बार शांति के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किए जाने से देश में मानवाधिकारों की स्थिति बदलेगी, ऐसी सभी उम्मीदें अगर जगी भी थीं तो ख़त्म हो गई हैं.”

नोबेल समिति के गीर लुन्डेस्टैड ने कहा कि उन्हें चीनी सरकार का रवैया आश्चर्यचकित नहीं करता है.

समिति को अब उस दिन का इंतज़ार है जब लू श्याबाओ अपना मेडल और क़रीब 15 लाख डॉलर की इनामी राशि लेने आएं और अपना नोबेल उपदेश दें.

लू श्याबाओ की सज़ा के आठ वर्ष अभी बाकि हैं, तो ऐसा होने में समय लग सकता है. पर जैसे गीर लुन्डेस्टैड ने कहा, “हम बहुत समय तक सब्र कर सकते हैं.”

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