ईरान मामले पर चीन विकट स्थिति में

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Image caption ईरान के ख़िलाफ़ लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों ने चीन के लिए विकट स्थिति पैदा कर दी है.

ईरान पर पश्चिमी देशों के आर्थिक प्रतिबंधों में सख़्ती के बढ़ाए जाने के बाद, जिसके भीतर उसके तेल की बिक्री पर रोक लगाने की कोशिश की जा रही है; चीन भारी दुविधा की स्थिति का सामना कर रहा है.

ईरान के कच्चे तेल निर्यात का तक़रीबन बीस प्रतिशत चीन को जाता है और एक तरह से वो ईरान से व्यापार संबंध रखनेवाले देशों में सबसे अहम है. इसलिए ईरान के विरूद्ध किसी भी तरह के आर्थिक प्रतिबंध के सफ़ल होने के लिए चीन का सहयोग बहुत ज़रूरी है.

हालांकि ये साफ़ नहीं है कि क्या चीन इसमें किसी तरह की मदद करने को तैयार है या नहीं.

इनकार

अमरीका के वित्त मंत्री तिमोथी गैथनर ने जनवरी की शुरूआत में अपनी बीजिंग यात्रा के दौरान जब चीन के नेताओं पर इसके दबाव बनाने की कोशिश की तो चीन से इससे मना कर दिया.

लेकिन पश्चिमी देशों, ख़ासतौर पर अमरीका के साथ संबंध की वजह से चीन इन मुल्कों की तरफ़ से डाले जा रहे दबावों की पूरी तरह से अनदेखी कर ईरान के साथ व्यापार को पहले की तरह जारी नहीं रख सकता है.

ये समझने के लिए चीन इस मुश्किल भरी स्थिति में किस तरह से अपने हितों की रक्षा कर पाता है, पहले ईरान के प्रति चीन की नीति को जानना ज़रूरी है.

इनमें सबसे अहम है आर्थिक स्वार्थ.

दोहरी नीति

ईरान प्रतिदिन कच्चे तेल का पांच लाख बैरेल चीन को सप्लाई करता है और इस तरह चीन की ऊर्जा सुरक्षा में उसकी बहुत अहम भूमिका है.

ईरान से तेल के निर्यात पर रोक लगने से चीन के लिए विकट स्थिति पैदा हो जाएगी और वो स्थिति तब तक बनी रहेगी जबतक तेल निर्यात करनेवाला कोई दूसरा देश, जैसे सऊदी अरब, इस कमी को पूरी करने को तैयार नहीं होता है.

इसके अलावा चीन की तेल क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियों ने ईरान में तेल के खनन और शुद्धीकरण के लिए अरबों डॉलर के अनुबंध पत्रों पर हस्ताक्षर कर रखे हैं.

अगर चीन पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों में शामिल होता है तो उसका अर्थ होगा इन फ़ायदेमंद सौदों से हाथ धोना.

सैद्धांतिक विरोध

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Image caption हाल में कई ईरानी वैज्ञानिकों की हत्याएं हुई हैं.

इसके अलावा चीन मूल रूप से किसी भी तरह के आर्थिक प्रतिबंधों के ख़िलाफ़ है.

अगर ये आर्थिक प्रतिबंध संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की तरफ़ से लगाए जाते तो शायद चीन तेल व्यापार पर लगाए गए प्रतिबंधों के लिए राज़ी भी हो जाता लेकिन चूंकि इस मामले पर पहल अमरीका और दूसरे पश्चिमी देशों की तरफ़ से हुई है तो चीन को लगता है कि इसे अंतरराष्ट्रीय वैधता प्राप्त नहीं है.

वैसे भी चीन ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अमरीका के रवैये को दो मुंही नीति के तौर पर देखता है. उसका मानना है कि एक तरफ़ तो अमरीका इसराइल के कार्यक्रम का विरोध नहीं करता लेकिन ईरान के ख़िलाफ़ बल प्रयोग की धमकी दे रहा है.

इसलिए चीन ने अभी तक इस मामले में मध्य मार्ग अपनाया है.

वो मानता है कि ईरान जबतक अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के नियमों के दायरे में रहते हुए परमाणु संवर्द्धन का काम करता है उसमें कुछ ग़लत नहीं.

चीन ने ईरान के ख़िलाफ़ आर्थिक प्रतिबंधों को महज़ उसे नियमों के दायरे में रहने के लिए मजबूर करने के लिए समर्थन दिया है.

अहम मित्र

लेकिन साथ ही चीन को ये भी देखना है कि वो क्षेत्र में अपने दूसरे सहयोगी देश जैसे सऊदी अरब को नाराज़ न कर दे. सऊदी अरब ईरान के परमाणु कार्यक्रम के ख़िलाफ़ है.

चीन के लिए सऊदी अरब के साथ बेहतर संबंध ज़रूरी है जिसके लिए वो सालों से प्रयासरत है.

चीन के लिए अमरीका से मज़बूत संबंध उसके ईरान के साथ रिश्तों से कहीं ज़्यादा अहम है.

विश्व भर में चीन का सबसे अधिक निर्यात अमरीका को होता है और अगर उसे लगे कि चीन जानबुझकर उसके क़दम में रूकावट डालने की कोशिश कर रहा है तो चीन के लिए मुश्किलें पैदा कर सकता है.

क़िल्लत

चीन को मालूम है कि इसराइल चाहता है कि ईरान पर पहले ही हमला कर दिया जाए. अगर ऐसा होता है तो फ़ारस की खाड़ी में होने वाली लड़ाई के कारण दुनियां भर को तेल की भारी क़िल्लत झेलनी पडे़गी.

इन हालात में ईरान के ख़िलाफ़ प्रतिबंधों को मान लेना ही व्यावहारिक होगा.

चीन कोशिश करेगा कि वो कई मोर्चों पर अपने हितों की रक्षा कर सके.

ईरान के साथ संबंधों को ख़राब होने से बचाने के लिए चीन आधिकारिक तौर पर प्रतिबंधों का विरोध करता रहेगा.

तेल निर्यात

लेकिन अगर तेल के दूसरे आयातक जैसे जापान और दक्षिण कोरिया प्रतिबंधों को समर्थन देने में शामिल हो जाते हैं तो वो ईरान के साथ व्यापार को धीरे-धीरे कम कर देगा.

इस बीच वो सऊदी अरब से तेल निर्यात का मामले को पक्का कर लेगा.

इन सबके बावजूद अगर लड़ाई शुरू हो जाती है तो चीन इसके प्रभाव से नहीं बच पाएगा लेकिन इस विकट स्थिति में चीन इसके अलावा और कुछ कर भी नहीं सकता है.

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