क्या राजनीतिक विवाद का शिकार हुए हैं बो शिलाई

  • 18 अप्रैल 2012
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Image caption जानकारों का कहना है कि बो शिलाई देश की सर्वोच्च पॉलित ब्यूरो की स्थायी समीति के लिए दावेदार थे.

चीन का कहना है कि बो शिलाई को कम्यूनिस्ट पार्टी के पदों से हटाया जाना, कानूनी प्रक्रिया का एक साधारण मामला है.

उन्हें ब्रितानी कारोबारी नील हेवुड की संदिग्ध हत्या के सिलसिले में पोलित ब्यूरो से हटाया गया है.

कम्युनिस्ट पार्टी के आधिकारिक संपादकीय लेखों में कहा गया है कि इस मामले में बो शिलाई की पड़ताल इस बात का उदाहरण है कि कम्युनिस्ट पार्टी 'कानून की रखवाली' करती है.

इन लेखों में टिप्पणी करते हुए इस विचार को खारिज किया गया है कि बो शिलाई का पतन का मामला शीर्ष स्तर पर राजनीतिक असहमति से जुड़ा हुआ है.

लेकिन कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि बो शिलाई को बर्खास्त किए जाने की ये बेहद साधारण व्याख्या है.

जानकारों के मुताबिक बो शिलाई देश की सर्वोच्च पोलित ब्यूरो की स्थायी समीति के लिए भी दावेदार थे.

कानून का 'हथियार के तौर पर' इस्तेमाल

चीन में इस साल नेतृत्व-परिवर्तन होना है और 10 साल में एक बार होने वाला ये बदलाव अक्तूबर में शुरु होगा.

ब्रिटेन की नॉटिंघम यूनिवर्सिटी स्थित चाइना पॉलिसी इंस्टीट्यूट के निदेशक प्रोफेसर स्टीव सेंग का कहना है, ''ये कानूनी नहीं बल्कि राजनीतिक मामला है.''

बो शिलाई को पद से हटाने की घोषणा होने के फौरन बाद 'पीपुल्स डेली' अखबार में एक संपादकीय छापा गया.

इसमें कहा गया कि ये मामला दिखाता है कि चीन में तथ्यों और वैधानिक तंत्र का कितना सम्मान किया जाता है. इसमें लिखा गया है, ''चीन में कानून से बड़ा कोई नहीं है.''

एक अन्य अखबार ग्लोबल टाइम्स का कहना है कि बो शिलाई का मामला चीन में खुलेपन के एक नये अध्याय का सूचक है.

कम्युनिस्ट पार्टी के नियंत्रण वाले इस अखबार के संपादकीय में लिखा गया है, ''चीन में किसी की बर्खास्तगी को भय की वजह से छुपाने वाला युग समाप्त हो गया है.''

लेकिन ये विचार कि बो शिलाई के खिलाफ कानूनी कार्रवाई राजनीतिक मंजूरी के बिना हो सकती थी, चीन में न्यायिक तंत्र की भूमिका की गलत व्याख्या होगी.

'राजनीतिक मंजूरी'

ज्यादातर वरिष्ठ अधिकारी खुलेआम इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टी ने अपनी नीतियों की खातिर कानून को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया है.

राजधानी बीजिंग में संसद के सालाना अधिवेशन में चीन की कानून व्यवस्था पर इस वर्ष पेश की गई एक रिपोर्ट में इस नजरिए का एक उदाहरण भी दिया गया था.

इसमें कहा गया था कि कानून के जानकारों का सबसे महत्वपूर्ण काम कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों को लागू करने के लिए जमीन तैयार करना है.

हांगकांग स्थित चाइनीज़ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर विली लेम का कहना है, ''जो भी सत्ता में होता है, उसे ये सुनिश्चित करना होता है कि न्यायिक तंत्र, सत्ता पर काबिज धड़े के नियंत्रण में रहे. इसके बाद अपने विरोधियों पर हमला करने के लिए कानून का इस्तेमाल करना आसान होता है.''

ऐसा पहले भी किया गया है. बीजिंग के पूर्व महापौर चेन शिटोंग और शंघाई में पार्टी के पूर्व सचिव चेन लियांग्यू दोनों को ही भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल भेजा गया था.

लेकिन इन दोनों ही मामलों में राजनीतिक घमासान ने उन्हें सलाखों के पीछे भेजने में अहम भूमिका निभाई थी.

नेताओं में आम सहमति की कमी

चीन का सबसे महत्वपूर्ण संदेश शायद ये है कि बो शिलाई का मामला एक साधारण कानूनी मसला है.

लेकिन इसमें एक अहम बात की अनदेखी की गई है कि बो शिलाई पर कोई जुर्म करने का आरोप अभी तक नहीं लगाया गया है.

चीन के अधिकारी अभी तक यही कह रहे हैं कि बो शिलाई, नील हेवुड की संदिग्ध हत्या मामले में गंभीर अनुशासनात्मक उल्लंघन में शामिल हैं.

इन हालातों में उनके राजनीतिक पतन को महज एक कानूनी मामले की तरह देखना मुश्किल है.

कम्युनिस्ट पार्टी ने इस विचार को दूर करने के लिए कड़ी मेहनत की है कि शिलाई के मामले का संबंध, पार्टी में शीर्ष स्तर पर असहमति से जुड़ा है.

सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के एक आलेख में कहा गया है, तथाकथित राजनीतिक संघर्ष से इसका कुछ लेना-देना नहीं है.

लेकिन विश्लेषकों ने इस व्याख्या को मानने से इनकार कर दिया है.

उनका तर्क है कि पार्टी यदि वाकई एकजुट है तो वो इस बात पर इतना जोर आखिर क्यों दे रही है?

बीजिंग स्थित पीपुल्स यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर झियांग सोन्गजुओ का कहना है कि चीन के नेता एकजुट नजर आने के लिए सार्वजनिक तौर पर एक-दूसरे की आलोचना करना पसंद नहीं करते.

वे कहते हैं, ''लेकिन उनमें संघर्ष, विवाद और अलग-अलग नजरिए होते हैं. उनमें आम सहमति नहीं होती है.''

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