हिंदी फ़िल्में क्यों बनती जा रही हैं घाटे का सौदा

  • आकार पटेल
  • वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
भारतीय फ़िल्मों में बहुत ज्यादा एक्शन नहीं होता
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भारतीय फ़िल्मों में बहुत ज्यादा एक्शन नहीं होता

कुछ साल पहले बॉलीवुड ने फ़िल्म बनाने के लिए वित्तीय मदद की गुहार की थी. उस समय बैंकों को इसकी इजाज़त नहीं थी कि वे प्रोड्यूसरों को कर्ज़ दें. इसकी वजह शायद यह थी कि स्क्रिप्ट और अभिनेता के डेट को बैंको से कर्ज़ लने के लिए ज़रूरी कोलैटेरल गारंटी नहीं माना जाता था.

इसका मतलब यह हुआ कि फ़िल्म प्रोड्यूसर दूसरे स्रोतों से पैसे का इंतजाम करते थे और कई बार इसमें अंडरवर्ल्ड भी शामिल हुआ करता था. तक़रीबन 20 साल पहले किसी फ़िल्म स्टार या प्रोड्यूसर के आपराधिक छवि वाले किसी शख़्स के संपर्क में होना कोई असामान्य बात नहीं होती थी.

लगता है कि अब ऐसा नहीं होता. हाल के दिनों में फ़िल्म बनाने वालों के लिए पैसे का इंतजाम करने के दूसरे रास्ते खुल गए हैं. इससे यह संकेत मिलता है कि बॉलीवुड अब तक बड़ उद्योग बन चुका होगा और पहले की तुलना में तेज़ी से बढ़ रहा होगा.

हकीक़त इससे अलग है.

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ऩिर्देशक करण जौहर फ़िल्मी हस्तियों के साथ

मशहूर फ़िल्म प्रोड्यूसर करन जौहर ने बीते दिनों एक इंटरव्यू में कहा कि भारत में फ़िल्में देखने वाले दर्शकों की तादाद हर साल कम होती जा रही है. वैसे, अंदर की जानकारी रखने वालों को यह बात पहले से मालूम है.

इसमें एक वजह तो बुनियादी सुविधाएं हैं. भारत में एक लाख लोगों पर सिनेमा का एक पर्दा यानी स्क्रीन है. दुनिया के सबसे बड़े फ़िल्म उद्योग अमरीका में एक लाख की जनसंख्या पर 12 फिल्मी पर्दे हैं. हॉन्ग कॉन्ग की बदौलत चीन में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा फ़िल्म उद्योग है. यहां एक लाख लोगों पर 2.5 स्क्रीन हैं.

ऐसे समय जब भारत में पुराने सिनेमा हॉल तोड़े जा रहे हैं और उनकी जगह मॉल बनते जा रहे हैं, आबादी के अनुपात से स्क्रीन की संख्या और कम होने वाली है.

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पुराने सिनेमा घरों की जगह बन रहे हैं मॉल

दूसरी समस्या यह है कि नए खुल रहे मॉल में बन रहे मल्टीप्लेक्स मध्य वर्ग के बड़े हिस्से के लिए काफ़ी मंहगे हैं. इन मल्टीप्लेक्स में टिकट की औसत कीमत 250 रुपए है और पूरे परिवार को नियमित रूप से सिनेमा दिखाने से महीने में कई हज़ार रुपए की चपत पड़ेगी. सेवा शुल्क और मनोरंजन कर काफ़ी ज़्यादा हैं. टिकट की क़ीमत कम करने की बहुत गुंजाइश भी नहीं बची है.

ऐसा भी नहीं है कि प्रोड्यूसर और स्टूडियो वाले बहुत लालची हो गए हैं. एक बड़े प्रोड्यूसर वॉल्ट डिज़नी ने हाल ही में बॉलीवुड में फ़िल्म बनाने के धंधे से बाहर निकलने का ऐलान कर दिया. उसका कहना है कि उसे यहां काफ़ी घाटा उठाना प़ड़ा है.

सिनेमा देखने वालों की तादाद कम होने की कुछ वजहें तो फ़िल्म उद्योग के अंदर ही हैं. एक दोस्त ने मुझसे कहा कि बॉलीवुड के बड़े स्टार पर्याप्त तादाद में फ़िल्में नहीं बनाते और देखने को कुछ ख़ास नहीं है.

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सलमान ख़ान, आमिर ख़ान, शाहरुख ख़ान

आमिर ख़ान, शाहरुख ख़ान और सलमान ख़ान औसतन साल में एक फ़िल्म ही करते हैं. वे विज्ञापन और टेलीविज़न से पैसे बनाते हैं. इसका मतलब यह हुआ कि बहुत से लोगो ऐसे हैं जिनके पास खर्च करने को पैसे हैं और वे फ़िल्म देखना भी चाहते हैं, पर देखने के लिए कुछ है ही नहीं.

हॉलीवुड और हॉन्ग कॉन्ग के साथ तीन सबसे बड़े फ़िल्म उद्योगों में बॉलीवुड भी है. हर एक में एक स्टार सिस्टम है. इस स्टार सिस्टम का मतलब होता है कि मशहूर और पहचान रखने वाले ऐसे अभिनेताओं की पूरी सूची जो यह गारंटी दें कि फ़िल्म एक निश्चित तादाद में दर्शकों को ज़रूर ही खींच लाएगी.

यदि हम दक्षिण भारत की भाषाओं तमिल, तेलगु, कन्नड़ और मलयालम में बनने वाली फ़िल्मों को जोड़ लें तो सबसे ज़्यादा फ़िल्में बॉलीवुड में ही बनती हैं. समस्या यह है कि बड़े नाम के स्टार कम हैं. हॉलीवुड में बड़ी फ़िल्मों में काम करने वाले बड़े स्टारों की बहुत अधिक संख्या है.

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दक्षिण भारत के सुपर स्टार रजनीकांत

दूसरी बात यह है कि हॉन्ग कॉन्ग में बनने वाली फ़िल्मों की तरह हॉलीवुड की फ़िल्में सार्वभौमिक नहीं होती हैं.

मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं? हॉन्ग कॉन्ग में बनने वाली मार्शल आर्ट की फ़िल्मों में मारधाड़ और ऐक्शन होता है. ब्रूस ली और जैकी चैन जैसे उनके हीरो अमरीका और भारत में भी काफ़ी लोकप्रिय हैं. दूसरी भाषाओं में डबिंग होने पर हॉन्ग कॉन्ग की फ़िल्मों की चमक नहीं खोती, क्योंकि वे एक्शन पर आधारित होती हैं.

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हॉन्ग कॉन्ग के सुपर स्टार जैकी चैन

भारत की फ़िल्में एक्शन आधारित नहीं होती हैं और जो एक्शन होता है, वो हॉन्ग कॉन्ग फ़िल्मों की तरह अच्छी क्वालिटी का नहीं होता. इन फ़िल्मों में नाच गाना होता है, जिसकी डबिंग आसान नहीं. डबिंग के बाद इनकी गुणवत्ता काफ़ी कम हो जाती है. इसलिए हॉन्ग कॉन्ग की फ़िल्मों की तुलना में भारत में बनी फ़िल्मों की निर्यात से होने वाली कमाई काफ़ी कम होती है. इन फ़िल्मों को पसंद करने वाले और देखने वालों में ज़्यादातर लोग दक्षिण एशियाई मूल के होते हैं.

यहां भी दर्शकों की तादाद कम हो रही है. पाकिस्तान के मल्टीप्लेक्स में भारतीय फ़िल्मों की बड़ी मांग है. कई दशकों तक बॉलीवुड की कमाई का यह रास्ता बंद रहा, क्योंकि फ़िल्मों की कॉपी चोरी छिपे और ग़ैर कानूनी तरीकों से बनाई जाती थी. परवेज़ मुशर्रफ़ के राष्ट्रपति रहते पाकिस्तान में भारतीय फ़िल्में दिखाने की छूट मिली. इससे दोनों देशों को फ़ायदा हुआ.

अब तो बॉलीवुड की सभी फ़िल्में वहां दिखाई जाती हैं. फ़िलहाल दोनों देशों के रिश्ते इतने ख़राब है कि मुशर्रफ़ का फ़ैसला पलट दिया जाए तो कोई ताज्ज़ुब की बात नहीं.

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भारतीय फ़िल्मों के लिए बहुत बड़ा बाज़ार है पाकिस्तान

ज़बरदस्त संभावना होने के बावूजद इन वजहों से ही बॉलीवुड तेज़ी से नहीं फल फूल रहा है. भारतीय अर्थव्यवस्था के दूसरे अंगों की तरह ही लगता है बॉलीवुड में जितना आगे बढ़ने की क्षमता है उतना वो बढ़ नहीं पा रहा है.