'फ़िल्म में मेरे अपने मंटो हैं जो बेहद ग़ुस्से में हैं'

मैंने बचपन से ही, लगभग सातवीं क्लास के आसपास मंटो को पढ़ना शुरू किया. आज तक पढ़ता आया हूं और हर बार उन्हें और समझा हूं.

मंटो के लेखन में बंटवारे का ज़िक्र ज़रूर आता है और हम स्कूली किताबों में जो बंटवारा पढ़ चुके हैं वो बहुत अलग है. मैं कहूंगा कि बंटवारे को लेकर जो भी उलझनें हैं वह सब मंटो को पढ़ कर दूर हुईं.

मेरी फ़िल्म में वो मंटो हैं जो मेरे अपने हैं, उनकी वो व्याख्या है जो मैंने रची है. मैं ऐसा कह रहा हूं क्योंकि एक अभिनेता और दिग्दर्शक के तौर पर मंटो मेरी शख्सियत में स्वाभाविकता से समा गए.

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इस वजह से आपको इस फ़िल्म में मंटो का मेरा अपना इंटरप्रेटेशन मिलता है. इस फ़िल्म को शाहिद नज़ीम ने लिखा है जिन्होंने मंटो को अपने लेखन से थिएटर में भी प्रस्तुत किया है. उनके रिसर्च के अनुसार मंटो के किरदार को लेकर उनकी भी अपनी व्याख्या है.

बंटवारे के बाद पाकिस्तान आ कर बसे मंटो की ज़िंदगी के पिछले वर्षों पर बनी इस फ़िल्म में जो मंटो मिलते हैं वो बहुत नाराज़ और क्रोधित हैं.

मेरी फ़िल्म के मंटो अपने आसपास के हालात से खुश नहीं हैं और इन हालातों की वजह से जो ग़म उनके मन में हैं उससे भी वो लड़ रहे हैं.

यह उनकी ज़िदंगी का सबसे ज़्यादा अंधकार भरा दौर रहा. वो बीमार रहने लगे, उन पर अश्लीलता के केस हुए और उनके मन में विचारों की आंधी भी चल रही थी.

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Image caption फिल्म के निर्देशक और कलाकार सरमद ख़ूसट

बंबई से अपना करियर छोड़कर लाहौर आने के बाद उनकी आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं थी. मेरी फ़िल्म में वही मंटो हैं जो अंदर से सदमे में हैं, जो मज़हब या सियासत को लेकर कटाक्ष भी करते हैं. मेरे मंटो के मन में कई शैतान हैं जो उन्हें परेशान कर रहे हैं, वह उनसे लड़ रहे हैं तो अपनी बीमारी से भी जूझ रहे हैं.

फ़िल्म में मंटो की कहानियों के किरदार भी हैं क्योंकि उन्हें मंटो से अलग करना लगभग नामुमकिन है. समझ लीजिए कि चार-पांच मंटो हैं इस फ़िल्म में जो बड़े ही जटिल से हैं.

बड़ी दृढ़ राय रखने वाले मंटो साहित्य में पॉपुलर हुए क्योंकि उनका लेखन लोगों के लिए समझना मुश्किल नहीं था. उनके लेखन में उर्दू, हिंदी, अंग्रेज़ी - तीनों भाषाओं का उपयोग हुआ, जो बताता है कि वह सभी के लिए लिखते थे. मेरी भी वही कोशिश रही है.

मैंने जब फ़िल्म बनाने की सोची तब मेरे मन में यही था कि जिस तरह मैंने मंटो को समझा है, बस वैसे ही मैं उन्हें लोगों तक पहुंचा पाऊं.

सिनेमा के माध्यम के लिए कुछ स्वतंत्रता लेनी ज़रूरी होती है क्योंकि वह दर्शकों को अलग तरीके से प्रभावित करता है. किसी भी बड़े शख्स पर फ़िल्म बनती है तब उसे लेकर चर्चाएं और आलोचनाएं होती है क्योंकि उस शख्सियत को अकादमिक दायरे से देखा जाता है, लेकिन सर्जनात्मक व्यक्ति के अपने दायरे होते हैं.

मैंने ही इस फ़िल्म में मंटो का किरदार निभाने का निर्णय किया. मैं ये नहीं कहता कि मैं सबसे श्रेष्ठ विकल्प हूं, लेकिन मैं ऐसा अभिनेता चाहता था जो उनके काम से वाकिफ़ हो, जिसने उनको पढ़ा हो और उनसे एक कनेक्ट बना सके. हां ये निर्णय थोड़ा स्वार्थी भी था क्योंकि कौन मंटो का किरदार निभाना नहीं चाहेगा?

फ़िल्म का बड़ी वर्ज़न साल के आखिर तक रिलीज़ होगा. इस फ़िल्म के ज़रिए मैंने उनकी कहानियों को, उनके व्यक्तित्व को और क़रीब से जाना है.

(चिरंतना भट्ट के साथ बातचीत पर आधारित)

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