सुरों को बांटा नहीं जा सकता: अमजद अली ख़ान

  • संजय मिश्रा
  • मुंबई से बीबीसी हिंदी के लिए

पद्म विभूषण सरोद वादक उस्ताद अमजद अली ख़ान ने कहा है, "मैं वो पहला कलाकार हूं जो 25 वर्षों के सांस्कृतिक मौन को दर्शाने पाकिस्तान गया था."

उन्होंने कहा, ''फ़िलहाल पाकिस्तान एक नए अल्फ़ाज़ की तरह है और नए-नए देशों में अक्सर संस्कृति की कमी रहती ही है. पूरी दुनिया में ज़मीन का बंटवारा भले हो गया हो, पर स्वरों का बंटवारा कोई नहीं कर सकता."

अमजद अली ख़ान कहते हैं, "हम चाहे किसी भी धर्म या संप्रदाय से जुड़े हों, संगीत हमेशा से आध्यात्म का मार्ग रहा है."

बीबीसी से खास मुलाक़ात में संगीत के महत्व को समझाते हुए उन्होंने बताया, "जब मैं स्टेज पर होता हूं, तब उन चंद लम्हों में मुझे ऐसा अनुभव होता है जैसे मैं किसी अलौकिक दुनिया में चला गया हूं. कभी-कभी यह अविश्वसनीय भी लगता है."

अमजद अली ख़ान आगे कहते हैं कि, "संगीत से जुड़ना और संगीतज्ञ होना अपने आप में एक वरदान है. जो अपने अंदर अलग ऊर्जा प्रदान करती है."

अमजद अली ख़ान कहते हैं कि संगीत कोई बहस का मुद्दा नहीं है. संगीत अपने आप में सर्वोच्च शक्ति के साथ जुड़ने का सर्वश्रेष्ठ माध्यम होता है. संगीत के कई आयाम हैं जो संवाद, मंत्रोच्चार, मौखिक गायन - याद करने से लेकर वाद्य यंत्र वादन तक जुड़े होते हैं."

देश की सीमा पर हाल में हुए उड़ी हमले पर अफ़सोस जताते हुए वो कहते हैं, "हर रोज कहीं न कहीं यह आतंकी हमले हो रहे है. ऐसे में ज़रूरी है सभी देश खुद को अंदर से मजबूत बनाएं."

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