'मुग़ल-ए-आज़म' के डायलॉग अब थियेटर में सुनिए

  • चिरंतना भट्ट
  • मुंबई से, बीबीसी हिंदी के लिए
'मुग़ल-ए-आज़म' नाटक

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1960 में पहली बार बड़े पर्दे पर अनारकली ने सलीम से कहा, "कांटो को मुरझाने का खौफ़ नहीं होता."

2004 में अनारकली ने सलीम से एक बार फिर यही कहा लेकिन इस बार पर्दे पर रंग चढ़ गया था - फ़िल्म कलर में रिलीज़ हुई थी.

अब 2016 में एक बार फिर अनारकली और सलीम मिल रहे हैं, उनके बीच फिर संवाद होगा, लेकिन इस बार यह डॉयलाग रूपहले पर्दे पर नहीं मंच पर दोहराये जाएंगे.

के. आसिफ़ की ऐतिहासिक फ़िल्म 'मुग़ल-ए-आज़म' को फ़िल्म और नाट्य निर्देशक फ़िरोज़ अब्बास ख़ान म्यूज़िकल नाटक के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं.

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एनसीपीए के साथ मिलकर शापूरजी पालोनजी ग्रूप ऑफ कंपनी ने इस नाटक को प्रोड्यूस किया है.

शापूरजी पालोनजी वह कंपनी है जिसके मालिक ने 1960 में भी के.आसिफ़ को फ़िल्म के लिए आर्थिक मदद दी थी और 2004 में इस क्लासिक को रंगीन बनाने में भी पूंजी लगाई थी.

'तुम्हारी अमृता', 'सेल्समेन रामलाल' जैसे नाटकों के निर्देशक' फ़िरोज़ खान बताते हैं, "मुग़ल-ए-आज़म' फ़िल्म से हर इंसान की अपनी अलग भावनाएं, यादें जुड़ी हैं. सबसे बड़ी चुनौती लोगों की अपेक्षाओं पर खरा उतरना है. कहानी वही है, संवाद भी वही है, लेकिन माध्यम और अभिनेता बदल चुके हैं. निर्देशक के तौर पर मेरा एक ही मक़सद था कि थिएटर की भाषा, फ़िल्म के प्रभाव में खोनी नहीं चाहिए. अभिनेताओं को पहली बात यही बताई गई थी कि उन्हें फ़िल्म के प्रभाव से दूर होकर इन किरदारों को मंच पर ज़िंदा करना है. वही बात अलग अंदाज़ में कहनी होगी."

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फ़िरोज़ खान मिनीमैलिस्ट थिएटर के लिए जाने जाते हैं.

वह बताते हैं, "इतना ग्रैंड प्रोडक्शन मैं भी पहली बार कर रहा था. कोई भी मायने में यह प्रोडक्शन की भव्यता कम ना हो इसका ध्यान रखना ज़रुरी था."

'मुग़ल-ए-आज़म' नाटक के कॉस्ट्यूम डिज़ाइनर मनीष मल्होत्रा बताते हैं कि 'मुग़ल-ए-आज़म' और 'पाकीज़ा' फ़िल्में हमेशा से मेरे दिल के क़रीब रही हैं. इस नाटक की वजह से मुझे अनारकली, बहार, सलीम, जोधा जैसे किरदारों से क़रीब आने का मौका मिला. फ़िल्मों में जिस तरह के कपड़े थे उससे अलग काम करना ज़रूरी था, क्योंकि यह मंच है जहां लाइटिंग को ध्यान में रखकर कलर बैलेंस करना ज़रूरी होता है.

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मैडोना के कॉन्सर्ट्स में प्रोडक्शन डिज़ाइन संभाल चुके जॉन नरुन इस प्रोडक्शन से जुड़े हैं.

उनके मुताबिक़, "हमने पहले तीन-चार बार फ़िल्म देखीं. उस वक़्त की स्थापत्य शैली को समझने के साथ भारत की संस्कृति को सही दिखाना भी ज़रूरी था. जहां शीशमहल, जोधा का शयनकक्ष, छत, अकबर का दरबार, बगीचे जैसी सुंदर दृश्य हैं."

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इस म्यूज़िकल में नृत्य निर्देशन करनेवाली बंगलुरु की मयूरी उपाध्या बताती हैं, "मेरे पास जब यह काम आया तब ना कहने का तो सवाल ही नहीं था. हमने पूरे देश से तीस ऐसे कथक डांसर ढूंढ़े जो पूरे दो महीने तक दिन के आठ घंटे इसके अभ्यास के लिए आने को तैयार थे. दिल्ली के कथक गुरु गौरी दिवाकर और मेरी बहन माधुरी उपाध्या भी निर्देशन में मेरे साथ थीं."

शापूरजी ग्रूप्स के सीइओ दिपेश साल्गिया प्रोडक्शन के बजट के बारे में बताते हैं, "जब मुग़ल-ए-आज़म की बात आती है तब बजट के बारे में नहीं कहा जा सकता. उस ज़माने में फ़िल्म का बजट देढ़ करोड तक पहुंच गया था. आज हम सिर्फ इतना बता सकते हैं कि इस नाटक के कॉस्ट्यूम का बजट दूसरे नाटक की पूरी प्रोडक्शन कॉस्ट से ज़्यादा है. यह फ़िल्म एक विरासत है और इसी भावना से हमने इस प्रोडक्शन पर काम किया है."

मुग़ल-ए-आज़म फ़िल्म के सभी गानों के साथ दो और गाने मिलाकर कुल आठ़ गानों का नाटक के मंचन के दौरान लाइव परफॉर्मेंस होगा. तीस डांसर्स ठुमरी, गानों में और जान डालेंगे.

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फ़िल्म का संगराश नाटक में सुत्रधार है. 21 अक्टूबर को 'मुग़ल-ए-आज़म द म्यूज़िकल' का प्रीमियर हो रहा है.

इसके बाद दिल्ली में भी इस का मंचन किए जाने की तैयारी है.

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