फ़िल्म रिव्यू: शिवाय में कमाल के स्टंट लेकिन...

  • सुशांत एस मोहन
  • बीबीसी संवाददाता, मुंबई

फ़िल्म: शिवाय

निर्देशक: अजय देवगन

रेटिंग: **

अजय देवगन की दिवाली स्पेशल रिलीज़ फ़िल्म 'शिवाय' की सबसे महत्वपूर्ण बात है कि यह फ़िल्म अजय देवगन की बेहद महत्वकांक्षी फ़िल्म है क्योंकि वो न इसमें केवल लीड रोल निभा रहे हैं बल्कि साथ ही साथ इस फ़िल्म के निर्माता, निर्देशक, लेखक भी हैं.

इस फ़िल्म से अजय का लगाव इतना ज़्यादा है कि इस फ़िल्म को पूरा करने के लिए उन्होनें अपनी हिट फ़्रेंचाइज़ी फ़िल्मों जैसे 'गोलमाल' और 'सिंघम' के लिए भी वक़्त नहीं निकाला था.

ज़ाहिर है कि इतनी महत्वकांक्षी फ़िल्म है तो इसका बजट भी बड़ा होगा और लगभग 105 करोड़ के बजट से बनी इस फ़िल्म पर हुआ खर्चा पर्दे पर दिखाई भी देता है.

फ़िल्म में जबर्दस्त एक्शन और स्टंट भरे हुए हैं और इन्हें ऐसी तकनीक के माध्यम से फ़िल्माया गया है कि कई हिस्सों में यह फ़िल्म किसी हॉलीवुड फ़िल्म सरीखी दिखती है.

लेकिन अच्छी फ़िल्में सिर्फ़ तकनीक से नहीं बल्कि एक सशक्त कहानी, मज़बूत किरदारों और बेहतरीन संवादो वा संगीत का मिश्रण होती है और शिवाय यहीं मार खा जाती है.

इससे पहले कि फ़िल्म की कहानी या इसके किसी पहलू की बात करें एक उदाहरण याद दिलाना ज़रूरी है, क्रिकेट में सचिन तेंदुलकर भले ही विश्व के महानतम बल्लेबाज़ों में से एक रहे लेकिन जब उन्हें कप्तानी का बोझ उठाना पड़ा तब उनकी बल्लेबाज़ी पर विपरीत असर हुआ.

अजय देवगन भी फ़िल्म में इतनी भूमिकाएं निभा रहे हैं कि कभी वो अभिनय के साथ चूक करते नज़र आते हैं, कभी निर्देशन के साथ तो कहीं कहानी जबरन खींची हुई लगती है.

फ़िलहाल फ़िल्म पर आते हैं. 'शिवाय' कहानी है एक ऐसे ट्रेकर पिता और उसकी 8 साल की बेटी की जिन्हें हालात बुलगारिया (एक यूरोपीय देश) ले जाते हैं और पराए देश में शिवाय और उसकी बेटी एक ऐसे वीभत्स षड्यंत्र का शिकार होते हैं जो एक पल के लिए आपको घृणा से भर देगा.

इस फ़िल्म के बनने के समय पर कई लोग अटकलें लगा रहे थे कि इस फ़िल्म को शिव के जीवन पर बनाया जा रहा है, या फिर ये 'मेलूहा' जैसी किसी पुस्तक पर आधारित है लेकिन ऐसा नहीं है.

'शिवाय' एक एक्शन फ़्लिक है. इस फ़िल्म में कमाल का एक्शन है और यह 'सिंघम' के एक्शन जैसा एकतरफ़ा, एक सेट पर शूट हुए एक्शन नहीं बल्कि, खुली सड़कों, बांधो और 16000 फ़ीट की उंचाई पर शूट हए बेहतरीन स्टंट हैं.

लेकिन स्टंट को छोड़ दें तो फ़िल्म में कई कमियां है. अजय देवगन को छोड़ दें तो इस फ़िल्म में सभी कलाकारों ने बेहद कमजोर अभिनय किया है और ऐसा लगता है कि निर्देशक का ध्यान अजय पर ज़्यादा था और बाकी सभी पर कम.

फ़िल्म का दूसरा कमज़ोर पहलू है फ़िल्म का पहला भाग, फ़िल्म के पहले भाग की कहानी में अजय देवगन और पोलिश अभिनेत्री एरिका कार के अलावा दिखाए गए तकरीबन सभी किरदार वहां क्यों थे, यह समझ से बाहर रह जाता है.

फ़िल्म का तीसरा और सबसे ख़राब पहलू है फ़िल्म के संवाद और अभिनय. अजय देवगन को छोड़कर किसी कलाकार के अभिनय या टेक पर शायद निर्देशक का ध्यान ही नहीं गया है.

इसके बाद फ़िल्म में संवाद ऐसे हैं कि या तो आप अपना अपना सिर पीट लेंगे या गंभीर दृश्यों में भी हंसते हंसते लोट पोट हो जाएंगे. इसका एक उदाहरण इस बात से समझा जा सकता है कि फ़िल्म के अंतिम दृश्य में फ़िल्म की दूसरी अभिनेत्री सायशा सहगल एक गंभीर संवाद ख़त्म करने के बाद बोलती हैं शायद मुझे ही समझ नहीं आया कि मैं क्या बोलना चाहती हूं ?

फ़िल्म का दूसरा भाग काफ़ी रोचक, सस्पेंस से भरपूर और भावानात्मक है. अजय और उनकी बेटी के बीच के दृश्य या अजय और मुख्य विलेन के बीच लड़ाई के दृश्य वाकई दिलचस्प हैं लेकिन सिर्फ़ इन दृश्यों के लिए आपको पूरी फ़िल्म के कुछ ग़ैर ज़रूरी दृश्य भी देखने पड़ते हैं.

फ़िल्म में बीबीसी का ज़िक्र भी है क्योंकि अभिनेता गिरीश कर्नाड इस फ़िल्म में बीबीसी के रिटायर्ड पत्रकार की भूमिका निभा रहे हैं

वहीं एरिका कार भी एक बीबीसी धारावाहिक का हिस्सा रह चुकी हैं.

इस फ़िल्म की रिलीज़ से पहले अभिनेता अजय देवगन और करण जौहर के बीच विवाद की ख़बर आई थी और अजय ने आरोप लगाया था कि करण जौहर ने फ़िल्म आलोचक और अभिनेता कमाल राशिद खान को शिवाय की बुराई करने के लिए पैसे दिए हैं.

केआरके ने बीबीसी के सामने पैसे दिए जाने कि इस बात का खंडन किया था लेकिन सोशल मीडिया पर वो इस फ़िल्म की खासी बुराई कर रहे हैं यह भी एक सच है.

फ़िलहाल तथ्य यह है कि 'शिवाय' और करण जौहर की 'ए दिल है मुश्किल' दोनों ही फ़िल्म दर्शकों के सामने हैं और अजय के फ़ैन्स उनकी फ़िल्म देखने जाएंगे भी, चाहे उनकी फ़िल्म को कितना ही बुरा या अच्छा क्यों न कहा जाय.

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