'डियर ज़िंदगी' का रिव्यू: ज़िंदगी की जंग है 'डियर ज़िंदगी'

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Image caption शाहरुख ख़ान और आलिया भट्ट

फ़िल्म: डियर ज़िंदगी

रेटिंग: ***

कलाकार: शाहरुख ख़ान, आलिया भट्ट

निर्देशक: गौरी शिंदे

"हम कभी-कभी सफलता पाने के लिए आसान रास्तों की जगह मुश्किल रास्तों को चुनते हैं, लेकिन ज़रूरी नहीं कि हर बार मुश्किल रास्ता ही आपको मंज़िल पर ले जाए. कभी-कभी आसान राहें भी हमें मंज़िल से मिला देती हैं."

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फ़िल्म में दिमाग़ के डॉक्टर बने शाहरुख ख़ान, अपने कूल अंदाज़ में जब यह बात उलझी हुई आलिया को समझाते हैं तो फ़िल्म की थीम साफ़ होने लगती है.

('शाहरुख़ संग रोमांस न कर पाने का अफ़सोस नहीं')

गौरी शिंदे की पिछली फ़िल्म थी 'इंग्लिश-विंग्लिश', जिसमें अंग्रेज़ी से जूझती एक महिला की कहानी थी जो अंत में उस भाषा को सीखकर एक नई पहचान हासिल करती है. यहां भी गौरी आज के युवाओं की समस्याओं पर बात करती हैं, जिसे वो युवा सिनेमेटोग्राफ़र कायरा के किरदार को बयां करती हैं.

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Image caption डियर ज़िंदगी का पोस्टर

फ़िल्म के पहले हाफ़ में परेशान, अधीर और उलझी हुई किरदार कायरा (आलिया) को देख कर आप गुस्सा हो सकते हैं. आप जज कर सकते हैं. उसे लगभग बदचलन या बददिमाग़ बता सकते हैं लेकिन जब फ़िल्म के दूसरे हाफ़ में आप डॉक्टर जहांगीर ख़ान (शाहरुख) के साथ उसकी परेशानी की वजह समझते हैं, तो आपको लगेगा कि हम कितनी जल्दी, किसी को जाने बिना राय बना लेते हैं.

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गौरी शिंदे, शाहरुख के किरदार के माध्यम से फ़िल्म में जगह-जगह, छोटे-छोटे संदेश देती हैं जो ज़िंदगी को और प्यारा और आसान बनाते हैं. फ़िल्म की कहानी के बारे में कुछ भी कहना, फ़िल्म का सस्पेंस ख़राब करेगा लेकिन हां, इस फ़िल्म को देखते हुए आपको एक बार "तारे ज़मीन पर" ज़रूर याद आएगी.

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Image caption डियर ज़िंदगी के पोस्टर पर आलिया भट्ट

फ़िल्म पर निर्देशक की अच्छी पकड़ है और कई दृश्य लंबे होने के बाद भी ज़रूरी लगते हैं. शाहरुख़ बहुत अच्छे लगे हैं और उन्होंने मंझा हुआ अभिनय किया है क्योंकि वो अपनी उम्र प्ले कर रहे हैं. आलिया कहीं-कहीं पर ओवरएक्टिंग की शिकार हो जाती हैं लेकिन वो एक ऐसी लड़की के किरदार मे थीं जो उलझी हुई है. थोड़ी देर बाद आपको लगता है कि उनका अभिनय ठीक ही था. अच्छी बात यह है कि वो एक्सप्रेशन देने की कोशिश तो करती हैं.

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Image caption शाहरुख ख़ान और आलिया भट्ट

फ़िल्म को हमारी ओर से तीन स्टार, एक शाहरुख़ के लिए, एक गौरी शिंदे की कमाल की कहानी के लिए क्योंकि बॉलीवुड में ऐसी सार्थक फ़िल्में कम ही लोग बनाते हैं. तीसरा और आख़िरी स्टार फ़िल्म में छोटे-छोटे कैमियो प्ले करने वाले हीरोज़ के लिए जो हर बार आते हैं और फ़िल्म को एक फ्रेश लुक दे जाते हैं. हां, फ़िल्म में एक पाकिस्तानी कलाकार भी है और इसलिए फ़िल्म के पहले सैनिकों को श्रद्धांजलि दी गई है.

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