फ़िल्म रिव्यू- बॉक्स ऑफ़िस पर 'आमिर और छोरियों का दंगल'

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फ़िल्म - दंगल

निर्देशक - नितेश तिवारी

रेटिंग - **** 1/2 स्टार

बॉलीवुड में साल 2016 में रिलीज़ होने वाली कुश्ती पर बनी अब तक की बेहतरीन फ़िल्म है 'दंगल.' ये अच्छा सामाजिक संदेश देती है और अभिनय-अभिनेताओं के मामले में भी इस साल की सबसे दुरुस्त फ़िल्म है.

निर्देशक नितेश तिवारी की इस शॉर्ट और क्रिस्प फ़िल्म के साथ अभिनेता आमिर ख़ान लगभग दो साल बाद पर्दे पर वापसी कर रहे हैं और मिस्टर परफ़ेक्शनिस्ट की ये वापसी कमाल की रही है.

इस फ़िल्म के ट्रेलर की ख़ासी प्रशंसा की जा रही थी और फ़िल्म ट्रेलर से कई गुना बेहतर निकली.

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भारतीय कुश्ती में महिला पहलवानी को नए मयार पर पहुँचाने वाले फोगाट परिवार की असल ज़िंदगी पर बनी इस फ़िल्म को एक डॉक्यू-ड्रामा भी कहा जा सकता है.

लेकिन ये किसी डॉक्यू-ड्रामा सी गंभीर नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और एक्शन और देशभक्ति से भरा-पूरा पैकेज है.

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राष्ट्रीय कुश्ती के चैंपियन रहे पहलवान महावीर फोगाट का एक ही सपना है कि देश के लिए कुश्ती में एक गोल्ड मेडल न जीत पाने के सपने को उनका बेटा पूरा करे.

लेकिन हरियाणा के एक गाँव में महावीर फोगाट के घर, एक के बाद एक चार बेटियां जन्म लेती हैं. उन्हें लगने लगता है कि उनका सपना टूट जाएगा.

लेकिन फिर एक विचित्र घटना के बाद वो अपनी बेटियों को ही पहलवान बनाने की कोशिश करने लगते हैं और यही बेटियां आगे चलकर फोगाट परिवार का सुनहरा इतिहास लिखती हैं.

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बेटियां, बेटों से कम नहीं होती हैं! आमिर की इस फ़िल्म का मैसेज साफ़ और सीधा है- 'भारत से लैंगिक भेदभाव मिट जाए तो भारतीय महिलाएं भी इतिहास रच सकती हैं.'

इस फ़िल्म में महावीर फोगाट का किरदार निभाने वाले आमिर ख़ान का अपने वज़न को बढ़ाना और घटाना तो पहले से ही चर्चा में है.

एक हरियाणवी, अधेड़ उम्र के पहलवान के कड़कमिजाज़ लेकिन साफ़दिल किरदार के साथ वो ख़ासा न्याय करते हैं.

आमिर के अलावा भी फ़िल्म में पर्दे पर आए एक एक किरदार ने अपनी भूमिका को कमाल का जिया है.

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Image caption फ़िल्म - दंगल

सबसे ज़्यादा प्रभावित करती हैं पहलवान गीता और बबीता के बचपन का किरदार निभाने वाली अभिनेत्री ज़ायरा वसीम (गीता) और सुहानी भटनागर (बबीता).

इन दोनों ही लड़कियों ने जिस तरह हरियाणवी बोल चाल के तरीके को अपनाया है और फ़िल्म के रोल के लिए न सिर्फ़ बाल कटवाए, बल्कि कड़ी फ़िज़िकल ट्रेनिंग भी की है - वो पर्दे पर दिखाई देती है.

फ़िल्म के निर्देशक नितेश कहीं भी फ़िल्म से अपनी पकड़ ढीली नहीं होने देते और दृश्यों को बेवजह खींचते नहीं हैं.

उन्होनें एक एक दृश्य में अभिनय से लेकर बोली, पीछे दिखने वाली पृष्ठभूमि और समय (टाईम फ़्रेम) का ख़ासा ध्यान रखा है.

फ़िल्म के क्लाईमैक्स में दिखाए गए कुश्ती के दृश्यों में तो निर्देशक और कलाकारों के इस खेल को समझने और फ़िल्माने की तकनीक़ दिल जीत लेती है.

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यह जानते हुए भी कि फ़िल्म में गीता फोगाट के जीवन को दिखाया जा रहा है और वो अंत में गोल्ड मेडल जीत ही लेंगी, आप फ़िल्म के अंतिम दृश्यों में अपनी कुर्सियों के किनारों पर आ जाते हैं.

फ़िल्म में देशभक्ति का भी जबर्दस्त तड़का है और इस फ़िल्म को देख रहे दर्शक स्वर्ण जीतने वाले सीन के बाद बजने वाले राष्ट्रगान पर तालियां बजाते हुए उठ खड़े होते हैं.

इसी साल कुश्ती पर आई फ़िल्म सुल्तान की इस फ़िल्म से काफ़ी तुलना की जा रही थी क्योंकि यह दोनों ही फ़िल्में पहलवानी की पृष्ठभूमि पर बनी है.

लेकिन दंगल के पहले कुछ दृश्य देखते ही आपको समझ आ जाता है कि 'सुल्तान' एक मसाला फ़िल्म थी और 'दंगल' कुश्ती की बारीकियों को दिखाती हुई फ़िल्म है.

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Image caption फ़िल्म- सुल्तान

सुल्तान में सलमान जहां कोशिश कर के भी ठीक से हरियाणवी नहीं बोल पा रहे थे वहीं आमिर ने इस बार खड़ी बोली के लहज़े को अच्छे से पकड़ लिया है और वो एक देहाती पहलवान लगते हैं.

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अगर खेल पर बनी किसी फ़िल्म से तुलना करें तो इसी साल आई फ़िल्म 'एम एस धोनी' भी 'दंगल' के सामने नहीं ठहरती, क्योंकि एम एस धोनी में धोनी की लव लाईफ़ और निजी जिंदगी के बारे में बातें तो थीं, मगर खेल की बारीकियां नहीं थीं.

वहीं दंगल आपको कुश्ती के अंदर तक ले जाती है, वो नियमों की बात करते हैं, खेल की राजनीति की बात करते हैं, पहलवानों की ज़िंदगी की कठिनाइयों से रुबरू करवाते हैं और अगर आप कभी पहलवानी या हरियाणा से संबंधित रहे हैं तो इस फ़िल्म में डूब जाएंगे.

फ़िल्म का सबसे अच्छा भाग है कि यह फ़िल्म पुरुष प्रधान समाज के अनुसार नहीं चलती है, जहां हीरो गुंडो को उड़ाता हुआ एक बेबस लड़की को बचाता है. ये महिलाओं को बराबरी के दर्जे पर रखती है साथ ही समाज पर इस बराबरी का क्या असर पड़ता है, इसे दिखाती है.

फ़िल्म को साढ़े चार स्टार - पहला कमाल की कहानी और थीम के लिए, दूसरा जीवंत अभिनय के लिए, तीसरा ज़बरदस्त फ़िल्मांकन और निर्देशन के लिए, चौथा अमिताभ भट्टाचार्य के कमाल के गीत संगीत के लिए और आधा स्टार इस फ़िल्म में लगी जीतोड़ मेहनत के लिए, जो पर्दे पर दिखती है.

आधा स्टार कहां कटा, इसके लिए आप इस रिव्यू को फिर पढ़ें, या फिर फ़िल्म देखनी हो तो देखकर तय करें.

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