रोशन : संगीत से बना मिठास का झरना

  • 2 अप्रैल 2017
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कव्वाली और मुजरे के उस्ताद रोशन

रोशन जिस दौर में अपने संगीत से फ़िल्मों को एक बिल्कुल नए ढंग का कलेवर दे रहे थे, उस समय उनके समकालीन ढेरों संगीतकारों ने पॉपुलर ढंग से संगीत रचने को ही सफलता की शर्त मान रखा था.

उन्होंने लखनऊ के मैरिस कॉलेज से संगीत की तालीम लेने के अलावा बाकायदा मैहर के सुविख्यात बीनकार उस्ताद अलाउद्दीन खान साहब से संगीत सीखा था.

मैहर छोड़ने के बाद रोशन उस्ताद बुन्दू खां और मनोहर बर्वे के सम्पर्क में भी आए. इन दोनों ने ही उनके शास्त्रीय संगीत के ज्ञान में कुछ नए ढंग से इज़ाफ़ा किया.

सिरीज़ की पहली कड़ी- 'तवायफ़ी ग़ज़ल' मिज़ाज वाले नौशाद

उस्ताद अलाउद्दीन खाँ से सीखने का सुफल यह हुआ कि रोशन पारम्परिक राग संगीत और बन्दिशों का किस तरह से इस्तेमाल फ़िल्म संगीत के लिए किया जाना चाहिए, इसे बखूबी समझ गए. बाबा अलाउद्दीन खाँ से उन्होंने सारंगी सीखी थी. इसके बारे में कहा जाता है कि यह मनुष्य की आवाज़ के क़रीब का साज़ है.

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रोशन ने अपने संगीत पर सर्वाधिक प्रभाव दिग्गज संगीतकार अनिल बिसवास का माना है. वे अपनी धुनों को संवारने और उसे हर सम्भव तरीके से नया बनाने के फेर में अकसर अनिल बिसवास से मार्गदर्शन व सलाह लिया करते थे.

कहने का मतलब यह है कि रोशन की सांगीतिक अवधारणा में एक ओर शास्त्रीय ढंग का मैहर घराना बोलता है, तो दूसरी ओर बंगाल स्कूल का जादू. उसमें कई बार बंगाल की अपनी लोकधुनों के साथ वहाँ के कीर्तन गायन की रंगत दिखायी पड़ती है.

उनके संगीत में अवध के संगीत से छनकर आने वाली लोक-संगीत की विराट संपदा भी अलग से मिलती है. इन्हीं सबके आपसी सामंजस्य से मिलकर बनने वाली ज़मीन ने उनका संगीत संसार सँवारा है.

उन्हें अत्यन्त छोटा-सा पचास वर्ष का जीवन (1917-1967) ही मिल पाया था. इतने भर कालखण्ड में 'नेकी और बदी' (1949, पहली फ़िल्म) से लेकर 'अनोखी रात' (1968 अन्तिम फ़िल्म) तक बीस वर्षों की सुरीली यात्रा में रोशन के फ़न में यही तीनों विन्यास- शास्त्रीय संगीत, बंगाल का रंग और अवध की लोकधुनें आसानी से देखी जा सकती हैं.

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फिर चाहे आप 'चित्रलेखा' और 'ममता' में शास्त्रीय-संगीत ढूँढें, 'ज़िन्दगी और हम', 'बरसात की रात', 'बहू बेगम' में लोक-रंग या फिर 'हम-लोग' और 'शीशम' में बंगाल स्कूल का प्रभाव - सभी जगह रोशन का काम बेहद स्तरीय ढंग से अपनी अधुनातन संरचना को व्यक्त करता है.

रोशन के संगीत की सबसे बड़ी खासियत के रूप में क़व्वाली एवं मुज़रा गीतों को भी देखा जाना चाहिए. 'बरसात की रात', 'ताजमहल', 'बहू बेगम', 'दिल ही तो है' की क़व्वालियाँ और 'नौबहार', 'बाबर', 'ममता', 'बहू बेगम' के मुजरा गीत इस बात के सदाबहार उदाहरण माने जाते हैं.

हालाँकि रोशन को परिभाषित करने के लिए सबसे मशहूर धुन यही मानी जाती है - 'रहें ना रहें हम महका करेंगे बन के कली, बन के सबा, बाग़-ए-वफ़ा में'.......

(यतीन्द्र मिश्र लता मंगेशकर पर 'लता: सुरगाथा' नाम से किताब लिख चुके हैं.)

(फिल्मी दुनिया के महान संगीतकारों के बारे में बीबीसी हिंदी की 'संग संग गुनगुनाओगे' सिरीज़ की दूसरी कड़ी रोशन को समर्पित है.)

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