महात्मा गांधी के लिए गीत बनाने वाली पहली संगीतकार जोड़ी

  • यतींद्र मिश्र
  • संगीत और कला समीक्षक
शमा परवाना पोस्टर

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हिन्दी फ़िल्म संगीत की दुनिया में पहली संगीतकार जोड़ी के रूप में हुस्नलाल-भगतराम को याद किया जाता है. पहली सबसे सफल और लोकप्रिय संगीतकार जोड़ी, जिनके बारे में यह मशहूर रहा कि उन्होंने हिन्दी फ़िल्म संगीत में मास्टर ग़ुलाम हैदर के बाद विधिवत ढंग से पंजाबी शैली के संगीत का प्रसार किया.

हुस्नलाल-भगतराम, दोनों ने शास्त्रीय संगीत की दीक्षा पं. दिलीप चंद्र वेदी से ली थी और अपने बड़े भाई पं. अमरनाथ से भी संगीत की कुछ बारीकियों को आत्मसात किया था, जो स्वयं पिछली शताब्दी के चौथे-पाँचवें दशक के मशहूर संगीतकार माने जाते हैं.

यह जानना भी दिलचस्प है कि महात्मा गांधी के लिए मो. रफ़ी का गाया हुआ ऐतिहासिक गीत 'सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों बापू की यह अमर कहानी' इन दोनों ने ही मिलकर रचा था.

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महात्मा गांधी के गीत का संगीत रचने वाली जोड़ी

वॉयलिन का इस्तेमाल

हुस्नलाल-भगतराम की संगीत शैली पूरी तरह पंजाबी लोक रंग में रंगी हुई थी, जिसमें तबले और ढोलक की बीट्स वाली धुनें गीतों को एक अलग ही भंगिमा देती थीं. चूँकि हुस्नलाल जी ने पटियाला के उस्ताद बशीर खां साहब से वॉयलिन सीखा हुआ था, इसलिए इनकी अधिकाँश धुनों के मध्यवर्ती संगीत में वॉयलिन के छोटे या बड़े टुकड़े सुन्दर ढंग से पिरोये हुए देखे जा सकते हैं.

कहीं बेहद चपल तौर पर तो, कहीं बेहद शांत ढंग से उपस्थित. वॉयलिन अपने पूरे ग्रामर में हुस्नलाल-भगतराम के यहाँ प्रमुख वाद्य की तरह मौजूद रहा है. एक-दो गीतों के उदहारण से यह बात देखी जा सकती है. जैसे, लुट गयी उम्मीदों की दुनिया (जलतरंग) और मेरा दिलदार न मिलाया (शमा परवाना) जैसे गीत.

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वॉयलिन से अलग इस संगीतकार जोड़ी की धुनों में तबला, ढोलक, सारंगी और हवाईयन गिटार का सुन्दर प्रयोग देखा जा सकता है. यह बात उनकी संगीतबद्ध कुछ बेहद महत्वपूर्ण फ़िल्मों मसलन 'बड़ी बहन', 'मीना बाज़ार', 'जलतरंग', 'सावन भादों', 'अफ़साना', 'सनम', 'शमा परवाना' और 'अदल-ए-जहाँगीर' के माध्यम से देखी जा सकती है.

यहाँ 'अदल-ए-जहाँगीर' का एक गीत देखना चाहिए, जिसे हुस्नलाल-भगतराम ने दादरा शैली में रचकर ढोलक के दिलकश प्रयोग से और भी सुन्दर ढंग से निखारा था. ये गीत है- 'सांवरिया तुम्हारी नज़र लागे प्यारी' (अदल-ए-जहांगीर) लता मंगेशकर की महान सांगीतिक यात्रा में हुस्नलाल-भगतराम का वही मुकाम है, जो उनके आरंभिक दिनों में मास्टर ग़ुलाम हैदर, सज्जाद हुसैन और खेमचंद प्रकाश का रहा है.

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लता मंगेशकर का था विशेष महत्व

लता मंगेशकर का महत्व

सन 1949 में आई 'बड़ी बहन' जैसी फ़िल्म से लता जी को एक विशिष्ट उपलब्धि हासिल हुई, जो उसी वर्ष प्रदर्शित दूसरी फ़िल्मों विशेषकर- अनिल विश्वास की 'लाडली', नौशाद की 'अंदाज़' और श्याम सुन्दर की 'लाहौर' से उन्हें मिली थी. 'बड़ी बहन' के ये दोनों गीत तो आपको आज भी याद होंगे- 'चुप-चुप खड़े हो ज़रूर कोई बात है' और 'चले जाना नहीं नैन मिला के'.

हुस्नलाल-भगतराम के लिए जितना महत्व लता मंगेशकर का रहा है, उतना ही सम्मान उन्होंने अपनी फ़िल्मों के गीतों से सुरैया को भी दिया है. 'प्यार की जीत', 'सनम', बालम, 'नाच' और 'शमा परवाना' इसके सबसे आदर्श उदहारण हैं.

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कव्वाली और मुजरे के उस्ताद रोशन

पुरुष स्वरों के लिए भी हुस्नलाल-भगतराम ने कुछ बेहद नायाब धुनें बनायी हैं, जिनमें तलत महमूद, मुकेश, मो. रफ़ी और किशोर कुमार के गीत आज भी यादगार गीतों की श्रेणी में गिने जाते हैं. इनमें मुकेश का गाया 'क़िस्मत बिगड़ी दुनिया बदली', तलत महमूद का 'मोहब्बत की हम चोट खाये हुए हैं' और ऐ मेरी ज़िन्दगी तुझे ढूँढू कहाँ', रफ़ी साहब का 'अपना ही घर लुटाने दीवाना जा रहा है' याद आते हैं. यहाँ पर तलत महमूद और मुकेश के गीतों की बानगियों को गौर से सुनना परखना चाहिए, जो हुस्नलाल-भगतराम की रिद्म और बीट आधारित सिग्नेचर संगीत को कहीं अलग छोड़ देते हैं और उन्हें बिलकुल नया रेंज उपलब्ध कराते हैं. संगीतकार जोड़ी की विशिष्टता के सन्दर्भ में भी यह गीत सुने जाने को विवश करते हैं. ऐसे में 'मोहब्बत की हम चोट खाये हुए हैं' (फरमाईश) और 'क़िस्मत बिगड़ी दुनिया बदली' (अफ़साना) आदर्श उदहारण के तौर पर याद आएंगे.

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बाद में नहीं मिला काम

एक मशहूर और सदाबहार जोड़ी, जो धीरे-धीरे मुख्य धारा के संगीत से दूर हुयी और बाद में इस संगीतकार जोड़ी के पास फ़िल्मों के लिए काम नहीं रहा, आज एक दुर्भाग्यपूर्ण बात लगती है. मगर इस बात से शायद ही कोई इंकार करेगा कि जो मकबूलियत बाद में साठ के दशक तक आते-आते संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन को हासिल हुई, उसके पहले पचास के दशक में वह मुकाम हुस्नलाल-भगतराम ने बड़े स्तर पर बना लिया था.

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हिंदी फिल्मों के अजातशत्रु संगीतकार रवि

उन्होंने लता मंगेशकर, सुरैया, तलत महमूद और मो. रफ़ी के लिए कुछ नायाब धुनें रचीं और अपनी एक ख़ास शैली के माध्यम से पंजाबी किस्म का लोकरंग फ़िल्म संगीत में बिखेर सके, जहाँ वॉयलिन और गिटार के साथ-साथ तबले और ढोलक की तेज रिद्म वाली शैली मौजूद थी. आज हुस्नलाल-भगतराम नहीं हैं, मगर उनकी कीर्ति उनके कम्पोज किये हुए गीतों से वैसी ही चमक रही है.

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