ये हैं 'न्यूटन' को ऑस्कर की राह दिखाने वाले लेखक

  • 22 सितंबर 2017
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अगले साल के ऑस्कर पुरस्कारों के लिए विदेशी फ़िल्मों की श्रेणी में भारत की ओर से फ़िल्म 'न्यूटन' को आधिकारिक एंट्री मिली है.

लेकिन ऑस्कर पुरस्कार पाने की राह आसान नहीं क्योंकि अभी 'न्यूटन' को दुनियाभर से इस श्रेणी में आई फ़िल्मों से मुक़ाबला करना पड़ेगा.

इसी शुक्रवार को ये फ़िल्म रिलीज़ हुई है और समीक्षकों की ओर से इसे काफ़ी सराहा भी गया है. राजकुमार राव और पंकज त्रिपाठी जैसे मँझे हुए कलाकारों की ये फ़िल्म पहले ही कई फ़िल्म समारोहों में वाहवाही लूट चुकी है.

ऑस्कर में भारत की ओर से फ़िल्म को एंट्री मिलने के बाद सभी कलाकारों को बधाई मिल रही है. लेकिन फ़िल्म के सहलेखक मयंक तिवारी भी ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे हैं.

बीबीसी ने जब उनसे बात की तो उनकी हर बातों से ख़ुशी झलक रही थी. मयंक ने फ़िल्म निर्देशक अमित मसुरकर के साथ मिलकर फ़िल्म लिखी है.

भारत की तरफ़ से ऑस्कर की खोज करेगा 'न्यूटन'

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नक्सलवाद की पृष्ठभूमि

अमित लंबे समय से फ़िल्म पर काम कर रहे थे और जब उन्हें मयंक का साथ मिला तो लेखन और धारदार हुआ.

नक्सलवाद की पृष्ठभूमि में बनी फ़िल्म को अंतिम रूप देने से पहले दोनों ने छत्तीसगढ़ का दौरा किया. इस दौरे के बाद कहानी और रोचक बनी.

अमित और मयंक अच्छे दोस्त हैं और मयंक ने अमित की फ़िल्म 'सुलेमानी कीड़ा' में काम भी किया है.

लंबे समय तक पत्रकार रहे मयंक ने बताया, "मैं और अमित ऐसा किरदार चाहते थे, जो अपने क्लास का हीरो न हो. हम साधारण बच्चा चाहते थे. जो साधारण काम करने की चाहत रखता हो. अमित ने काफ़ी रिसर्च किया था और उनके पास अच्छा आइडिया भी था. मैं फ़िल्म के सेट पर भी मौजूद रहता था और उस दौरान राजकुमार राव और पंकज त्रिपाठी का काम देखकर हम बदलाव भी करते थे."

लेकिन क्या नक्सलवाद और छत्तीसगढ़ की पृष्ठभूमि में बनी इस फ़िल्म को लेकर कहीं कोई शंका तो नहीं थी कि कोई राजनीतिक विवाद न खड़ा हो जाए, इस पर मयंक कहते हैं, "देखिए हम कलाकार हैं और कलाकार का काम होता है मिडिल पाथ लेना. हम अपनी बात भी कहेंगे, तथ्य भी सामने रखेंगे और किसी की साइड नहीं लेंगे. ये हमलोगों को साफ़ था. बाक़ी जो हमें कहना था, वो तो हमने कहा ही है."

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इसके बावजूद किसी ट्रैप में फँसने का डर तो नहीं था, मंयक का कहना है कि बिल्कुल नहीं.

मयंक कहते हैं, "हम लोकतंत्र को मार्जिन से देखना चाहते थे. जैसे कश्मीर में चुनाव कैसे होता है, मणिपुर में कैसे होता है. दरअसल नक्सलवाद पर जब भी कोई फ़िल्म बनती है, वो ध्रुवित होती है. वो साइड लेती हैं. वे या तो ये बताती हैं कि जो हो रहा है, वो सही हो रहा है या फिर वो दूसरा पक्ष रखती हैं. लेकिन हमने सिर्फ़ एक कहानी कही है."

न्यूटन का विचार कैसे

फिल्म का नाम न्यूटन क्यों रखा गया, इस पर मयंक ने कहा कि शीर्षक का आइडिया अमित का था. वो किसी एक दिन न्यूटन नाम के व्यक्ति से मिले थे. उन्हें उनका नाम अजीब लगा.

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उन्होंने बताया, "अमित ने मुझे यह बात बताई. एक दिन सुबह मेरे दिमाग़ में आया कि न्यू को नू और टन को तन कर दिया जाए. मैंने अमित को यह बात बताई और उन्हें यह बात अच्छी लगी. अमित ने इसे बनाने के लिए 40-50 किताबें पढ़ी हैं."

मूल रूप से कुमांयू और दिल्ली में पले-बढ़े मयंक ने लंबे समय तक पत्रकारिता की है. लेकिन उस क्षेत्र में उनका मन नहीं लगा. लेकिन पेशे से वकील उनकी पत्नी शिबानी सेठी ने उन्हें निराशा के पल में सहारा दिया और उनका मनोबल बढ़ाया.

मयंक बताते हैं, "मैंने कई अखबारों में काम किया. इस दौरान मुझे लगा कि मैं इस क्षेत्र में अच्छा नहीं कर पाऊंगा. लेकिन मेरी पत्नी ने मेरा मानसिक संतुलन बनाए रखने में मदद की. फिर मैं कॉमेडी शो करने लगा. एक बार मेरी मुलाकात एकता कपूर से हुई. मैंने उन्हें डॉयलॉग सुनाया जो उन्हें पसंद आई. फिर 'रागिनी एमएमएस' लिखी. इसके बाद कई सालों तक कई स्क्रिप्ट लिखा पर उस पर फ़िल्म नहीं बन पाई."

आगे की योजना के बारे में मयंक ने कहा कि 'फ़िलहाल कुछ स्पष्ट नहीं है. उनके मन में बस अच्छा काम करने की चाहत है.'

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