ब्लॉग: बॉलीवुड फिल्मों में क्यों नहीं दिखाया जाता अधेड़ उम्र में प्यार?

  • 20 मई 2018
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"कभी उसके बनाए खाने की तारीफ़ नहीं की, सोचा उसे पता होगा

कभी उससे ये नहीं कहा कि तुम बहुत ख़ूबसूरत दिख रही हो, सोचा उसे पता होगा

कभी ये नहीं कि मैं उससे प्यार करता हूँ, सोचा उसे पता होगा."

ये डायलॉग या कहें जज़्बात 52 साल के एक शख़्स (अभिनेता संजय मिश्रा) के हैं जो रोज़ाना दफ्तर जाता है, कमाता है और परिवार का ख़्याल रखता है. उसके लिए शादी के यही मायने हैं.

लेकिन उसकी बीवी इसे सिर्फ़ ज़िम्मेदारी निभाना मानती है - प्यार नहीं. उसे ज़िम्मेदारी के साथ-साथ ज़िंदगी में थोड़ा प्यार, थोड़ा रोमांस भी चाहिए.

प्यार, इश्क़, मोहब्बत, रोमांस- ये सारे अलफ़ाज़ और एहसास हम लड़कपन, किशोरावस्था या फिर जवानी से जोड़कर देखते हैं. पर क्या 40 पार या 50 पार होने के बाद ज़िंदगी में प्यार की ज़रूरत या गुंजाइश नहीं होती? होती भी है तो क्या दुनियादारी, नौकरी, घर-परिवार के बीच वो खो जाता है?

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इस हफ़्ते रिलीज़ हुई फिल्म 'अंग्रेज़ी में कहते हैं' देखने के बाद यही ख़्याल मन में आया.

क्या है फिल्म की कहानी?

फ़िल्म 'अंग्रेज़ी में कहते हैं'- तीन ऐसे जोड़ों की कहानी है जिनके लिए प्यार के अलग-अलग मायने हैं.

कहानी 52 साल के यश बत्रा (संजय मिश्रा) और उनकी पत्नी किरन (एकावली) के इर्द-गिर्द घूमती है जिनकी जि़ंदगी में अब कोई रोमांस बचा ही नहीं. अगर है भी तो पति के पास उसे जताने की न फ़ुर्सत है और न ही ज़रूरत.

वो कोई विलेन नहीं है पर अधेड़ उम्र में भी प्यार होता है और उसे जताया जा सकता है ये उसने शायद सीखा ही नहीं.

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पेड़ों के इर्द गिर्द घूमते, डिस्को में जाते, कभी चोरी-चोरी तो कभी खुल्लम-खुल्ला इश्क़ फरमाते जवान दिलों की कहानी कहती कई हिंदी फ़िल्में मिल जाएँगी, लेकिन बड़ी उम्र में लव स्टोरी वाली कहानियों को कम ही जगह मिलती है.

असल ज़िंदगी की बात करें तो 2011 में अभिनेत्री सुहासिनी मुले ने 60 साल की उम्र में लव मैरिज की थी. वो ख़ुद भी हैरान थीं कि उनकी शादी इतना बड़ा मुद्दा कैसे बन गई और लोगों ने उन्हें 'फ़ेमिनिज़्म ऑईकॉन' क्यों बना दिया.

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हाँ याद आता है तो 1965 में आई फ़िल्म 'वक़्त' का वो गाना - 'ऐ मेरी ज़ोहरा जबीं' जो बुज़ुर्गियत (अगर ऐसा कोई शब्द है) में प्यार और इश्क़ को ज़ुबान देता है.

या फिर 2007 में आई फ़िल्म हनीमून ट्रैवल्स जिसमें कई जवान जोड़े हनीमून के लिए जा रहे हैं और इन्हीं के बीच एक जोड़ा है बोमन ईरानी और शबाना आज़मी का. दोनों अधेड़ उम्र के हैं, इनके बच्चे हैं और दोनों की ये दूसरी शादी है.

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अलग मिठास और अलग अंदाज

पाँच जवान जोड़ों के बीच हनीमून मनाने आए इन दोनों की प्रेम कहानी एक अलग ही मिठास और एहसास लिए हुए आगे बढ़ती है.

फ़िल्म में एक सीन है जहाँ बोमन ईरानी के दिल में उदास करने वाली एक पुरानी याद ताज़ा हो जाती है और वो नई दुल्हन शबाना को सड़क के बीच ज़ोर से गले लगाते हैं और चूमते हैं.

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दोनों को ज़िंदगी ने कई घाव दिए हैं पर जि़ंदगी ने प्यार करने का एक और मौका भी दिया है और वो ढलती उम्र को आड़े नहीं आने देना चाहते.

ऐसी कम ही हिंदी फ़िल्में हैं जो जवानी की दहलीज़ के बाहर भी प्यार को टटोलती हैं -फिर हालात चाहे कुछ भी हों.

मसलन फ़िल्म 'दिल चाहता है' में एक मिडिल एज की तलाक़शुदा औरत (डिंपल कपाड़िया) की कहानी है जो अकेली है... उसकी तनहाई का साथी बनता है उसका पड़ोसी (अक्षय खन्ना) जो उम्र में उससे छोटा है. पर दोनों के बीच का ख़ूबसूरत पर अधूरा रिश्ता उम्र के फ़ासले का मोहताज नहीं है.

या फिर शर्मिला टैगोर और अनुपम खेर की फ़िल्म मॉर्निंग वॉक.

अपनी पोती के पास कुछ दिन के लिए रहने आए अनुपम खेर जब एक दिन मॉर्निंग वॉक पर जाते हैं तो उनकी मुलाक़ात शर्मिला टैगोर से होती है जो जवानी में उनकी दोस्त से कुछ ज़्यादा थी. फ़िल्म की कहानी इन दो बु़ज़ुर्गों के माज़ी और भविष्य को टटोलती हुए आगे बढ़ती है.

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Image caption फ़िल्म हनीमून ट्रैवल्स का एक सीन

कौन भूलेगा अशोक कुमार की खट्टा-मीठा

बासु चटर्जी की फ़िल्म खट्टा मीठा - इसी रिश्ते को कॉमेडी की नज़र से देखते हुए आगे बढ़ती है.

कौन भूल सकता है अशोक कुमार को फ़िल्म में जिनकी बीवी मर चुकी है और बुढ़ापे में उन्हें अपने लिए एक साथी की तलाश है जो उनके चार बेटों का ख़्याल भी रखे. लेकिन जब वो एक पारसी विधवा (पर्ल पदमसी) से शादी कर लेते हैं तो जैसे पूरे खानदान में कोहराम मच जाता है.

2004 में अंग्रेज़ी में एक फ़िल्म आई थी 'नोटबुक'- दो जवान दिलों की 'पैशनेट' प्रेम कहानी - कहानी जो एक बुज़ुर्ग पुरुष नर्सिंग होम में रहने वाली एक बुज़ुर्ग महिला ऐली को रोज़ नोटबुक से पढ़ कर सुनाता है.

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Image caption फिल्म खट्टा मीठा में अशोक कुमार

अपनी आख़िरी साँसें गिन रही बूढ़ी महिला को डिमेंशिया है और वो भूल चुकी है उसे रोज़ कहानी सुनाने वाला कोई और नहीं उसका प्रेमी और पति ही है और वो प्रेम कहानी हक़ीकत में उनकी अपनी ज़िंदगी की कहानी है.

हार्ट टैक आने के बाद उस शख़्स को भी एक रात उसी अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता है. आधी रात को वो अपना कमरा छोड़ अपनी प्रेमिका और पत्नी के डेमेंशिया वार्ड में जाता है.

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आती-जाती यादाश्त के बीच, ऐली उसे पहचान लेती है. फिर दोनों हाथ पकड़कर एक बिस्तर पर सो जाते हैं- हमेशा के लिए एक होने के लिए.

दो बुज़ुर्गों के बीच प्यार की ये भी अलग प्रेम कहानी थी. या फिर ब्रितानी फ़िल्म 'द बेस्ट एग्ज़ॉटिक मेरीगोल्ड होटल' जिसमें रियाटर हो चुके बुज़ुर्गों का एक ग्रुप भारत में एक रिटायरमेंट होटल में रहने आता है और वहाँ बुनी जाती है इन बुज़ुर्गों के बीच प्यार और दोस्ती की कहानी .

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Image caption फिल्म नोटबुक का एक सीन

लेकिन भारतीय परिवेश में प्यार के इज़हार के तरीके अलग हैं, यहाँ तो जवां दिल भी कई बंदिशों में क़ैद रहते हैं.

यहाँ घर-परिवारों में माँ-बाप, बुज़ुर्गों के बीच प्यार का इज़ाहर कुछ और ही अंदाज़ में होता है, और कभी-कभी तो इज़हार होता भी नहीं. शायद यही हमारे सिनेमा में भी नज़र आता है जैसा कि फ़िल्म 'अंग्रेज़ी में कहते हैं' में दिखने को मिला.

सोचती हूँ कि ऐसे कितने लोग होंगे जिन्हें फ़िल्म की अधेड़ उम्र की हीरोइन किरन की तरह, उम्र के तकाज़े के चलते अपने प्यार का इज़हार करने का मौका ही नहीं मिलता. या सामाजिक कंडिशनिंग ही कुछ ऐसी रहती है कि इस एहसास को बयां करना सिखाया ही नहीं जाता.

शायद इसीलिए गीतकार इंदीवर ने बरसों पहले ये बोल लिखे थे जिसे जगजीत सिंह ने अपनी मखमली आवाज़ में गाया था -

"न उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बंधन

जब प्यार करे कोई, तो देखे केवल मन

नई रीत चलाकर तुम , ये रीत अमर कर दो

होठों से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो."

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